उम्रकैद काट रहे कैदी की गंभीर बीमारी, रीढ़ की सर्जरी, दिल में दो स्टेंट और 17 बार समय पर सरेंडर को माना अहम; हाईकोर्ट बोला- न्याय केवल सजा नहीं, मानव गरिमा की रक्षा भी है।
जोधपुर। हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी को पिछले तीन वर्षों में कुल 17 बार अंतरिम जमानत मिल चुकी हैं।
केवल ट्रायल के दौरान ही 13 बार और ट्रायल कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाने के बाद भी 4 बार जेल से बाहर आ चुका है।
हत्या के गंभीर मामले के दोषी कैदी को अब राजस्थान हाईकोर्ट ने नियमित राहत देते हुए उसकी सजा निलंबित कर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
पहली नजर में यह मामला चौंकाने वाला लग सकता है कि हत्या के दोषी को बार-बार जमानत कैसे मिलती रही और आखिर अदालत ने उसे नियमित जमानत क्यों दे दी।
लेकिन जब अदालत के सामने रखे गए मेडिकल रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखा गया तो यह मामला एक सामान्य आपराधिक केस से कहीं अधिक मानवीय और संवेदनशील बन गया।
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ के जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस सुनील बेनीवाल की विशेष अवकाशकालीन खंडपीठ ने चूरू जिले के बीदासर निवासी कानाराम पुत्र पूसाराम की सजा को अंतिम निर्णय तक निलंबित करने का आदेश देते हुए नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
हत्या के मामले में काट रहा है उम्रकैद
राजस्थान हाईकोर्ट से बार-बार राहत पाने वाले कानाराम को वर्ष 2023 में 11 अक्टूबर को चूरू की विशेष एससी-एसटी अदालत ने हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत हत्या का दोषी माना था।
इसके अलावा उसे धारा 341, 323/34 आईपीसी तथा आर्म्स एक्ट की धारा 4/25 के तहत भी दंडित किया गया था।
इसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपील दायर कर सजा को चुनौती दी थी।
अपील अभी लंबित है और इसी दौरान उसने तीसरी बार सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
दोषसिद्धि के बाद कानाराम ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर सजा को चुनौती दी। इसी अपील के लंबित रहने के दौरान उसने सजा निलंबन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया, जिस पर हाईकोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह राहत प्रदान की।
बीमारी जिसने बदल दिया पूरा मामला?
मामले का सबसे अहम पहलू कानाराम की स्वास्थ्य स्थिति रही।
अदालत के समक्ष एसएमएस अस्पताल जयपुर के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बताया गया कि वह गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) नामक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित है।
मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार कानाराम GBS के गंभीर AMSAN वेरिएंट से पीड़ित है, जिसे इस बीमारी का सबसे खतरनाक स्वरूप माना जाता है।
क्या है गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS)?
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रस्तुत मेडिकल रिकॉर्ड और एसएमएस अस्पताल जयपुर के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में बताया गया कि कानाराम Guillain-Barré Syndrome (GBS) के गंभीर AMSAN Variant से पीड़ित है।
यह एक दुर्लभ लेकिन अत्यंत गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं तंत्रिका तंत्र पर हमला करने लगती है।
परिणामस्वरूप मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान बाधित हो जाता है।
इस बीमारी के कारण रोगी में—
- मांसपेशियों की शक्ति कम हो जाती है,
- हाथ-पैर काम करना बंद कर सकते हैं,
- शरीर में लकवे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है,
- संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है,
- सांस लेने में परेशानी हो सकती है,
- मूत्र एवं मल त्याग की सामान्य प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है,
- रोगी पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो सकता है।
अदालत ने माना कि यह बीमारी कई मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकती है तथा इसके उपचार और पुनर्वास में लंबा समय लगता है।
जेल में दूसरे कैदियों के सहारे गुजर रही जिंदगी
कानाराम के अधिवक्ता कालूराम भाटी ने राजस्थान हाईकोर्ट में उसके स्वास्थ्य को लेकर याचिका दायर की।
याचिका में बताया कि बीमारी के कारण कानाराम की शारीरिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि वह अपने दैनिक कार्य भी स्वतंत्र रूप से नहीं कर पाता।
जेल में उसे नहाने, उठने-बैठने और अन्य नित्य कार्यों के लिए दूसरे कैदियों की सहायता लेनी पड़ती है। उसका अधिकांश समय दूसरों पर निर्भर होकर गुजरता है।
मेडिकल रिपोर्ट में भी शरीर के ऊपरी और निचले हिस्सों में कमजोरी, तंत्रिका तंत्र की क्षति और लगातार फिजियोथेरेपी की आवश्यकता दर्ज की गई।
रीढ़ की सर्जरी, दिल में दो स्टेंट
बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कानाराम को रीढ़ की हड्डी की गंभीर समस्या के चलते बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा।
रिकॉर्ड के अनुसार उसकी लमिनेक्टॉमी और डिस्केक्टॉमी जैसी न्यूरोसर्जरी हुई। इसके बाद भी उसकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
इतना ही नहीं, उसे हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं भी हैं। उसके दिल में दो स्टेंट लगाए जा चुके हैं और उसका रक्तचाप लगातार अस्थिर बना रहता है।
17 बार जेल से बाहर, लेकिन नहीं तोड़ी शर्त
सुनवाई के दौरान कानाराम की ओर से अधिवक्ता कालूराम भाटी ने अदालत को बताया कि कानाराम को ट्रायल के दौरान 13 बार और सजा होने के बाद 4 बार अंतरिम राहत मिली थी।
इसके अलावा इलाज के लिए उसे 90 दिन और 60 दिन की अवधि तक भी रिहा किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि हर बार अदालत से राहत मिलने के बाद उसने तय समय पर आत्मसमर्पण किया।
