राज्य सरकार और एसीबी ने हाईकोर्ट में दाखिल किया जवाब; कहा-कोर्ट रिमांड के बाद हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं, गिरफ्तारी प्रक्रिया पूरी तरह विधिसम्मत
जयपुर। राजस्थान के पूर्व मंत्री डॉ. महेश जोशी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई होगी।
इस मामले में राज्य सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने हाईकोर्ट में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करते हुए याचिका का कड़ा विरोध किया है तथा इसे खारिज करने की मांग की है।
यह याचिका डॉ. महेश जोशी के पुत्र रोहित जोशी द्वारा दायर की गई है, जिसमें उन्होंने अपने पिता की गिरफ्तारी की प्रक्रिया को कानूनी रूप से चुनौती दी है।
मामले की सुनवाई राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक जैन की खंडपीठ करेगी।
सरकार ने कहा-याचिका सुनवाई योग्य नहीं
बुधवार को इस याचिका के जवाब में राज्य सरकार और एसीबी ने अपना विस्तृत प्रतिवाद प्रस्तुत किया।
सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया है कि याचिका कानूनी रूप से असंगत है और वर्तमान परिस्थितियों में इसकी सुनवाई नहीं की जा सकती।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत सक्षम न्यायालय द्वारा पारित रिमांड आदेश के आधार पर हो, तब हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं रहती।
कोर्ट रिमांड के बाद नहीं बनता हैबियस कॉर्पस का आधार
राज्य सरकार ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के State of Maharashtra vs Tasneem Rizwan Siddiquee (2018) तथा Serious Fraud Investigation Office vs Rahul Modi (2019) मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार न्यायालय द्वारा रिमांड आदेश पारित होने के बाद हिरासत न्यायिक हिरासत मानी जाती है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति की हिरासत को हैबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।
सरकार का कहना है कि याचिकाकर्ता ने 7 मई 2026 और 11 मई 2026 को पारित रिमांड आदेशों को सीधे चुनौती नहीं दी है।
केवल गिरफ्तारी की प्रक्रिया को आधार बनाकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करना कानून के अनुरूप नहीं है।
गिरफ्तारी से पहले जारी किया गया था लिखित प्राधिकरण
राज्य सरकार ने जवाब में कहा है कि मामले के जांच अधिकारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक महावीर प्रसाद शर्मा ने 6 मई 2026 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 55 के तहत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भूपेंद्र को डॉ. महेश जोशी की गिरफ्तारी के लिए विधिवत अधिकृत किया था।
जवाब में कहा गया है कि पुलिस दल निर्धारित आदेश के साथ डॉ. महेश जोशी के निवास पर पहुंचा और लगभग एक घंटे तक वहां मौजूद रहा।
उस समय महेश जोशी, उनके परिवारजन तथा पुत्र रोहित जोशी भी घर पर मौजूद थे।
राज्य सरकार का दावा है कि पुलिस अधिकारियों ने परिवार को पूरे मामले की जानकारी दी, गिरफ्तारी के आधार बताए तथा अधिकृत आदेश भी पढ़कर सुनाया।
परिवार को सूचना नहीं देने के आरोप का खंडन
याचिका में लगाए गए इस आरोप का भी राज्य सरकार ने खंडन किया है कि परिवार को गिरफ्तारी की जानकारी नहीं दी गई थी।
सरकार ने कहा है कि गिरफ्तारी के समय परिवार को मामले की जानकारी दी गई थी। इतना ही नहीं, बाद में एसीबी अधिकारियों ने रोहित जोशी से फोन पर भी संपर्क किया और उन्हें कार्रवाई से अवगत कराया।
राज्य ने अपने जवाब के साथ मोबाइल कॉल रिकॉर्ड तथा स्क्रीनशॉट भी संलग्न किए हैं। सरकार का दावा है कि इन दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि रोहित जोशी को गिरफ्तारी और उसके आधारों की जानकारी उपलब्ध कराई गई थी।
वकील की मौजूदगी का भी दिया हवाला
