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अदालतें अधिकार तय करती हैं लेकिन रिश्ते नहीं बचा सकतीं, यदि रिश्ते एक बार टूट जाएँ, तो कोई भी न्यायिक आदेश उन्हें पूरी तरह पहले जैसा नहीं बना सकता- जस्टिस अनुरूप सिंघी

Justice Anoop Singhvi: Courts Decide Rights, But Only Mediation Can Save Family Relationships

कॉमनवेल्थ पीस, मेडिएशन एंड रूल ऑफ लॉ कॉन्फ्रेंस में बोले- ‘ME’ (Money & Ego) को ‘WE’ (Worldview & Empathy) में बदलना ही मध्यस्थता की असली सफलता, संवाद और विश्वास से बच सकते हैं टूटते परिवार।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अनुरूप सिंघी ने कहा कि पारिवारिक विवाद केवल कानूनी अधिकारों का विषय नहीं होते, बल्कि उनके पीछे भावनाएँ, विश्वास और रिश्तों की संवेदनशीलता जुड़ी होती है।

उन्होंने कहा कि अदालतें कानून के अनुसार अधिकार और दायित्व तय कर सकती हैं, लेकिन टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने का काम केवल मध्यस्थता (Mediation) ही कर सकती है।

जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ पीस, मेडिएशन एंड रूल ऑफ लॉ कॉन्फ्रेंस में “फैमिली मीडिएशन” विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस अनुरूप सिंघी ने कहा कि परिवार केवल कानूनी संस्था नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक आधार है।

उन्होंने कहा, यदि रिश्ते एक बार टूट जाएँ, तो कोई भी न्यायिक आदेश उन्हें पूरी तरह पहले जैसा नहीं बना सकता।

उन्होंने कहा कि अदालत कानूनी अधिकारों का फैसला करती है, जबकि मध्यस्थता लोगों को बिना डर, पूर्वाग्रह और कटुता के एक साथ बैठकर बातचीत करने और स्वीकार्य समाधान तक पहुँचने का अवसर देती है।

‘मुकदमे कम करना नहीं, रिश्ते बचाना है मध्यस्थता का उद्देश्य’

जस्टिस सिंघी ने कहा कि मध्यस्थता को केवल अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने का माध्यम मानना गलत होगा।

इसका वास्तविक उद्देश्य संवाद, आपसी सम्मान, समझ और मेल-मिलाप के माध्यम से लोगों के बीच विश्वास और सद्भाव को पुनर्स्थापित करना है।

उन्होंने कहा कि जब पक्षकार खुलकर एक-दूसरे की बात सुनते हैं, तभी स्थायी और सम्मानजनक समाधान संभव हो पाता है।

‘ME’ यानी Money और Ego ही विवादों की जड़’

अपने संबोधन में जस्टिस सिंघी ने पारिवारिक विवादों के मूल कारण को बेहद सरल शब्दों में समझाते हुए “ME” का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि M का अर्थ Money (पैसा) और E का अर्थ Ego (अहंकार) है।

उनके अनुसार अधिकांश पारिवारिक विवाद संपत्ति, विरासत, आर्थिक हितों और पारिवारिक संपत्तियों को लेकर शुरू होते हैं, जबकि अहंकार विवाद को समाप्त होने नहीं देता।

उन्होंने कहा कि “पैसा और अहंकार पर बातचीत हो सकती है, लेकिन एक बार रिश्ते टूट जाएँ तो उन्हें दोबारा जोड़ना बेहद कठिन हो जाता है।”

‘ME’ से ‘WE’ बनने की जरूरत’

जस्टिस अनुरूप सिंघी ने कहा कि समाज को “ME” से “WE” की ओर बढ़ना होगा।

उन्होंने बताया कि W का अर्थ Worldview (व्यापक दृष्टिकोण) है, जबकि E का अर्थ Empathy है। जब व्यक्ति केवल अपने हितों से ऊपर उठकर पूरे परिवार, रिश्तों और साझा हितों के बारे में सोचता है, तभी मध्यस्थता सफल होती है।

उन्होंने कहा कि मध्यस्थता का उद्देश्य किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि ऐसा समाधान निकालना है जिसे सभी सम्मानपूर्वक स्वीकार कर सकें।

‘हर मामला मध्यस्थता योग्य नहीं’

जस्टिस सिंघी ने यह भी स्पष्ट किया कि मध्यस्थता का अर्थ किसी पक्ष पर जबरन समझौता थोपना नहीं है।

उन्होंने कहा कि कई विवाद गलतफहमियों के कारण पैदा होते हैं और संवाद से समाप्त हो सकते हैं, लेकिन ऐसे मामले भी होते हैं जहाँ न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालत का निर्णय आवश्यक होता है।

इसलिए केवल समझौते के लिए हर विवाद को मध्यस्थता की ओर नहीं भेजा जाना चाहिए।

‘बताए मध्यस्थता के ‘Four Cs”

अपने संबोधन में जस्टिस सिंघी ने मध्यस्थता के चार मूल सिद्धांत—Communication (संवाद), Collaboration (सहयोग), Confidentiality (गोपनीयता) और Compromise (समझौता)—को “Four Cs of Mediation” बताया।

उन्होंने कहा कि यही चार सिद्धांत मध्यस्थता को मानवीय, प्रभावी और टिकाऊ विवाद समाधान का माध्यम बनाते हैं।

‘रिश्ते बचेंगे तो समाज मजबूत होगा’

अपने संबोधन के अंत में जस्टिस सिंघी ने अधिवक्ताओं, मध्यस्थों और न्याय व्यवस्था से जुड़े सभी हितधारकों से मध्यस्थता की संस्कृति को मजबूत करने का आह्वान किया।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मध्यस्थता अदालतों के निर्णय से आगे बढ़कर न्याय को मानवीय स्वरूप देती है।

यह केवल विवाद समाप्त नहीं करती, बल्कि टूटते परिवारों को जोड़ती है, विश्वास बहाल करती है और समाज में स्थायी शांति एवं सौहार्द स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करती है।

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