उसके खिलाफ कभी भी जमानत का दुरुपयोग करने या फरार होने का आरोप नहीं लगा।
हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के आचरण पर कोई सवाल नहीं उठा है।
हाईकोर्ट ने मानवीय गरिमा को बताया महत्वपूर्ण
अपने विस्तृत आदेश में अदालत ने कहा कि किसी भी दोषसिद्ध व्यक्ति की सजा को निलंबित करने का प्रश्न केवल कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं है।
अदालत ने कहा कि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित है जो उसे लगभग असहाय बना देती है, तो न्यायालयों का दायित्व केवल दंड व्यवस्था को लागू करना नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों की रक्षा करना भी है।
खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था मानवता से अलग नहीं हो सकती। यदि कोई दोषी गंभीर और प्रगतिशील बीमारी से पीड़ित है तथा लगातार देखभाल की आवश्यकता रखता है, तो अदालत को न्याय और करुणा के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
लंबित अपीलों का बोझ भी बना कारण
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि देशभर में लंबित आपराधिक अपीलों की बड़ी संख्या एक वास्तविकता है।
अदालत ने कहा कि अपीलों के अंतिम निस्तारण में लंबा समय लग सकता है। यदि किसी दोषी की अपील शीघ्र सुनवाई के लिए नहीं आ सकती और उसके पास ऐसे महत्वपूर्ण आधार मौजूद हैं जिन पर उसे अंतिम सुनवाई में राहत मिल सकती है, तो केवल अपील लंबित रहने के कारण उसे अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।
खंडपीठ ने कहा कि कानाराम की अपील में उठाए गए मुद्दे प्रथम दृष्टया विचारणीय हैं और अंतिम सुनवाई में विस्तृत साक्ष्य पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का लिया सहारा
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय मुना बिसोई बनाम ओडिशा राज्य तथा ऐतिहासिक निर्णय कश्मीरा सिंह बनाम पंजाब राज्य का भी उल्लेख किया।
इन निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि अपीलों के निस्तारण में अत्यधिक समय लग रहा हो और दोषी इसके लिए जिम्मेदार न हो, तो यह सजा निलंबन के लिए महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इन्हीं सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि लंबित अपीलों की स्थिति और याचिकाकर्ता की स्वास्थ्य परिस्थितियां उसे राहत देने के लिए पर्याप्त हैं।
अदालत ने माना असाधारण मामला
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सामान्य मामला नहीं है।
अदालत के अनुसार—
- गंभीर GBS बीमारी,
- रीढ़ की सर्जरी,
- हृदय संबंधी समस्याएं,
- दो स्टेंट,
- लगातार चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता,
- पूर्व में कई बार दी गई अंतरिम राहत,
- जमानत का कभी दुरुपयोग न होना,
- अपील में उठाए गए महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे,
- तथा अपील के शीघ्र निस्तारण की संभावना कम होना,
इन सभी परिस्थितियों को मिलाकर देखा जाए तो यह एक “असाधारण मामला” बनता है, जिसमें सजा निलंबित करना उचित है।
50 हजार के निजी मुचलके पर रिहाई
इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कानाराम की सजा को अंतिम अपील के निर्णय तक निलंबित करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 50,000 रुपये के निजी मुचलके और 25-25 हजार रुपये की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया है।
साथ ही उसे हर वर्ष जनवरी माह में ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होने और पता बदलने की स्थिति में कोर्ट को सूचित करने की शर्त पर यह राहत दी गई है।
हाईकोर्ट ने कहा- न्याय सिर्फ सजा नहीं, मानवता भी
अपने विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दोषी को जेल भेजना न्याय व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन न्याय केवल दंड देने तक सीमित नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति ऐसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाए कि वह अपने दैनिक जीवन के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो जाए, तब अदालतों को मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था मानवता से अलग नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में अदालत को कानून और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाना होता है।
परिवार की देखभाल का कोई विकल्प नहीं
हाईकोर्ट ने माना कि कुछ परिस्थितियों में केवल चिकित्सा सुविधा पर्याप्त नहीं होती।
ऐसे मरीजों को परिवार का भावनात्मक सहयोग, व्यक्तिगत देखभाल और लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है। GBS जैसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को केवल अस्पताल नहीं बल्कि पारिवारिक सहयोग भी चाहिए होता है।
इसी मानवीय पहलू को देखते हुए अदालत ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान याचिकाकर्ता को जेल में बनाए रखना उचित नहीं होगा।
अपील में उठाए गए हैं गंभीर कानूनी सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि कानाराम की अपील में ऐसे कई कानूनी और तथ्यात्मक प्रश्न उठाए गए हैं, जिनकी अंतिम सुनवाई के दौरान विस्तृत जांच और साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता होगी।
अदालत ने कहा कि यदि अपील में उठाए गए तर्क स्वीकार किए जाते हैं तो याचिकाकर्ता को लाभ भी मिल सकता है।
क्यों बना यह फैसला चर्चा का विषय?
यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि हत्या के दोषी को पिछले तीन वर्षों में 17 बार अंतरिम राहत मिल चुकी थी।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज कर नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता की असाधारण स्वास्थ्य परिस्थितियों, उसके अनुशासित आचरण और मानवीय आधारों को देखते हुए दी गई है।
