Form 10-IC में देरी के बावजूद कंपनी को मिलेगा 22% टैक्स लाभ, HC ने कहा-Form 10-IC की देरी माफ कर मामले पर दोबारा फैसला करें
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आयकर कानून की तकनीकी प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर किसी कंपनी को वैधानिक टैक्स लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने Kanoria Energy and Infrastructure Limited को बड़ी राहत देते हुए आयकर विभाग द्वारा Form 10-IC दाखिल करने में देरी माफ करने से इनकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल की खंडपीठ ने कहा कि यदि करदाता ने आयकर रिटर्न में स्पष्ट रूप से Section 115BAA के तहत 22% की रियायती कर व्यवस्था चुन ली थी, तो केवल Form 10-IC समय पर अपलोड नहीं होने जैसी तकनीकी कमी के आधार पर लाभ रोकना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि यह “प्रोसीजरल/मैकेनिकल” चूक थी, न कि कोई मूलभूत कानूनी कमी।
मैसर्स Kanoria Energy and Infrastructure Limited (पूर्व में A Infrastructure Limited) की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिये यह फैसला दिया है।
कंपनी ने आयकर विभाग के 22 दिसंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें Form 10-IC देर से दाखिल करने पर देरी माफी की अर्जी खारिज कर दी गई थी।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता कंपनी एस्बेस्टस सीमेंट पाइप और रूफिंग शीट्स के निर्माण का काम करती है।
कंपनी ने Assessment Year 2020-21 के लिए 9 जनवरी 2021 को ITR-6 दाखिल किया और उसमें Section 115BAA के तहत 22% की रियायती कर व्यवस्था चुन ली। कंपनी ने कुल आय ₹5.21 करोड़ घोषित की थी।
लेकिन Centralised Processing Centre (CPC) ने रिटर्न प्रोसेस करते समय सामान्य टैक्स दर लागू कर दी और अतिरिक्त टैक्स डिमांड बना दी।
इसके खिलाफ कंपनी ने अपील की, जहां National Faceless Appeal Centre ने माना कि कंपनी ने Section 115BAA का विकल्प चुना था और Assessing Officer को रियायती टैक्स दर लागू करने का निर्देश दिया।
बाद में मामला Income Tax Appellate Tribunal पहुंचा, जहां कुछ कानूनी बिंदुओं पर दोबारा सुनवाई के लिए मामला Assessing Officer को वापस भेजा गया।
इसी दौरान विभाग ने आपत्ति उठाई कि कंपनी ने निर्धारित Form 10-IC दाखिल नहीं किया था।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ता कंपनी Kanoria Energy and Infrastructure Limited की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि आयकर विभाग द्वारा 22 दिसंबर 2025 को पारित आदेश पूरी तरह “non-application of mind” पर आधारित है।
कंपनी का कहना था कि विभाग ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार ही नहीं किया, विशेषकर इस तथ्य पर कि Form 10-IC पहले ही 30 जनवरी 2023 को दाखिल किया जा चुका था।
कंपनी ने कहा कि उसने Assessment Year 2020-21 के लिए समय पर ITR-6 दाखिल किया था और उसी में स्पष्ट रूप से Section 115BAA के तहत 22% concessional tax regime का विकल्प चुना था। इसलिए यह मानना गलत है कि कंपनी ने कभी यह विकल्प अपनाया ही नहीं।
कंपनी का कहना था कि Form 10-IC दाखिल न होना केवल एक प्रक्रियात्मक त्रुटि थी। कंपनी ने यह दलील दी कि जब उसने रिटर्न में concessional tax regime चुन ली थी और सभी substantive conditions पूरी कर दी थीं, तब केवल एक तकनीकी चूक के आधार पर लाभ नहीं रोका जा सकता।
कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि जैसे ही Assessing Officer ने remand proceedings के दौरान Form 10-IC को लेकर आपत्ति उठाई, कंपनी ने तुरंत 30 जनवरी 2023 को Form 10-IC दाखिल कर दिया और यह स्पष्ट किया कि यह oversight यानी अनजाने में हुई गलती थी।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि CBDT Circular No. 17/2024 एक beneficial circular है, जिसका उद्देश्य genuine hardship झेल रहे करदाताओं को राहत देना है। लेकिन विभाग ने इसे गलत तरीके से limitation provision की तरह लागू किया। कंपनी का कहना था कि Section 119(2)(b) को liberal interpretation के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
कंपनी ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले A.C. Surgipharma Private Ltd. vs. Deputy Commissioner of Income Tax पर भी भरोसा जताया और कहा कि procedural lapse के कारण substantive right छीना नहीं जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से एक और महत्वपूर्ण दलील दी गई कि विभाग स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि कंपनी ने आवश्यक जानकारी निर्धारित समय के भीतर जमा कर दी थी, लेकिन वह स्थानीय आयकर कार्यालय, भीलवाड़ा में जमा हुई थी, न कि Chief Commissioner, Udaipur के समक्ष।
कंपनी ने कहा कि condonation application केवल abundant caution के तौर पर दाखिल की गई थी, लेकिन विभाग ने उसकी गलत व्याख्या कर दी।
