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‘PMLA केस में पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने ‘मिडिल पाथ’ अपनाने को कहा था’, जस्टिस कौल की किताब में पूर्व CJI से मतभेदों का खुलासा

Justice Sanjay Kishan Kaul's Book Reveals Differences with CJI Chandrachud Over Judicial Appointments and PMLA Case

नई दिल्ली। जजों की नियुक्ति से पहले सरकार की राय लेना कितना उचित है? क्या कॉलेजियम की बैठक में किसी उम्मीदवार पर चर्चा से पहले सरकार की मंजूरी लेनी चाहिए? और जब सुप्रीम कोर्ट में किसी संवेदनशील मामले की सुनवाई हो रही हो, तो क्या जज को ‘मिडिल पाथ’ यानी बीच का रास्ता अपनाने की सलाह दी जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी आने वाली किताब Without Fear or Favour में इन सवालों से जुड़े कई घटनाक्रमों का जिक्र किया है। जिसके बाद तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ के साथ उनके मतभेद भी सामने आ गए हैं।

जस्टिस कौल ने अपनी किताब में जस्टिस चंद्रचूड़ के CJI रहते न्यायाधीशों की नियुक्ति, कॉलेजियम की बैठकों में हुई चर्चाओं और PMLA से जुड़े एक संवेदनशील मामले पर अपने अनुभव साझा किए हैं।

उनके मुताबिक, जजों की नियुक्ति के मामले में तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ का केंद्र सरकार के प्रति रुख जरूरत से ज्यादा नरम था।

उन्होंने एक अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवार की नियुक्ति को लेकर सरकार की ओर से उठाए गए सवालों और PMLA मामले में ‘मिडिल पाथ’ अपनाने की सलाह का भी जिक्र किया है।

जस्टिस संजय किशन कौल की किताब Without Fear or Favour के कुछ अंशों के आधार पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने 25 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कॉलेजियम की बैठकों में हुई बातचीत और तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ के साथ उनके मतभेदों के बारे में बताया है।

वहीं, पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में कौल ने PMLA मामले और जजों की नियुक्तियों से जुड़ा मामला अपनी बेंच से हटाए जाने के बारे में बात की।

PMLA केस में मुझे ‘मिडिल पाथ’ अपनाने को कहा: जस्टिस कौल

जस्टिस कौल ने पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में बताया कि PMLA यानी मनी लॉन्ड्रिंग रोकने से जुड़े कानून के प्रावधानों पर दोबारा विचार की मांग वाली याचिकाओं की सुनवाई से पहले तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया था।

उस समय जस्टिस कौल की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के ‘Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India’ फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग लंबित थी।

उस फैसले में कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती से जुड़ी शक्तियों समेत PMLA के कई अहम प्रावधानों को बरकरार रखा था।

जस्टिस कौल ने बताया कि उस बातचीत के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना भी मौजूद थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें मामले को आगे न बढ़ाने के लिए मनाने की कोशिश की और सुनवाई करने की स्थिति में सावधानी बरतने और ‘मिडिल पाथ’ यानी बीच का रास्ता अपनाने का सुझाव दिया था।

जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने सुनवाई आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि अगर वह पीछे हट जाते तो उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ सकते थे।

उन्होंने यह भी कहा कि अपने 22 साल के न्यायिक करियर में उन्होंने कभी केवल बीच का रास्ता अपनाने के लिए किसी मामले में सुनवाई नहीं की।

‘मैंने अपने न्यायिक करियर में बीच का रास्ता नहीं अपनाया’

जस्टिस कौल ने इंटरव्यू में कहा कि जब भी उन्हें किसी मामले की सुनवाई करना सही लगा, वह आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि PMLA मामले में भी उन्होंने अपनी इसी सोच के आधार पर सुनवाई जारी रखने का फैसला किया।

