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पत्नी ने पति पर किए 9 से ज्यादा मुकदमें, कोर्ट ने माना क्रूरता, 32 साल पुराना विवाह खत्म-जयपुर पारिवारिक न्यायालय का बड़ा फैसला

Jaipur Family Court Grants London-Based Father Virtual Access to Daughter Born From Live-in Relationship

8 वर्षों से अलग रह रहे थे पति-पत्नी, साथ रहने की इच्छा का अभाव साबित; लगातार मुकदमेबाजी और अभित्यजन के आधार पर अदालत ने 1994 का विवाह विघटित किया

जयपुर। जयपुर के पारिवारिक न्यायालय संख्या प्रथम की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए वैवाहिक विवाद मामले में पति से लगातार अलग रहने अभित्यजन (डेज़र्शन) और एक दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज करने को क्रूरता मानते हुए 32 वर्ष पुराने विवाह को समाप्त घोषित किया है।

पारिवारिक न्यायालय की जज आरती भारद्वाज ने अपने फैसले में कहा कि पति-पत्नी पिछले लगभग आठ वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे और अक्टूबर 2017 के बाद उनके साथ रहने का कोई विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

पत्नी ने भी लंबे समय से अलग रहने की बात स्वीकार की, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वैवाहिक संबंध बनाए रखने की वास्तविक इच्छा का अभाव था।

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों के आधार पर 29 अप्रैल 1994 को संपन्न विवाह को विघटित करते हुए पति की ओर से दायर विवाह विच्छेद याचिका स्वीकार की है।

पत्नी ने दर्ज कराए 9 से अधिक मुकदमे

अदालत में सुनवाई के दौरान पति की ओर से अधिवक्ता डॉ. डी.एस. शेखावत ने अदालत को बताया कि पत्नी ने समय-समय पर पति के विरुद्ध करीब 9 आपराधिक और दीवानी मुकदमे दर्ज कराए, जिससे पारिवारिक संबंध अत्यंत तनावपूर्ण और कटु हो गए।

अधिवक्ता ने कहा कि विवाह के शुरुआती वर्षों के बाद से ही वैवाहिक संबंधों में लगातार तनाव बना रहा और समय के साथ पत्नी का व्यवहार उसके प्रति अत्यंत कठोर एवं असहयोगात्मक होता चला गया।

पति ने कहा कि पत्नी ने कई अवसरों पर बिना पर्याप्त आधार के उसके विरुद्ध आपराधिक एवं दीवानी मुकदमे दर्ज कराए, जिनकी संख्या लगभग 9 से अधिक थी।

इन मुकदमों और आरोपों के कारण उसे मानसिक तनाव, सामाजिक बदनामी तथा आर्थिक हानि का सामना करना पड़ा, जिसे उसने मानसिक क्रूरता बताया।

Dr D S Sekhawat. Advocate, Jaipur

8 साल से अलग रह रहे

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि अक्टूबर 2017 के बाद से दोनों पक्ष साथ नहीं रह रहे हैं और पिछले लगभग आठ वर्षों से वे पूर्णतः पृथक जीवन जी रहे हैं।

इस दौरान पत्नी ने वैवाहिक संबंधों को पुनः स्थापित करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया और न ही हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत पुनः सहवास की कोई याचिका दायर की।

पति ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति विवादों के कारण संबंध अत्यंत कटु हो गए थे और निरंतर मुकदमेबाजी के कारण वैवाहिक जीवन पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

पति ने दलील दी कि इन परिस्थितियों में विवाह को केवल औपचारिक रूप से बनाए रखना उसके लिए असहनीय हो गया था, इसलिए क्रूरता और अभित्यजन के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्रदान करने का अनुरोध किया गया।

पत्नी की ओर से दलील

मामले में प्रतिवादी पत्नी की ओर से अदालत में पति के आरोपों का विरोध करते हुए कहा गया कि पति द्वारा लगाए गए क्रूरता और अभित्यजन के आरोप वास्तविक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।

पत्नी का कहना था कि वैवाहिक संबंधों में उत्पन्न विवादों के पीछे मुख्य कारण संपत्ति और पारिवारिक मतभेद रहे, जिनके चलते दोनों पक्षों के बीच दूरी बढ़ी।

पत्नी ने यह भी कहा कि उसने अपने अधिकारों और संपत्ति से जुड़े मामलों की सुरक्षा के लिए विभिन्न कानूनी कार्यवाहियां कीं, जिन्हें पति द्वारा अनावश्यक रूप से मुकदमेबाजी और क्रूरता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

मुकदमों की संख्या क्रूरता का आधार नहीं

पत्नी की ओर से यह भी कहा गया कि पति स्वयं कई अवसरों पर उसके साथ रहने के प्रति उदासीन रहा और पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन में पर्याप्त सहयोग नहीं दिया, जिसके कारण वैवाहिक संबंधों में तनाव बढ़ा।

पत्नी ने यह तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच विवादों के बावजूद विवाह को बनाए रखने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी और परिस्थितियों के कारण अलगाव की स्थिति उत्पन्न हुई।

पत्नी ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि पति द्वारा लगाए गए आरोपों का समुचित मूल्यांकन किया जाए और केवल मुकदमों की संख्या के आधार पर क्रूरता का निष्कर्ष न निकाला जाए, क्योंकि कानूनी उपाय अपनाना किसी भी पक्ष का वैधानिक अधिकार है।

अदालत का फैसला और टिप्पणी

पारिवारिक न्यायालय की जज आरती भारद्वाज ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि लगातार मुकदमेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति वैवाहिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और इसे मानसिक क्रूरता के रूप में माना जा सकता है, विशेषकर तब जब आरोपों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाएं।

अदालत ने यह भी पाया कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था और इसी कारण संबंध लगातार बिगड़ते चले गए।

अदालत ने कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए कई आरोपों के समर्थन में ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके, जबकि पति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुके हैं।

विवाह केवल कानूनी औपचारिकता नहीं

अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत पुनः सहवास के लिए कोई याचिका दायर नहीं की, जिससे यह माना गया कि वैवाहिक संबंध को बनाए रखने की वास्तविक इच्छा नहीं थी।

अदालत ने कहा कि यदि कोई पक्ष विवाह को जारी रखना चाहता है तो वह कानूनी उपायों के माध्यम से साथ रहने का प्रयास करता है, किंतु इस मामले में ऐसा कोई प्रयास सामने नहीं आया।

अदालत ने यह भी कहा कि विवाह केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, सम्मान और साथ रहने की इच्छा पर आधारित सामाजिक संस्था है।

जब दोनों पक्ष लंबे समय तक अलग-अलग रहते हैं, लगातार विवाद और मुकदमेबाजी चलती रहती है तथा संबंध सुधारने की कोई वास्तविक संभावना नहीं रहती, तो ऐसे विवाह को केवल औपचारिक रूप से बनाए रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

पति की याचिका मंजूर

अदालत ने माना कि पत्नी के व्यवहार, लंबे समय तक अलगाव, लगातार मुकदमेबाजी तथा वैवाहिक संबंध बनाए रखने की इच्छा के अभाव से क्रूरता और अभित्यजन दोनों ही आधार सिद्ध होते हैं। इन परिस्थितियों में पति द्वारा दायर विवाह विच्छेद की याचिका स्वीकार करना न्यायोचित है।

अदालत ने इसी के आधार पर 29 अप्रैल 1994 को संपन्न विवाह को विघटित घोषित करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी और कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि वैवाहिक संबंध लंबे समय से समाप्त हो चुके हैं तथा उनके पुनर्स्थापन की कोई वास्तविक संभावना शेष नहीं है।

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