जयपुर। चर्चित पीएचईडी के जेजेएम टेंडर घोटाले से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए पीएचईडी के तत्कालीन चीफ इंजीनियर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) दिनेश गोयल की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने आवश्यक सतर्कता नहीं बरती और पूरे मामले में याचिकाकर्ता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने दिनेश गोयल की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मामले की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति तथा सह-आरोपियों की स्थिति को देखते हुए फिलहाल आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा।
ACB ने किया था गिरफ्तार
एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने दिनेश गोयल को 17 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ एसीबी थाना, जयपुर में एफआईआर नंबर 245/2024 दर्ज है।
एसीबी का आरोप है कि पीएचईडी में जारी पांच बड़े टेंडरों की प्रक्रिया के दौरान फर्जी दस्तावेजों और कथित मिलीभगत के आधार पर कुछ कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। जांच एजेंसी के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई।
कौन हैं दिनेश गोयल?
दिनेश गोयल उस समय पीएचईडी में चीफ इंजीनियर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के पद पर कार्यरत थे। साथ ही वे बिड इवैल्यूएशन कमेटी (BEC) के चेयरमैन भी थे।
यह कमेटी टेंडरों की प्रारंभिक जांच और तकनीकी मूल्यांकन का कार्य करती थी। एसीबी का कहना है कि टेंडर प्रक्रिया की शुरुआती जांच की जिम्मेदारी इसी कमेटी की थी और इसलिए उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पंकज गुप्ता ने अदालत में कहा कि दिनेश गोयल केवल बीईसी के सदस्य थे और उन्होंने किसी प्रकार की व्यक्तिगत अनियमितता नहीं की।
उन्होंने तर्क दिया कि जिन कंपनियों पर फर्जी प्रमाण पत्र लगाने के आरोप लगे, उन प्रमाण पत्रों की जांच विभाग ने स्वयं करवाई थी।
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि विभाग ने वरिष्ठ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर विशाल सक्सेना को केरल भेजकर प्रमाण पत्रों की भौतिक जांच करवाई थी।
जांच के बाद विशाल सक्सेना ने रिपोर्ट दी कि दस्तावेज सही और वास्तविक हैं। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की टेंडर प्रक्रिया को मंजूरी दी गई।
वकील ने कहा कि जब विभाग का वरिष्ठ अधिकारी किसी दस्तावेज को सही बताता है, तब बीईसी के सदस्यों द्वारा उस रिपोर्ट पर भरोसा करना स्वाभाविक है। यदि बाद में वह रिपोर्ट गलत पाई गई तो उसके लिए दिनेश गोयल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कानूनी नोटिस वापस लेने का भी दिया हवाला
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान अधिवक्ता महेश कालवानिया की ओर से जो कानूनी नोटिस दिए गए थे, उन्हें बाद में वापस ले लिया गया था।
ऐसे में विभाग के अधिकारियों के पास यह मानने का कारण था कि शिकायतों का समाधान हो चुका है और दस्तावेजों में कोई गड़बड़ी नहीं है।
इसके अलावा याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले टी.टी. एंटनी बनाम स्टेट ऑफ केरल का हवाला देते हुए कहा गया कि एक ही घटना को लेकर कई एफआईआर दर्ज करना कानूनन गलत है। इसलिए इस मामले में दर्ज एफआईआर की वैधता पर भी सवाल उठाए गए।
चार्जशीट 16 हजार पन्नों की
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि एसीबी विस्तृत जांच पूरी कर चुकी है और करीब 16 हजार पन्नों की चार्जशीट पेश की जा चुकी है।
आरोपी 17 फरवरी 2026 से जेल में है और अब उससे किसी प्रकार की बरामदगी या पूछताछ बाकी नहीं है। ऐसे में उसे जमानत दी जानी चाहिए।
ACB ने किया कड़ा विरोध
वहीं, एसीबी की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश चौधरी और लोक अभियोजक विजय यादव ने जमानत का जोरदार विरोध किया।
उन्होंने अदालत को बताया कि दिनेश गोयल केवल बीईसी के सदस्य नहीं, बल्कि उसके चेयरमैन थे और टेंडर प्रक्रिया की हर महत्वपूर्ण बैठक में शामिल थे।
एसीबी ने कहा कि शिकायतें मिलने के बावजूद टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। आरोप है कि गणपति ट्यूबवेल कंपनी और श्याम ट्यूबवेल कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों को नजरअंदाज किया गया।
जांच एजेंसी ने अदालत को यह भी बताया कि दिनेश गोयल फाइनेंस कमेटी के भी सदस्य थे और 2 मई 2023 तथा 9 मई 2023 को हुई बैठकों में शामिल हुए थे। इसलिए उन्हें पूरी प्रक्रिया की जानकारी थी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बीईसी वह पहली समिति थी, जिसका काम टेंडर दस्तावेजों की जांच करना था। शिकायतें और कानूनी नोटिस मिलने के बावजूद जिस प्रकार टेंडरों की जांच और प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, उससे प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की गंभीर भूमिका सामने आती है।
अदालत ने यह भी कहा कि दिनेश गोयल न केवल बीईसी के चेयरमैन थे, बल्कि फाइनेंस कमेटी के सदस्य भी थे। इसलिए उन्हें पूरी प्रक्रिया की जानकारी होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले में अब तक किसी भी सह-आरोपी सरकारी अधिकारी को जमानत नहीं मिली है। ऐसे में समानता के सिद्धांत को देखते हुए भी याचिकाकर्ता को राहत देना उचित नहीं होगा।
फिलहाल जमानत नहीं
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल आरोपी को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि इस स्तर पर जमानत देने से जांच और मुकदमे की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसके साथ ही अदालत ने दिनेश गोयल की जमानत याचिका खारिज कर दी।