उन्होंने बताया कि बातचीत के बाद वह और जस्टिस खन्ना सुनवाई के लिए कोर्टरूम पहुंचे। जस्टिल कौल ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से बार-बार स्थगन मांगा जाता रहा और मामला उनकी सेवानिवृत्ति तक खिंच गया।

आखिरकार, जस्टिस कौल के रिटायरमेंट से कुछ समय पहले तीन जजों की बेंच भंग हो गई। जस्टिस कौल ने इंटरव्यू में अपने अनुभव साझा करते हुए यह बात बताई।

कॉलेजियम की बैठक से पहले सरकार की राय लेने पर उठाया सवाल

जस्टिस कौल जून 2022 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य बने थे। अपनी किताब में उन्होंने जजों की नियुक्तियों को लेकर चंद्रचूड़ के साथ मतभेदों का जिक्र किया है।

जस्टिस कौल ने कहा कि कॉलेजियम की औपचारिक बैठक में किसी नाम पर चर्चा से पहले सरकार की राय लेना उचित नहीं था।

उन्होंने सरकार से सामान्य बातचीत और कॉलेजियम की चर्चा से पहले उसकी मंजूरी लेने के बीच अंतर बताया। उनका मानना था कि ऐसा करने से नियुक्तियों में सरकार की भूमिका बढ़ने का गलत संकेत जा सकता है।

जस्टिस कौल ने लिखा कि उन्होंने तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ को सुझाव दिया था कि दोनों को सरकार के साथ बातचीत में एक साझा रुख अपनाना चाहिए। लेकिन उन्होंने कहा कि चंद्रचूड़ इस संबंध को अधिकतर अपने स्तर पर संभालना पसंद करते थे।

छह पदों के लिए पांच नामों पर सहमति, छठे पर मतभेद’

किताब में जस्टिस कौल ने सुप्रीम कोर्ट में छह रिक्त पदों को भरने के लिए हुई कॉलेजियम की चर्चा का भी जिक्र किया है।

उन्होंने बताया कि बैठक से पहले पांच नामों पर सहमति बन चुकी थी। बैठक के दिन तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने छठे उम्मीदवार का नाम प्रस्तावित किया।

जस्टिस कौल ने लिखा कि उन्हें संदेह हुआ कि यह नाम सरकार की ओर से सुझाया गया हो सकता है। उनके मुताबिक, तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें अलग ले जाकर पूछा कि क्या उन्हें सरकार की राय जानने के लिए फोन करना चाहिए।

जस्टिस कौल ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि कॉलेजियम की चर्चा के बीच ऐसा करना उचित नहीं होगा। जस्टिस कौल ने बताया कि आखिरकार 5 नामों पर सहमति बनी, जबकि छठे नाम को उस समय मंजूरी नहीं मिली।

उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति किसी की सिफारिश या पहुंच के आधार पर नहीं होनी चाहिए।

‘अल्पसंख्यक उम्मीदवार पर सरकार ने उठाए सवाल‘

जस्टिस कौल ने एक अन्य घटना का जिक्र किया है, जिसमें अल्पसंख्यक धर्म से जुड़े एक उम्मीदवार की नियुक्ति पर सरकार की ओर से सवाल उठाए गए थे।

सरकार ने सवाल उठाया था कि क्या सुप्रीम कोर्ट में उस धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत है, जबकि दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के जज पहले से ही मौजूद थे।

जस्टिस कौल ने लिखा कि इसके बाद उम्मीदवार के परिवार की धर्म परिवर्तन से पहले की जाति को लेकर भी सवाल किया गया। उन्होंने इस सवाल को गैर-जरूरी माना।

जस्टिस कौल ने तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ से कहा कि अगर जजों की नियुक्ति ऐसे सवालों के आधार पर होनी है, तो सरकार खुद ही नियुक्तियां कर सकती है।

जस्टिस कौल ने बताया कि इसके बाद उन्होंने फाइल बंद की और बैठक से बाहर चले गए। बैठक स्थगित हो गई और कुछ समय तक कॉलेजियम की बैठक नहीं हुई।

बाद में सरकार ने अपना रुख बदला और उम्मीदवार की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ी। हालांकि द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उम्मीदवार का नाम नहीं बताया गया है।

न्यायिक नियुक्तियों का मामला भी बेंच से हटने का किया दावा

जस्टिस कौल जस्टिस सुधांशु धूलिया के साथ उस बेंच में थे, जो केंद्र सरकार की ओर से कॉलेजियम की सिफारिशों पर कार्रवाई में देरी से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

जस्टिस कौल के मुताबिक, जब उनकी बेंच सरकार को लंबित सिफारिशों पर कार्रवाई के लिए प्रेरित कर रही थी, तब मामला अचानक उनकी बेंच की सुनवाई सूची से हटा दिया गया।

उन्होंने बताया कि इस बारे में पूछने पर सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने उन्हें बताया कि फाइल पर एक टिप्पणी थी कि शायद मामला उनकी बेंच को सौंपते समय तत्कालीन CJI की औपचारिक मंजूरी नहीं ली गई थी। इसी आधार पर मामला वापस लेने का फैसला किया गया था।

जस्टिस कौल ने इस तरीके पर तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ के सामने अपनी नाराजगी जताई। जब उनसे पूछा गया कि क्या केंद्र सरकार ने CJI पर मामला हटाने का दबाव डाला था, तो उन्होंने कहा कि इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहना मुश्किल है।

उन्होंने केवल इतना कहा कि तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ को लगा होगा कि उन्हें यह मामला नहीं सुनना चाहिए।

‘सरकार उन जजों का ज्यादा सम्मान करती है जिनकी रीढ़ मजबूत हो’

कॉलेजियम में सरकार की भूमिका पर जस्टिस कौल ने लिखा कि यह मानना सही नहीं होगा कि कॉलेजियम राजनीतिक दबाव से पूरी तरह अलग रह सकता है।

सरकारें अपने हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश करती हैं। ऐसे में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए जजों का अपने फैसलों पर मजबूती से खड़े रहना जरूरी है।

जस्टिस कौल ने लिखा, “मैंने पाया कि सरकार उन जजों का ज्यादा सम्मान करती है, जिनकी रीढ़ मजबूत होती है।” यह टिप्पणी कॉलेजियम में अपने अनुभवों को लेकर जस्टिस कौल की राय को दिखाती है।

किताब पढ़ने के बाद ही विस्तार से जवाब दे सकूंगा: चंद्रचूड़

जस्टिस कौल की किताब में लिखी बातों पर द इंडियन एक्सप्रेस को दी गयी प्रतिक्रिया में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने अभी किताब नहीं पढ़ी है। ऐसे में उसमें लिखी बातों का संदर्भ जाने बिना वह विस्तार से जवाब नहीं दे सकते।

उन्होंने कहा कि CJI रहते हुए कॉलेजियम की बैठकें अच्छी रहीं और जस्टिस कौल के साथ उनके संबंध भी सम्मानजनक थे। बैठकों में खुलकर बातचीत होती थी और हर मुद्दे पर तर्क के साथ चर्चा की जाती थी।

कॉलेजियम की बैठक से कौल के उठकर चले जाने की घटना पर उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा कुछ याद नहीं है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि कॉलेजियम की बैठकों के बाद प्रस्ताव पारित किए जाते थे। उन्हें किसी प्रस्ताव पर असहमति दर्ज होने की बात भी याद नहीं है।

जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका पर उन्होंने कहा कि नियुक्ति के वारंट पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं और इस प्रक्रिया में सरकार भी शामिल होती है।

जस्टिस कौल दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट के जज पद से रिटायर हुए थे। उनकी किताब में कॉलेजियम की बैठकों, जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका और तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ के साथ उनके अनुभवों का जिक्र है।

जहां कौल ने अपने अनुभव साझा किए हैं, वहीं चंद्रचूड़ ने किताब पढ़ने के बाद ही इन बातों पर विस्तार से जवाब देने की बात कही है।

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