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क्या है ‘रोमियो-जूलियट कानून’? राजस्थान हाईकोर्ट ने क्यों बताई POCSO में इसकी जरूरत, केंद्र को दिया सुझाव

Rajasthan High Court Flags POCSO Misuse, Backs ‘Romeo-Juliet Clause’ to Protect Consensual Teen Relationships

जयपुर। देश के आपराधिक कानूनों खासतौर से POCSO कानून में बड़े सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक बहस फिर तेज हो गई है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम यानी POCSO Act के दुरुपयोग पर कड़ा संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जोड़ने का स्पष्ट और गंभीर सुझाव दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी इस दिशा में चिंता जता चुका है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि POCSO जैसे कठोर कानून का मकसद बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि आपसी सहमति से बने किशोर या युवा संबंधों को अपराध घोषित कर उनका भविष्य तबाह करना। कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल कानून की व्याख्या है, बल्कि समाज और शासन—दोनों के लिए एक चेतावनी भी।

POCSO के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट की दो-टूक

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने माना कि देशभर में दर्ज POCSO मामलों का एक बड़ा हिस्सा ‘Romeo-Juliet’ प्रकृति का है।

यानी ऐसे मामले, जहां दो किशोर या किशोर-युवा आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं, लेकिन उम्र के तकनीकी अंतर या परिवार की सामाजिक असहमति के कारण पूरे मामले को गंभीर आपराधिक मुकदमे में बदल दिया जाता है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा—

“POCSO का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, न कि सामाजिक रूप से अस्वीकार्य लेकिन सहमति पर आधारित रिश्तों को अपराध बनाकर युवाओं को अपराधी घोषित करना।”

17 वर्षीय किशोरी और 19 वर्षीय युवक का मामला

यह ऐतिहासिक टिप्पणी एक वास्तविक और संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई।

मामला 17 वर्षीय किशोरी और 19 वर्षीय युवक के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों का था। परिवार की असहमति के बाद युवक के खिलाफ POCSO, अपहरण और अन्य गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी गई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंध पूरी तरह सहमति आधारित था और किसी प्रकार का शोषण या दबाव नहीं था.

कोर्ट ने माना कि इस मामले में केवल उम्र का तकनीकी अंतर आपराधिक कार्रवाई का आधार बना.

इसके बाद हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 528 के तहत अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और पूरा ट्रायल रद्द कर दिया।

“POCSO का अंधाधुंध प्रयोग न्याय के खिलाफ”

कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सहमति से बने रिश्तों पर POCSO का मशीनी और अंधाधुंध प्रयोग न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है.

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाइ सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी करना हैं और युवाओं के भविष्य को स्थायी नुकसान पहुंचाता है

अदालत ने आगाह किया कि यदि इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगी, तो कानून संरक्षण की जगह दमन का औज़ार बन जाएगा।

कानून में बदलाव की ज़रूरत क्यों?

राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और कानून निर्माताओं को स्पष्ट सुझाव देते हुए कहा कि 16 से 18 वर्ष के बीच आपसी सहमति पर आधारित निकट आयु अंतर (Close-in-Age Exception) वाले मामलों में एक विशेष अपवाद या न्यायिक विवेक का प्रावधान होना चाहिए, ताकि अदालतें परिस्थितियों के अनुसार सही और संतुलित फैसला दे सकें।

क्या है ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’?

‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ का उद्देश्य उन किशोरों और युवाओं को कानूनी सुरक्षा देना है जो लगभग समान उम्र के हों, जिनका रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित हो.

इस क्लॉज के तहत ऐसे मामलों को आपराधिक श्रेणी से बाहर रखा जाता है, ताकि किशोर अपराधी न बनें और उनके करियर और सामाजिक जीवन पर आजन्म दाग न लगे.

इसका नाम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘रोमियो और जूलियट’ से लिया गया है, जो युवा प्रेम और सामाजिक विरोध की त्रासदी को दर्शाता है।

कहां से हुई इसकी शुरुआत?

इस प्रावधान की शुरुआत सबसे पहले अमेरिका में हुई। वहां यह महसूस किया गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में गिना जा रहा है.

इसके बाद कई अमेरिकी राज्यों ने Romeo-Juliet Laws अपनाए। बाद में कुछ अन्य देशों ने भी ऐसे ही प्रावधान अपने कानूनों में शामिल किए।

किन मामलों में मिलती है राहत?

आमतौर पर इस क्लॉज के तहत राहत तभी मिलती है जब दोनों पक्षों की उम्र में सीमित अंतर हो, यह अंतर आमतौर पर 2 से 5 वर्ष के बीच हो.

भारत में चल रही बहस के अनुसार 16 वर्ष या उससे अधिक उम्र और अधिकतम 3 वर्ष के उम्र अंतर वाले रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने पर विचार हो रहा है।

परिवार, समाज और आपराधिक कानून

सुप्रीम कोर्ट और अब राजस्थान हाईकोर्ट—दोनों ने माना है कि कई मामलों में परिवार की असहमति या सामाजिक दबाव के कारण POCSO का सहारा लिया जाता है।

जब किशोर घर से भाग जाते हैं या अपनी पसंद से शादी की बात करते हैं, तो सबसे आसान हथियार POCSO बन जाता है, और सहमति होते हुए भी युवक जेल पहुंच जाता है।

सहमति की उम्र: कैसे बदला कानून?

भारत में पहले लड़कियों के लिए सहमति की उम्र 16 वर्ष थी, 2012 में POCSO लागू होने के बाद इसे 18 वर्ष कर दिया गया.

यह बदलाव संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन के अनुरूप था, लेकिन 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद 18 वर्ष से कम उम्र में सहमति भी अपराध बन गई।

सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट दोनों का संदेश साफ है कानून का उद्देश्य सुरक्षा है, विनाश नहीं।
‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसे प्रावधान से वास्तविक यौन अपराधियों पर सख्ती बनी रहेगी और सहमति से जुड़े किशोर रिश्तों में न्यायपूर्ण संतुलन आएगा.

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