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‘भरण-पोषण केस में आय-संपत्ति की सही जानकारी देना जरूरी’, राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी की आर्थिक स्थिति की जांच के दिए निर्देश, फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द

Rajasthan HC Orders Fresh Inquiry Into Wife’s Financial Disclosure in Maintenance Case

जोधपुर। भरण-पोषण के मामले में पत्नी की आय और संपत्ति से जुड़ी जानकारी छिपाने के आरोप की जांच नहीं करने पर राजस्थान हाईकोर्ट अहम फैसला सुनाते हुए बीकानेर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया है।

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने मामला दोबारा फैमिली कोर्ट भेजते हुए पत्नी के शपथ पत्र और उसमें कथित तौर पर छिपाई गई जानकारी की नए सिरे से जांच करने के निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण के मामलों में दोनों पक्षों को अपनी वास्तविक आय और संपत्ति की पूरी जानकारी कोर्ट के सामने रखनी होती है।

अगर रिकॉर्ड में ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जिनसे अहम जानकारी छिपाने की पहली नजर में बात सामने आती है, तो कोर्ट को उसकी जांच करनी चाहिए।

राजनीश पाठक की ओर से दायर क्रिमिनल रिवीजन पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बीकानेर फैमिली कोर्ट नंबर-1 के 10 जुलाई 2024 के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को कानून के मुताबिक नए सिरे से तय करने के लिए वापस भेज दिया।

मामले में राजनिश पाठक की ओर से सलमान आगा और दानिश शेरानी ने पैरवी की, जबकि शिवांगी पाठक की ओर से फाल्गुन बुच और जी.के. छांगानी पेश हुए।

भरण-पोषण के केस में आय और संपत्ति को लेकर विवाद

मामला राजनिश पाठक और शिवांगी पाठक के बीच चल रहे भरण-पोषण के केस से जुड़ा है। दोनों ने फैमिली कोर्ट में अपनी आय, संपत्ति और देनदारियों की जानकारी वाले शपथ पत्र दाखिल किए थे।

राजनिश ने अपने शपथ पत्र में अपनी संपत्ति और देनदारियों की जानकारी दी थी। वहीं, शिवांगी ने अपने शपथ पत्र में बताया था कि उसकी कोई आय नहीं है।

इसके बाद राजनिश ने शिवांगी की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने फैमिली कोर्ट में अलग अर्जी दाखिल कर आरोप लगाया कि शपथ पत्र में उनकी आय और संपत्ति से जुड़ी पूरी जानकारी नहीं दी गई है।

पति ने कहा- पत्नी ने आय और संपत्ति की जानकारी छिपाई

राजनिश की ओर से फैमिली कोर्ट में कहा गया कि शिवांगी के पास कृषि जमीन है और वह कोचिंग और कंसल्टेंसी से कमाई करती हैं। इसलिए शपथ पत्र में यह बताना जरूरी था कि उनकी वास्तविक आय और संपत्ति क्या है।

अर्जी में यह भी कहा गया कि शिवांगी MBA कर चुकी हैं और एक फर्म की मालिक रह चुकी हैं। इसके अलावा उनके नाम फिक्स्ड डिपॉजिट और पैसों के लेन-देन से जुड़ी जानकारी का भी हवाला दिया गया।

दूसरी ओर, शिवांगी ने इन आरोपों का विरोध किया। उनका कहना था कि शपथ पत्र में वही जानकारी दी गई थी, जो उनके पास उपलब्ध थी और उन्होंने जानबूझकर कोई तथ्य नहीं छिपाया।

फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी खारिज कर दी थी

राजनीश ने इन आरोपों को लेकर CrPC की धारा 340 के तहत फैमिली कोर्ट में अर्जी दी थी। इस प्रावधान के तहत कोर्ट की कार्यवाही में झूठी जानकारी देने या गलत दस्तावेज पेश करने के आरोपों पर आगे कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

लेकिन फैमिली कोर्ट नंबर-1, बीकानेर ने 10 जुलाई 2024 को राजनिश की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद राजनीश ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने कहा- रिकॉर्ड में सवाल उठते हैं तो जांच होनी चाहिए

राजस्थान हाईकोर्ट ने केस के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों को देखा। कोर्ट ने माना कि पति की ओर से ऐसे तथ्य रिकॉर्ड पर रखे गए थे, जिनकी जांच किया जाना जरूरी था।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि भरण-पोषण के केस में आय और संपत्ति की जानकारी देना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है। दोनों पक्षों से उम्मीद की जाती है कि वे अपनी वास्तविक आर्थिक स्थिति की सही जानकारी कोर्ट के सामने रखें।

हाईकोर्ट ने कहा कि शपथ पत्र में दी गई जानकारी पर सवाल उठ रहे हों, तो पहले उनकी जांच जरूरी है। सिर्फ अर्जी खारिज कर देने से यह पता नहीं चलेगा कि आरोप सही हैं या नहीं। पहले यह देखना जरूरी है कि रिकॉर्ड में सामने आए तथ्यों में कितनी सच्चाई है।

मामला अब फिर फैमिली कोर्ट में जाएगा

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 10 जुलाई 2024 का फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामला वापस बीकानेर फैमिली कोर्ट को भेज दिया।

अब फैमिली कोर्ट को पत्नी के शपथ पत्र और पति की ओर से लगाए गए आरोपों की नए सिरे से जांच करनी होगी। इसके बाद कोर्ट कानून के मुताबिक आगे का आदेश जारी करेगा।

दोनों पक्षों को 15 अक्टूबर 2026 को फैमिली कोर्ट, बीकानेर में पेश होने के लिए कहा गया है।

हाईकोर्ट ने नहीं माना कि पत्नी ने जानकारी छिपाई

यहां एक बात साफ समझना जरूरी है। हाईकोर्ट ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि शिवांगी ने वास्तव में अपनी आय या संपत्ति की जानकारी छिपाई थी।

हाई कोर्ट ने सिर्फ इतना माना है कि पति की ओर से लगाए गए आरोप और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री ऐसी है, जिसकी जांच होनी चाहिए। अब यह जांच फैमिली कोर्ट करेगा और उसके बाद तय होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।

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