जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों से जूझ रहे सैकड़ों परिवारों को बड़ी राहत देते हुए एक ऐतिहासिक फैसले के जरिए 4 साल से सुनवाई का इंतजार कर रही 75 खंडपीठ अपीलों को एकलपीठ याचिकाओं में बदल दिया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए इन फैमिली कोर्ट द्वारा पारित अंतरिम आदेशों के खिलाफ दायर अपीलों की वैधता को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद को समाप्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि इस मुद्दे पर अभी कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इस पर अंतिम निर्णय बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) द्वारा किया जाना बाकी है। ऐसे में हाईकोर्ट ने सभी लंबित अपीलों को फिलहाल तकनीकी आधार पर निपटाते हुए उन्हें एकलपीठ के समक्ष पुनः सुनवाई के लिए भेजने का आदेश दिया है.
खंडपीठ ने इन 75 लंबित अपीलों का तुरंत निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि वह इन्हें एकल पीठ रिट याचिकाओं के रूप में दोबारा दर्ज करे और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करे।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने अपीलकर्ता कौशल्या सोनी सहित 74 अन्य अपीलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए सुनाया हैं.
गया।
क्या है पूरा मामला?
मामला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 से जुड़ा है, जिसमें पति या पत्नी मुकदमे के दौरान भरण-पोषण (maintenance) और मुकदमे के खर्च की मांग कर सकते हैं। फैमिली कोर्ट इस पर अंतरिम आदेश देती है।
सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या इन अंतरिम आदेशों के खिलाफ अपील की जा सकती है या नहीं?
एक दशक से चल रही कानूनी उलझन
इस मुद्दे पर पिछले 10-15 वर्षों में अलग-अलग फैसलों ने स्थिति को जटिल बना दिया.
2010: अजय मलिक बनाम शशि – अपील नहीं मानी गई (अंतरिम आदेश)
2018: कविता व्यास बनाम दीपक दवे – फुल बेंच ने अपील को मान्य ठहराया
2022: एक अन्य खंडपीठ ने पाया कि 2018 का फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (कैप्टन रमेश चंदर कौशल बनाम वीणा कौशल) को नजरअंदाज करता है
इसके बाद 27 मई 2022 को यह पूरा मुद्दा बड़ी बेंच (लार्जर बेंच) को भेज दिया गया, लेकिन चार साल बाद भी बड़ी बेंच का गठन नहीं हुआ।
2018 से 2026 तक दाखिल हुईं 75 अपीलें
फुल बेंच के 2018 के फैसले के आधार पर बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल की गईं। लेकिन 2022 के बाद मामला अनिश्चितता में चला गया।
इसी वजह से कुल 75 अपीलें लंबित हो गईं, जिनमें पक्षकार वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे थे।
हाईकोर्ट का ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ समाधान
इस जटिल स्थिति में हाईकोर्ट ने एक अनोखा और व्यावहारिक रास्ता अपनाया.
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सभी 75 डिवीजन बेंच अपीलों को समाप्त करते हुए इन्हें एकल पीठ रिट याचिकाओं में बदलने का आदेश दिया.
इस फैसले के बाद अब इन मामलों की सुनवाई सिंगल बेंच करेगी.
कोर्ट ने कहा कि इस कदम से मामलों की सुनवाई तेजी से होगी और पक्षकारों को अनावश्यक देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
न्यायिक अनुशासन पर सख्त टिप्पणी
जस्टिस अरुण मोंगा ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा जब एक खंडपीठ पहले ही किसी मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेज चुकी है तब दूसरी समान स्तर की खंडपीठ उस पर फैसला नहीं दे सकती.
कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) का मूल सिद्धांत है।
इसलिए कोर्ट ने खुद निर्णय देने के बजाय मामला बड़ी बेंच पर छोड़ना ही उचित समझा।
“न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि “2018 से लंबित अपीलों को और अधिक लटकाना पक्षकारों के साथ अन्याय होगा।”
इसी आधार पर अदालत ने देरी से बचने के लिए वैकल्पिक रास्ता चुना।
क्यों जरूरी था यह फैसला?
फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 19(4) और 19(5) के तहत इन आदेशों पर रिवीजन (Revision) का भी स्पष्ट प्रावधान नहीं है, अपील की स्थिति भी विवादित है
ऐसे में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 की व्यापक शक्तियों का उपयोग करते हुए समाधान निकाला।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा सभी 75 अपीलें अब रिट याचिकाओं के रूप में पुनः दर्ज की जाएं. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार इन्हें सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए.
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को आदेश दिया कि 27 मई 2022 के लंबित रेफरेंस की जानकारी मुख्य न्यायाधीश को दी जाए और जल्द से जल्द बड़ी बेंच का गठन सुनिश्चित किया जाए.