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कॉन्ट्रेक्ट पूरा नहीं हुआ तो वापस मांग सकते हैं दिए पैसे, स्पेसिफिक परफॉर्मेंस केस में हाईकोर्ट का अहम फैसला, ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार

Rajasthan HC: Refund of Advance Amount Can Be Added Even After Trial Begins in Specific Performance Suit

जोधपुर। स्पेसिफिक परफॉर्मेंस के केस में अग्रिम राशि लौटाने की मांग बाद में भी जोड़ी जा सकती है। सिर्फ इस वजह से ऐसी मांग को रोक नहीं सकते कि केस का ट्रायल शुरू हो चुका है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 1.19 करोड़ रुपये के लेन-देन से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें केस में पैसे वापसी की मांग जोड़ने की अनुमति दी गई थी।

इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आदेश को चुनौती देने वाली ईश्वरचंद जांगिड़ की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति ने अपने केस में पहले से दिए गए पैसे वापस मांगने की बात रखी है, तो ट्रायल शुरू होने के बाद भी वह इस मांग को जोड़ सकता है।

जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि जब पैसे वापस मांगने से जुड़े तथ्य पहले से केस में मौजूद हैं, तो सिर्फ इस आधार पर उस मांग को जोड़ने से नहीं रोका जा सकता कि ट्रायल शुरू हो चुका है।

मामले में याचिकाकर्ता ईश्वरचंद जांगिड़ की ओर से अधिवक्ता नरेंद्र थानवी पेश हुए, जबकि प्रतिवादी मनोज कुमार शर्मा की ओर से अधिवक्ता डी.एल.आर. व्यास ने पैरवी की।

खनिज पत्थर की सप्लाई को लेकर था विवाद

मामला मकराना के ईश्वरचंद जांगिड़ और मनोज कुमार शर्मा के बीच खनिज पत्थर की सप्लाई को लेकर हुए कॉन्ट्रेक्ट से जुड़ा है।

दोनों के बीच 17 अप्रैल 2019 को कॉन्ट्रेक्ट हुआ था। इसके तहत मनोज कुमार शर्मा को तय की गई आपसी दर पर ईश्वर चंद जांगिड़ को खनिज पत्थर सप्लाई करना था।

मनोज कुमार शर्मा ने कोर्ट में दावा किया कि कॉन्ट्रेक्ट के बावजूद तय मात्रा में पत्थर की सप्लाई नहीं की गई, जबकि इसके लिए पहले ही पैसे दिए जा चुके थे।

इसके बाद उन्होंने समझौते के मुताबिक खनिज पत्थर की सप्लाई कराने और मनोज कुमार शर्मा को वही पत्थर किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने से रोकने की मांग को लेकर ट्रायल कोर्ट में केस दायर किया।

केस में पहले से दर्ज थी 1.19 करोड़ रुपये की रकम

ट्रायल कोर्ट ने पाया कि मूल केस में ही 1,19,74,254 रुपये की अग्रिम राशि दिए जाने की बात दर्ज थी। इसमें यह भी कहा गया था कि यह रकम अभी तक वापस नहीं मिली है।

केस में लिखित जवाब दाखिल हो चुका था और विवाद से जुड़े मुद्दे भी तय किए जा चुके थे। मामला वादी की ओर से सबूत पेश करने के चरण में पहुंच गया था।

इसी दौरान मनोज कुमार शर्मा ने अपनी याचिका में संशोधन की मांग की। उसने कहा कि अगर समझौते के मुताबिक पत्थर की सप्लाई कराने की राहत नहीं मिलती है, तो उसे दी गई अग्रिम राशि वापस दिलाने की वैकल्पिक राहत भी केस में जोड़ी जाए।

ट्रायल कोर्ट ने 19 मार्च 2026 को इस संशोधन को मंजूरी दे दी। इसी ऑर्डर को चुनौती देते हुए ईश्वरचंद जांगिड़ ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

ट्रायल शुरू होने के बाद मांग जोड़ने को चुनौती दी गई

ईश्वरचंद जांगिड़ की ओर से कहा गया कि ट्रायल शुरू होने के बाद केस में बदलाव करने के लिए यह बताना जरूरी है कि यह बात पहले क्यों नहीं उठाई गई।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि पैसे वापस मांगने की राहत जोड़ने से केस की मूल प्रकृति बदल जाएगी।

दूसरी ओर, प्रतिवादी ने कहा कि पैसे वापस मांगने की राहत उसी पुराने लेन-देन से जुड़ी है। मूल केस में अग्रिम राशि दिए जाने की बात पहले से दर्ज है। इसलिए इससे कोई नया मामला नहीं बन रहा है।

‘धारा 22 में अग्रिम राशि वापस मांगने का प्रावधान है‘

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 22 ऐसे मामलों में पैसे वापस मांगने का रास्ता देती है।

अगर स्पेसिफिक परफॉर्मेंस की मांग पूरी नहीं होती है, तो दिए गए अग्रिम या जमा पैसे की वापसी की मांग भी की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर यह मांग शुरू में केस में नहीं की गई है, तो उसे बाद में भी जोड़ा जा सकता है। कानून इसके लिए केस की कार्यवाही के किसी भी चरण में संशोधन की अनुमति देता है।

‘सिर्फ ट्रायल शुरू होने से मांग नहीं रुक सकती’

हाईकोर्ट ने कहा कि Order VI Rule 17 CPC में ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन के लिए ड्यू डिलिजेंस की शर्त है, लेकिन इस मामले में स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 22 का खास प्रावधान लागू होता है।

हाईकोर्ट ने पाया कि मनोज कुमार शर्मा ने मूल केस में ही 1,19,74,254 रुपये की अग्रिम राशि देने और उसके वापस नहीं मिलने की बात लिखी थी।

अब सिर्फ इतनी वैकल्पिक राहत जोड़ी जा रही थी कि अगर समझौते के मुताबिक पत्थर की सप्लाई नहीं कराई जाती है, तो यह रकम वापस दिलाई जाए।

इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि इससे केस का मूल स्वरूप नहीं बदल रहा है। सिर्फ ट्रायल शुरू हो जाने के आधार पर इस राहत को जोड़ने से रोकना सही नहीं होगा।

‘सिर्फ तकनीकी आधार पर राहत नहीं रोकी जा सकती‘

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पैसे वापस मांगने से जुड़े जरूरी तथ्य पहले से मूल केस में मौजूद थे। इसलिए बाद में जोड़ी गई मांग कोई नया मामला नहीं है, बल्कि उसी लेन-देन से जुड़ी वैकल्पिक राहत है।

हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में सिर्फ तकनीकी आधार पर संशोधन की अनुमति को गलत नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के केआर सुरेश बनाम आर. पूर्णिमा फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 22 के तहत अग्रिम राशि लौटाने जैसी वैकल्पिक राहत को बाद के चरण में भी जोड़ा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने इसी कानूनी स्थिति को मौजूदा मामले पर लागू किया और ट्रायल कोर्ट के ऑर्डर में कोई गलती नहीं मानी।

याचिका खारिज, ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार

जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केस में संशोधन की अनुमति देकर कोई कानूनी गलती नहीं की। हाईकोर्ट को भी ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिसके चलते निचली कोर्ट के ऑर्डर में दखल दिया जाए।

इस आधार पर ईश्वरचंद जांगिड़ की रिट याचिका खारिज कर दी गई। साथ ही स्टे एप्लीकेशन समेत दूसरी लंबित अर्जियां भी समाप्त कर दी गईं।

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