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि डॉ. महेश जोशी को उनकी पसंद के अधिवक्ता की कानूनी सहायता लगातार उपलब्ध रही।
जवाब में उल्लेख किया गया है कि गिरफ्तारी के बाद जब महेश जोशी को न्यायालय में पेश किया गया, तब उनके अधिवक्ता भी मौजूद थे।
इतना ही नहीं, उसी दिन गिरफ्तारी को चुनौती देने वाला आवेदन भी संबंधित न्यायालय में दायर किया गया था।
सरकार का तर्क है कि जब आरोपी को प्रभावी कानूनी सहायता मिल रही हो और वह अपने संवैधानिक तथा वैधानिक अधिकारों का उपयोग कर रहा हो, तब केवल तकनीकी आधार पर गिरफ्तारी को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का भी उल्लेख
राज्य सरकार ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों Vihaan Kumar vs State of Haryana (2025), Mihir Rajesh Shah vs State of Maharashtra (2025) तथा State of Karnataka vs Sri Darshan (2025) का भी हवाला दिया है।
सरकार का कहना है कि इन निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में किसी कथित प्रक्रियात्मक त्रुटि को तभी गंभीर माना जाएगा, जब उससे आरोपी को वास्तविक नुकसान या पूर्वाग्रह (Prejudice) हुआ हो।
राज्य का तर्क है कि इस मामले में डॉ. महेश जोशी को आरोपों की जानकारी थी, उन्हें वकील की सहायता उपलब्ध थी और उन्होंने अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग भी किया। इसलिए गिरफ्तारी को केवल तकनीकी आधार पर अवैध नहीं कहा जा सकता।
रिमांड आदेश में भी दर्ज है सूचना देने का उल्लेख
राज्य सरकार ने जवाब में यह भी कहा कि 7 मई 2026 को पारित रिमांड आदेश में ट्रायल कोर्ट ने यह रिकॉर्ड किया था कि पुलिस द्वारा परिवार को गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दे दी गई थी।
सरकार का आरोप है कि याचिकाकर्ता ने इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख हाईकोर्ट के समक्ष नहीं किया और अदालत के सामने अधूरी तस्वीर प्रस्तुत की।
दो मंचों पर समान राहत मांगने का आरोप
राज्य सरकार ने रोहित जोशी पर एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग मंचों का सहारा लेने का आरोप भी लगाया है।
सरकार के अनुसार, जब हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की गई, उस समय ट्रायल कोर्ट के समक्ष गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने का आवेदन पहले से लंबित था। बाद में ट्रायल कोर्ट ने 8 जून 2026 को उस आवेदन को खारिज कर दिया।
राज्य का कहना है कि कानून किसी व्यक्ति को समान राहत प्राप्त करने के लिए एक साथ दो अलग-अलग मंचों पर कार्यवाही चलाने की अनुमति नहीं देता। इसलिए याचिका इस आधार पर भी खारिज किए जाने योग्य है।
न्यायिक हिरासत में हैं महेश जोशी
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि 7 मई 2026 को पारित रिमांड आदेश के बाद डॉ. महेश जोशी की हिरासत न्यायिक नियंत्रण में आ गई थी।
इसके बाद 11 मई 2026 को उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया।
ऐसी स्थिति में वर्तमान हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सक्षम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पर आधारित है।
याचिका खारिज करने की मांग
राज्य सरकार और एसीबी ने अपने जवाब में अंततः राजस्थान हाईकोर्ट से प्रार्थना की है कि रोहित जोशी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज किया जाए, क्योंकि डॉ. महेश जोशी की हिरासत विधिसम्मत है, सक्षम न्यायालय के आदेशों के तहत है और याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है।
शुक्रवार को होगी अहम सुनवाई
राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल किए जाने के बाद खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार के लिए निर्धारित की थी।
अब दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट इस मामले में कोई महत्वपूर्ण आदेश पारित कर सकता है।