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‘प्रोबेशन की मांग बिना ठोस कारण खारिज नहीं कर सकते’, हाईकोर्ट ने कहा- सजा देते समय आरोपी के सुधार की संभावना भी देखनी होगी; सजा भुगत चुके दोषी को रिहाई का आदेश

Probation Cannot Be Rejected Without Reasons: Rajasthan HC Stresses Rehabilitation While Sentencing

जोधपुर। किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बाद उसे सीधे जेल भेजना ही हर मामले में जरूरी नहीं है। सजा तय करते समय कोर्ट को अपराध की प्रकृति के साथ आरोपी की परिस्थितियों, उसके पिछले रिकॉर्ड और उसमें सुधार की संभावना पर भी विचार करना चाहिए।

इसी टिप्पणी के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने आर्म्स एक्ट के एक मामले में रामस्वरूप की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया।हाईकोर्ट ने कहा ने कहा कि प्रोबेशन की मांग को बिना ठोस कारण खारिज नहीं किया जा सकता।

ट्रायल कोर्ट ने रामस्वरूप को आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 में दोषी ठहराया था, लेकिन प्रोबेशन देने से इनकार करते समय कोई खास वजह नहीं बताई। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन प्रोबेशन पर विचार करने के तरीके को सही नहीं माना।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि आरोपी की ओर से प्रोबेशन की मांग किए जाने पर कोर्ट को उस पर कारण के साथ फैसला करना होगा। खासकर तब, जब आरोपी का कोई पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं हो और वह पहली बार दोषी ठहराया गया हो।

रामस्वरूप की ओर से अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने हाईकोर्ट में पैरवी की। वहीं राज्य सरकार की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नरेंद्र गहलोत ने पक्ष रखा।

गंभीर आरोपों से बरी, लेकिन आर्म्स एक्ट में दोषी पाया गया था

रामस्वरूप के खिलाफ आईपीसी की कई गंभीर धाराओं के साथ आर्म्स एक्ट के तहत केस चला था। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद इन आरोपों को साबित नहीं माना और उसे उन सभी मामलों में बरी कर दिया।

हालांकि, उसे आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत दोषी माना गया। रामस्वरूप ने हाईकोर्ट में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी और उसकी अपील मुख्य रूप से सजा के सवाल पर थी।

हाईकोर्ट ने इसके बावजूद रिकॉर्ड की खुद जांच की और माना कि धारा 3/25 के तहत दोषी ठहराने के ट्रायल कोर्ट के फैसले में ऐसी कोई गंभीर गलती नहीं है, जिसके कारण उसमें दखल दिया जाए। इसलिए दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

पहली बार दोषी था, फिर भी प्रोबेशन की मांग खारिज

सजा के सवाल पर हाईकोर्ट ने रामस्वरूप की परिस्थितियों को देखा। कोर्ट ने पाया कि यह उसकी पहली दोषसिद्धि थी और उसका कोई पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था।

इसके अलावा, वह करीब 9 साल तक क्रिमिनल केस की कार्यवाही का सामना करता रहा। ट्रायल कोर्ट के सामने उसकी ओर से प्रोबेशन का लाभ देने की मांग भी की गई थी।

लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते समय कोई खास कारण दर्ज नहीं किया। हाईकोर्ट ने इसी बात को अहम माना और कहा कि प्रोबेशन की मांग पर कोर्ट को कारण के साथ फैसला करना चाहिए था।

‘सजा देते समय सुधार की संभावना भी देखनी होगी’

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना और उसे सजा देना दो अलग बातें हैं। दोषसिद्धि के बाद सजा तय करते समय कोर्ट को सिर्फ अपराध नहीं देखना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि अपराध किन परिस्थितियों में हुआ, आरोपी का पिछला रिकॉर्ड कैसा है और क्या उसमें सुधार की संभावना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन से जुड़े प्रावधान आपराधिक न्याय व्यवस्था के सुधारात्मक पहलू को सामने रखते हैं।

यानी प्रोबेशन का मकसद सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि सही मामलों में व्यक्ति को सुधरने का मौका देना भी है। इसलिए जहां कानून इसकी अनुमति देता है, वहां आरोपी को जेल भेजने के बजाय उसके सुधार की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा- प्रोबेशन नहीं देना है तो वजह बतानी होगी

हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 360 और 361 का हवाला देते हुए कहा कि जहां आरोपी को प्रोबेशन का लाभ दिया जा सकता है, लेकिन कोर्ट ऐसा नहीं करता, वहां इसके लिए विशेष कारण दर्ज करना जरूरी है।

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि प्रोबेशन देना हर मामले में आरोपी का अधिकार नहीं है। कोर्ट को अपराध की प्रकृति और घटना की परिस्थितियों को भी देखना होता है।

लेकिन अगर आरोपी ने प्रोबेशन की मांग की है और उसके मामले में ऐसी परिस्थितियां हैं, जिन पर विचार किया जाना जरूरी है, तो कोर्ट इस मांग को बिना वजह खारिज नहीं कर सकता। उसे साफ बताना होगा कि प्रोबेशन क्यों नहीं दिया जा रहा है।

कारण बताए बिना ट्रायल कोर्ट ने प्रोबेशन देने से इनकार किया

हाईकोर्ट ने कहा कि रामस्वरूप के मामले में ट्रायल कोर्ट ने प्रोबेशन की मांग पर जरूरी तरीके से विचार नहीं किया।

रामस्वरूप पहली बार दोषी ठहराया गया था, उसका कोई पुराना क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था और मामला करीब 9 साल तक चला था। ये सभी बातें सजा तय करते समय महत्वपूर्ण थीं।

इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने प्रोबेशन देने से इनकार किया, लेकिन यह नहीं बताया कि इन परिस्थितियों के बावजूद रामस्वरूप को प्रोबेशन का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब आरोपी की परिस्थितियां प्रोबेशन पर विचार करने का आधार देती हों, तो कोर्ट को इस मांग पर सोच-समझकर फैसला करना और उसका कारण बताना जरूरी है। इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, इसलिए सजा तय करने की प्रक्रिया कानून के मुताबिक पूरी नहीं मानी गई।

पूरी सजा भुगत चुका था, इसलिए रिहाई का आदेश

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट से पता चला कि रामस्वरूप अपनी पूरी सजा भुगत चुका है। इसमें जुर्माना नहीं देने पर मिली अतिरिक्त सजा भी शामिल थी।

ऐसे में हाईकोर्ट ने माना कि अब मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजकर सजा पर नए सिरे से विचार कराने का कोई व्यावहारिक फायदा नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 में रामस्वरूप की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया।

साथ ही, निर्देश दिया कि अगर वह किसी दूसरे केस में वांछित नहीं है और हिरासत में है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

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