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प्लेसमेंट एजेंसी से संविदा नियुक्ति मामले में विभागीय अधिकारियों के खिलाफ अवमानना नहीं – राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: No Contempt in Contractual Appointment Made via Placement Agency

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से संविदा आधार पर नियुक्त कर्मचारियों के मामलों में, विभागीय अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही नहीं बनती।

जस्टिस अनुरूप सिंघी की एकलपीठ ने कोटा निवासी निलोफर खान की ओर से दायर अवमानना याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया हैं.

याचिकाकर्ता निलोफर खान ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव, सीएमएचओ कोटा सहित चार को पक्षकार बनाया था.

याचिका में कहा गया कि राजस्थान हाईकोर्ट की अन्य पीठ द्वारा 22 मार्च 2024 को उसके पक्ष में अंतरिम आदेश देते हुए याचिकाकर्ता को पूर्व में कार्यरत जी.एन.एम. (जनरल नर्सिंग मिडवाइफरी) के पद पर काम जारी रखने की अनुमति दी थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि हाईकोर्ट के स्पष्ट अंतरिम आदेश के बावजूद 26 जुलाई 2024 से उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं, जो कि कोर्ट आदेश की अवहेलना है।

इसी को आधार बनाते हुए उन्होंने राज्य सरकार, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, कोटा तथा संबंधित प्लेसमेंट एजेंसी के प्रबंधकों को अवमानना याचिका में प्रतिवादी बनाया।

सरकार का जवाब

राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग की ओर से अवमानना याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता निलोफर खान कभी भी सीधे राज्य सरकार या चिकित्सा विभाग की कर्मचारी नहीं रहीं।

उनकी नियुक्ति एक निजी प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से संविदा आधार पर की गई थी।

ऐसे में याचिकाकर्ता और विभागीय अधिकारियों के बीच किसी प्रकार का प्रत्यक्ष अनुबंध या नियोक्ता-कर्मचारी संबंध (प्राइवीटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट) अस्तित्व में नहीं था।

एजेंसी का अनुबंध समाप्त

राज्य सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि जिस प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से याचिकाकर्ता की नियुक्ति हुई थी, उसका अनुबंध विभाग के साथ समाप्त हो चुका है।

अनुबंध की अवधि पूरी होने के बाद एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

ऐसे में इसे कोर्ट के आदेश की जानबूझकर अवहेलना नहीं माना जा सकता और न ही विभागीय अधिकारियों पर अवमानना का आरोप लगाया जा सकता है।

हाईकोर्ट का आदेश

दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस अनुरूप सिंघी ने अपने आदेश में कहा कि यह तथ्य निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से संविदा पर हुई थी।

इसके साथ ही यह भी स्वीकार तथ्य है कि विभाग और संबंधित प्लेसमेंट एजेंसी के बीच अनुबंध समाप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को सेवा में बनाए रखने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अवमानना की कार्यवाही तभी बनती है जब किसी न्यायिक आदेश की जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण अवहेलना की जाए।

वर्तमान मामले में न तो विभागीय अधिकारियों द्वारा किसी आदेश की जानबूझकर अवहेलना की गई और न ही ऐसा कोई ठोस आधार सामने आया, जिससे अवमानना का मामला बनता हो।

इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने निलोफर खान की अवमानना याचिका को खारिज कर दिया और सभी नोटिस निरस्त कर दिए।

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