कंपनी ने अंत में कहा कि जब उसकी मंशा शुरू से स्पष्ट थी, Form 10-IC भी समय के भीतर दाखिल हो चुका था और genuine hardship भी साबित थी, तब केवल तकनीकी आधार पर concessional tax regime का लाभ रोकना कानून की भावना के विपरीत है।
प्रतिवादी (Income Tax Department) का पक्ष
आयकर विभाग की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि Section 115BAA के तहत concessional tax regime का लाभ लेने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
विभाग ने कहा कि Rule 21AE के तहत करदाता को निर्धारित समय सीमा के भीतर Form 10-IC दाखिल करना आवश्यक है।
विभाग ने कोर्ट को बताया कि Section 115BAA(5) स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि निर्धारित समय में और निर्धारित प्रारूप में विकल्प नहीं चुना गया, तो concessional tax regime का लाभ नहीं दिया जा सकता।
विभाग का यह भी कहना था कि कंपनी ने Form 10-IC 30 जनवरी 2023 को दाखिल किया, जबकि यह फॉर्म नियत तिथि तक दाखिल होना चाहिए था। इसलिए यह केवल प्रक्रियात्मक गलती नहीं बल्कि mandatory statutory requirement का उल्लंघन था।
विभाग ने यह भी कहा कि CBDT Circular No. 17/2024 के अनुसार Assessment Year 2020-21 के लिए condonation application दाखिल करने की अंतिम तिथि 31 मार्च 2024 थी।
लेकिन कंपनी ने condonation application 28 दिसंबर 2024 को दाखिल की, जो निर्धारित समय सीमा से काफी बाद की थी।
विभाग ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि आवेदन prescribed limitation period के बाद दाखिल हुआ, इसलिए मामला condonation के लिए fit case नहीं माना जा सकता। विभाग ने इसे maintainability का मुद्दा बताते हुए आवेदन खारिज कर दिया।
आयकर विभाग ने अदालत से कहा कि जब कानून और CBDT Circular स्पष्ट समय सीमा तय करते हैं, तब अदालत को procedural compliance को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विभाग के अनुसार concessional tax regime एक विशेष लाभ है और उसका लाभ तभी मिल सकता है जब assessee कानून द्वारा निर्धारित सभी formal requirements समय पर पूरी करे।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में विस्तृत फैसला करते हुए कहा कि आयकर विभाग ने तकनीकी प्रक्रिया को अत्यधिक कठोरता से लागू किया और करदाता के वास्तविक अधिकारों की अनदेखी की।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कई महत्वपूर्ण कानूनी अवलोकन (Observations) दर्ज किए।
हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम की तारीखवार समीक्षा की और पाया कि कंपनी ने शुरुआत से ही ITR-6 में Section 115BAA का विकल्प स्पष्ट रूप से चुना था।
हाईकोर्ट ने कहा कि Form 10-IC केवल प्रक्रियात्मक आवश्यकता थी।
कोर्ट ने यह भी माना कि कंपनी ने 30 जनवरी 2023 को Form 10-IC दाखिल कर दिया था, जो Circular No. 17/2024 के तहत तय तीन वर्ष की अवधि के भीतर था।
इसलिए विभाग द्वारा यह कहना कि condonation application 28 दिसंबर 2024 को दाखिल हुई, तकनीकी और गलत व्याख्या है।
खंडपीठ ने कहा कि विभाग ने दो अलग-अलग बातों को मिलाकर देखा, जिसमें Form 10-IC दाखिल करने की तारीख और देरी माफी आवेदन की तारीख शामिल हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि Circular का उद्देश्य Form 10-IC दाखिल करने में देरी को माफ करना था, न कि condonation application की तकनीकी तारीख के आधार पर राहत नकारना।
“तकनीकी आधार पर लाभ रोकना कानून की भावना के खिलाफ”
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि करदाता की मंशा स्पष्ट हो और उसने रिटर्न में लाभ का विकल्प चुन लिया हो, तो एक प्रक्रियात्मक चूक के कारण उसे दंडित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी ने सबसे पहले अवसर पर अपनी गलती स्वीकार की और Form 10-IC दाखिल कर दिया था, जो उसकी bona fide मंशा दर्शाता है।
हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष
खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में Circular की सभी शर्तें पूरी हो रही थीं, Form 10-IC निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल था, विभाग ने कानून की गलत व्याख्या की और कंपनी ने स्पष्ट रूप से Section 115BAA का विकल्प चुना था।
हाईकोर्ट ने 22 दिसंबर 2025 का विभागीय आदेश रद्द करते हुए Form 10-IC दाखिल करने में हुई देरी को माफ कर दिया और मामला पुनः सक्षम प्राधिकारी को मेरिट पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए भेज दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि अब प्राधिकारी देरी या limitation के मुद्दे पर विचार नहीं करेगा।
यह फैसला उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्होंने आयकर रिटर्न में concessional tax regime चुनी थी लेकिन तकनीकी या प्रक्रियात्मक कारणों से Form 10-IC समय पर दाखिल नहीं कर पाईं।