कॉमनवेल्थ कॉन्फ्रेंस में कार्यस्थलों पर संवाद और मध्यस्थता विषय पर जस्टिस पी एस भाटी का संबोधन
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश डॉ. न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र सिंह भाटी ने कार्यस्थलों में बढ़ते विवादों और लंबी मुकदमेबाजी पर चिंता जताते हुए बड़ा संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच विवाद अदालतों में नहीं, बल्कि संवाद, मध्यस्थता (Mediation) और आपसी विश्वास से सुलझने चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और तकनीक इस प्रक्रिया में सहयोग कर सकते हैं, लेकिन इंसानी संवेदनाओं, विश्वास और समझ का स्थान कभी नहीं ले सकते।
जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ पीस, मेडिएशन एंड रूल ऑफ लॉ कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन “वर्कप्लेस मीडिएशन” विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस भाटी ने कहा कि आधुनिक संस्थानों की सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादकता बढ़ाना नहीं, बल्कि सम्मानजनक, सुरक्षित और संवाद आधारित कार्य संस्कृति विकसित करना है।

सिर्फ 24 घंटे में खत्म हुआ केंद्र-राज्य विवाद
अपने संबोधन में जस्टिस भाटी ने मध्यस्थता की प्रभावशीलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण साझा किया।
उन्होंने बताया कि कर छूट (Tax Exemption) से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार और केंद्र सरकार आमने-सामने थे।
विवाद केवल वर्ष 2009 को लेकर था, जबकि बाकी वर्षों में कोई मतभेद नहीं था।
उन्होंने बताया कि अदालत ने दोनों पक्षों को लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय बातचीत और मध्यस्थता का सुझाव दिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि महज 24 घंटे के भीतर दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया। सरकार ने विवादित वर्ष की राशि जमा कराने पर सहमति दी, जबकि दूसरे पक्ष ने अपने शेष दावे वापस ले लिए।
उन्होंने कहा कि यह उदाहरण साबित करता है कि सरकारें भी यदि इच्छाशक्ति दिखाएं तो जटिल विवाद बातचीत से सुलझ सकते हैं।
‘धारा 80 का मकसद भी पहले बातचीत, बाद में मुकदमा’
जस्टिस भाटी ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80 भी इसी सोच पर आधारित है।
सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर करने से पहले नोटिस देने का उद्देश्य यह है कि अदालत जाने से पहले ही समाधान का अवसर मिल सके।
‘मतभेद होना स्वाभाविक, लेकिन दुश्मनी बनाना नहीं’
उन्होंने कहा कि हर कार्यस्थल पर अलग-अलग सोच, पीढ़ियों के बीच का अंतर, महत्वाकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ होती हैं, इसलिए मतभेद होना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक सफलता इस बात में है कि मतभेदों को विवाद बनने से पहले ही सम्मान, गरिमा और सहमति के साथ समाप्त कर दिया जाए।
किसी भी संगठन में संवाद की संस्कृति जितनी मजबूत होगी, वह संस्था उतनी ही सफल होगी।
‘यौन उत्पीड़न से लेकर अनुशासनात्मक मामलों तक, हर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका’
जस्टिस भाटी ने कहा कि कार्यस्थलों में कई प्रकार के विवाद सामने आते हैं, जिनमें कार्यस्थल का वातावरण और व्यवहार संबंधी विवाद, अनुशासनात्मक कार्रवाई, भेदभाव, यौन उत्पीड़न की शिकायतें, कर्मचारियों के बीच व्यक्तिगत टकराव तथा नैतिक और आचार संबंधी मुद्दे शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यदि इन मामलों में समय रहते संवाद और मध्यस्थता अपनाई जाए तो न केवल मुकदमेबाजी कम होगी, बल्कि संस्थान का माहौल भी सकारात्मक रहेगा।
‘हर साल वैश्विक GDP का 1.37 प्रतिशत नुकसान’
जस्टिस भाटी ने वैश्विक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए कहा कि Gallup के अनुसार कार्यस्थल पर अनसुलझे विवादों के कारण हर वर्ष दुनिया को वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 1.37 प्रतिशत आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि आर्थिक चुनौती भी है।
‘Microsoft से TCS तक, बड़ी कंपनियाँ अपना चुकी हैं यह मॉडल’
उन्होंने बताया कि Microsoft, Apple, Infosys, Tata Steel, TCS, Reliance, HCL Technologies, Mahindra & Mahindra और Wipro जैसी प्रमुख कंपनियों ने कर्मचारियों की शिकायतों के समाधान के लिए मजबूत आंतरिक तंत्र विकसित किया है, जहाँ गोपनीय शिकायत, संवाद, जांच और समाधान की स्पष्ट व्यवस्था उपलब्ध है।
उन्होंने कहा कि इन सभी संस्थाओं का मूल सिद्धांत एक ही है—समस्या को शुरुआत में ही सुलझाओ, रिश्तों को टूटने मत दो।
‘AI मददगार है, लेकिन इंसानी समझ और सहानुभूति का विकल्प नहीं’
अपने संबोधन के अंत में जस्टिस भाटी ने कहा कि आधुनिक तकनीक और Artificial Intelligence विवाद समाधान प्रक्रिया को अधिक तेज और प्रभावी बना सकते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ, सहानुभूति और संवाद ही किसी भी स्थायी समाधान की वास्तविक नींव हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य की न्याय व्यवस्था का लक्ष्य केवल मुकदमों का निपटारा नहीं, बल्कि ऐसे समाज और कार्यस्थल का निर्माण होना चाहिए जहाँ विवाद अदालत तक पहुँचें ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक संवाद और मध्यस्थता के माध्यम से समय रहते समाप्त हो जाएँ।