हैदराबाद: NALSAR विवाद में अब नया मोड़ आ गया है। NALSAR के स्टूडेंट बार काउंसिल ने बयान जारी कर पूरे घटनाक्रम पर कड़ा विरोध जताते हुए BCI चेयरमैन से माफी की मांग की है।
नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के स्टूडेंट बार काउंसिल ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के सर्कुलर वाले कदम और चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की टिप्पणियों पर खुलकर नाराजगी जताई।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने बीसीआई चेयरमैन मनन मिश्रा से उनकी टिप्पणियों को लेकर औपचारिक माफी की मांग की है।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने कहा कि किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करना या उसके फैसले पर सवाल उठाना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी वैध सवालों और आलोचना से ऊपर नहीं हैं।
छात्रों ने कहा कि विरोध करना, असहमति जताना और ताकत रखने वालों से जवाब मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। यह बात NALSAR के स्टूडेंट बार काउंसिल ने 15 अगस्त को जारी अपने बयान में कही है।
यह विवाद 13 अगस्त को हुए घटनाक्रम से जुड़ा है।
बीसीआई चेयरमैन ने पहले NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने वाला सर्कुलर जारी किया था।
बाद में दूसरा सर्कुलर जारी कर नामांकन रोकने का फैसला वापस लिया गया, लेकिन छात्रों के विरोध से जुड़े लोगों की जांच की बात कही गई।
उसी रात मनन मिश्रा ने सोशल मीडिया पर कहा कि NALSAR के खिलाफ सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई है।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने भी सर्कुलर वापस लिए जाने की बात स्वीकार की है, लेकिन पूरे घटनाक्रम पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
मनन मिश्रा से माफी की मांग
स्टूडेंट बार काउंसिल ने मनन मिश्रा की उस टिप्पणी पर सबसे ज्यादा आपत्ति जताई है, जिसमें उन्होंने कुछ शिक्षकों और बाहरी लोगों पर छात्रों को विरोध के लिए उकसाने का आरोप लगाया था।
बयान में कहा गया है कि बाद में सोशल मीडिया पर कार्यवाही खत्म करने की बात कही गई, लेकिन इन आरोपों को साफ तौर पर वापस नहीं लिया गया।
इसी वजह से स्टूडेंट बार काउंसिल ने बीसीआई चेयरमैन से ऐसी टिप्पणियां करने के लिए औपचारिक माफी मांगने को कहा है।
छात्रों ने यह भी कहा कि शिक्षकों, पूर्व छात्रों, शोधार्थियों और दूसरे लोगों की पहचान पता करने की कोशिश करना सही नहीं था।
उनके मुताबिक, इस तरह की जानकारी मांगने से उन लोगों की निजता पर असर पड़ सकता है।
‘CJI भी सवालों से ऊपर नहीं’
स्टूडेंट बार काउंसिल ने अपने बयान में कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में असहमति के लिए जगह होना जरूरी है।
छात्रों ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में मिले बोलने और अपनी बात रखने के अधिकार का हवाला दिया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं।
बयान में सबसे साफ शब्दों में कहा गया है कि कोई भी संस्था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी शामिल हैं, संवैधानिक लोकतंत्र में वैध जांच-परख से ऊपर नहीं है।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं।
बीसीआई के अधिकार पर सवाल
स्टूडेंट बार काउंसिल ने बीसीआई की ओर से छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने और जांच की मांग को लेकर उसके कानूनी अधिकार पर भी सवाल उठाया है।
बयान में एडवोकेट्स एक्ट की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा गया है कि यूनिवर्सिटी से जुड़े मामले में बीसीआई की भूमिका मुख्य तौर पर पेशेवर आचरण के मानक और कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने से जुड़ी है।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने धारा 24ए का भी हवाला दिया।
उसका कहना है कि वकील के रूप में नामांकन से रोकने की वजहें कानून में पहले से तय हैं।
ऐसे में 2026 बैच के सभी छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने का बीसीआई का निर्देश उसकी तय कानूनी शक्तियों के दायरे में नहीं आता।
बयान में धारा 49 का भी जिक्र किया गया है।
छात्रों का कहना है कि यह धारा बीसीआई को नियम बनाने की शक्ति देती है, लेकिन इसके जरिए कानून में तय नियमों से आगे जाकर नामांकन की नई शर्तें नहीं जोड़ी जा सकतीं।
‘हरिश उप्पल’ फैसले पर भी सवाल
नालसार के स्टूडेंट बार काउंसिल ने बीसीआई की ओर से हरिश उप्पल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला दिए जाने पर भी आपत्ति जताई है।
बयान के मुताबिक, वह मामला वकीलों की हड़ताल और बहिष्कार से जुड़ा था, खासकर तब जब उससे न्यायिक कामकाज प्रभावित हो रहा था।
छात्रों का कहना है कि उस फैसले में बीसीआई की शक्तियों को उसी खास मामले के संदर्भ में देखा गया था।
इसलिए उसी फैसले के आधार पर छात्रों के विरोध के मामले में बीसीआई को नई शक्ति नहीं मिल सकती।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने कहा कि किसी फैसले में कही गई बात को उसके मूल संदर्भ से अलग करके इस्तेमाल करना सही नहीं होगा।
आदेश वापस, लेकिन सवाल बाकी
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार के छात्रों ने यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी।
इसके बाद बीसीआई की ओर से पहले 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने वाला पत्र जारी किया गया।
बाद में दूसरा पत्र जारी कर नामांकन रोकने का फैसला बदला गया, लेकिन विरोध शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने वालों की पहचान कर जांच की मांग रखी गई।
कुछ समय बाद मनन मिश्रा ने सोशल मीडिया पर कहा कि नालसार के खिलाफ सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई है।
स्टूडेंट बार काउंसिल ने अपने बयान में इस फैसले को स्वीकार किया है। लेकिन उसने कहा कि सिर्फ पत्र वापस लेने से पहले लगाए गए आरोप और उस कार्रवाई को लेकर उसकी आपत्ति खत्म नहीं होती।
इसी वजह से उसने मनन मिश्रा से माफी की मांग की है। यानी नालसार विवाद में अब छात्रों ने अपनी तरफ से साफ जवाब दिया है।
उनका कहना है कि विरोध और असहमति को दबाने के बजाय उसका जवाब दिया जाना चाहिए। साथ ही किसी भी संवैधानिक संस्था को सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता।