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‘तलाक के बाद पिता की सहमति नहीं होने पर भी नहीं रोक सकते बच्चे का पासपोर्ट’, हाईकोर्ट का पासपोर्ट अथॉरिटी को तुरंत पासपोर्ट जारी करने का आदेश; कहा- बच्चे का भविष्य किसी एक अभिभावक की इच्छा पर निर्भर नहीं

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POCSO मामलों में नोटिस सर्विस की प्रक्रिया में पुलिस की लापरवाही!, राजस्थान हाईकोर्ट ने DGP समेत 3 अफसरों को गाइडलाइन लागू करने के निर्देश दिए

POCSO Bail Notices: Rajasthan HC Pulls Up Police Lapses, Directs DGP and Two Officials to Ensure Compliance

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने POCSO मामलों में नोटिस सर्विस की तय प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं होने पर नाराजगी जताई है।

हाईकोर्ट ने DGP राजस्थान, लॉ एंड लीगल अफेयर्स डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और RALSA के मेंबर सेक्रेटरी को पूरे राज्य में तय गाइडलाइन लागू कराने के निर्देश दिए हैं।

पूरे राजस्थान में पुलिस थानों, सरकारी वकीलों और दूसरे संबंधित अधिकारियों को तय प्रक्रिया के मुताबिक काम करने के लिए गाइडलाइन जारी करनी होगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि पहले से तय गाइडलाइन के बावजूद POCSO मामलों में सूचना देने की प्रक्रिया ठीक से नहीं अपनाई जा रही।

पीड़ित बच्चे के माता-पिता या अभिभावक तक जमानत अर्जी की जानकारी समय पर नहीं पहुंचाई जा रही है। कोर्ट ने कहा कि कई बार जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान ही नोटिस देने के लिए और समय मांगा जाता है। इससे जमानत मामलों की सुनवाई में देरी होती है।

इसका असर पीड़ित परिवार को मिलने वाली कानूनी मदद पर भी पड़ रहा है। साथ ही, कोर्ट ने कहा कि ऐसी देरी से आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रभावित होती है।

जस्टिस संदीप शाह ने यह आदेश सोनू गुर्जर और कालूराम की जमानत अर्जियों पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने फिलहाल दोनों मामलों में जमानत पर फैसला नहीं किया और एक सप्ताह बाद सुनवाई के लिए मामला लगाने के निर्देश दिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आरएस चौधरी, ओपी चौधरी और राकेश मटोरिया ने कोर्ट में पक्ष रखा। वहीं, राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील पवन भाटी ने पैरवी की।

नोटिस पर सिर्फ हस्ताक्षर, लेकिन नाम और तारीख दर्ज नहीं

यह मामला सोनू गुर्जर और कालूराम की जमानत अर्जियों से जुड़ा है। दोनों पॉक्सो कानून से संबंधित मामलों में जिला जेल, ब्यावर में बंद हैं।

कालूराम की जमानत अर्जी के दौरान सरकारी वकील ने 8 सितंबर 2026 का एक नोटिस पेश किया। इसमें बताया गया था कि पीड़ित के माता-पिता को जमानत अर्जी दाखिल होने की जानकारी दे दी गई है।

लेकिन कोर्ट ने नोटिस की जांच की तो उसमें सिर्फ नीचे हस्ताक्षर मिले। जिस व्यक्ति को नोटिस दिया गया, उसका नाम या पहचान दर्ज नहीं थी।

नोटिस में यह भी नहीं बताया गया था कि उसे किस तारीख और किस समय प्राप्त किया गया। कोर्ट ने इसे पहले से तय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं माना।

हाईकोर्ट पहले ही तय कर चुका है नोटिस देने की प्रक्रिया

हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को संदीप सिंह उर्फ सोनू बनाम राजस्थान राज्य मामले में POCSO मामलों की जमानत अर्जियों को लेकर कुछ जरूरी दिशा-निर्देश तय किए थे।

इनके मुताबिक, POCSO मामले में जमानत अर्जी दाखिल होने के बाद आरोपी के वकील को उसकी कॉपी सरकारी वकील को देनी होगी। इसके बाद सरकारी वकील यह कॉपी संबंधित पुलिस अधिकारी या जांच अधिकारी को भेजेंगे।

पुलिस को जमानत अर्जी की जानकारी पीड़ित बच्चे के माता-पिता, गार्जियन या उस व्यक्ति तक पहुंचानी होगी, जिस पर बच्चा भरोसा करता है। यह जानकारी जल्द से जल्द दी जानी है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि जहां संभव हो, सूचना देने वाला पुलिस अधिकारी सादी वर्दी में जाए, ताकि पीड़ित परिवार पर अनावश्यक ध्यान न जाए।

नोटिस की रिसीविंग में नाम, हस्ताक्षर और समय दर्ज करना जरूरी

हाईकोर्ट ने अपनी गाइडलाइन में नोटिस देने की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखने पर भी जोर दिया था। नोटिस की जानकारी लिखित रूप में दी जानी चाहिए और उसे पाने वाले व्यक्ति की रिसीविंग ली जानी चाहिए।

रिसीविंग में नोटिस पाने वाले व्यक्ति का नाम और हस्ताक्षर होना जरूरी है। साथ ही, नोटिस किस तारीख और किस समय मिला, यह भी साफ तौर पर दर्ज होना चाहिए।

नोटिस की सर्विस पूरी होने के बाद इसकी जानकारी सरकारी वकील को देनी होगी, ताकि इसे कोर्ट की फाइल में रिकॉर्ड पर रखा जा सके।

अगर पीड़ित या उसके माता-पिता/गार्जियन नहीं मिलते और नोटिस नहीं दिया जा पाता, तो जांच अधिकारी को इसकी अलग रिपोर्ट तैयार करनी होगी।

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि पीड़ित परिवार को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए संबंधित थाना प्रभारी मामले के दस्तावेज जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भेजे।

यदि परिवार निजी वकील रखने में सक्षम नहीं है, तो उसे कानूनी सहायता के तहत वकील उपलब्ध कराया जाए।

नोटिस में लापरवाही से जमानत सुनवाई में हो रही देरी

जस्टिस संदीप शाह ने कहा कि साफ दिशा-निर्देश होने के बावजूद POCSO मामलों में नोटिस देने की प्रक्रिया अब भी ठीक से नहीं अपनाई जा रही है।

कई बार जमानत अर्जियां कोर्ट में सूचीबद्ध हो जाती हैं और उसके बाद पीड़ित पक्ष को सूचना देने के लिए समय मांगा जाता है। इससे जमानत अर्जियों पर सुनवाई और फैसला होने में देरी होती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि निर्देशों का प्रभावी पालन नहीं होने से आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रभावित हो रही है।

पीड़ित परिवार को कानूनी मदद देने में भी आ रही दिक्कत

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि कई मामलों में पीड़ित की ओर से कोई वकील मौजूद नहीं होता। कोर्ट के मुताबिक, इसकी एक वजह यह हो सकती है कि संबंधित SHO केस की पेपर बुक जिला लीगल सर्विसेज अथॉरिटी या RALSA को नहीं भेजते।

हाईकोर्ट की तय प्रक्रिया के मुताबिक, पेपर बुक संबंधित अथॉरिटी तक पहुंचनी चाहिए, ताकि पीड़ित बच्चे या उसके परिवार को वकील और जरूरी कानूनी मदद मिल सके। इस वजह से पीड़ित परिवार को समय पर कानूनी मदद नहीं मिल पाती।

DGP और विधि विभाग को गाइडलाइन लागू कराने के निर्देश

हाईकोर्ट ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP), लॉ एंड लीगल अफेयर्स डिपार्टमेंट के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और RALSA के मेंबर सेक्रेटरी को मामले का संज्ञान लेने के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की तय गाइडलाइन राज्य के सभी पुलिस थानों, सरकारी वकीलों और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जाए। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इन निर्देशों का सही तरीके से पालन हो।

सोनू गर्जर के मामले में सरकारी वकील को एक सप्ताह के भीतर बच्चे के माता-पिता या गार्जियन तक जमानत अर्जी की जानकारी पहुंचाने को कहा गया है। इसकी सर्विस रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश करनी होगी।

वहीं कालूराम के मामले में भी हाईकोर्ट ने गाइडलाइन के मुताबिक नए सिरे से नोटिस देने के निर्देश दिए हैं। दोनों मामलों की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी।

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