जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट के सामने पॉक्सो मामलों की जांच में पुलिस की एक बड़ी चूक आई।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले की जांच में पुलिस की ओर से कानून में तय प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एक मामले में पीड़िता की उम्र तय करने के लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
इसे गंभीर मामला मानते हुए हाईकोर्ट ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि पॉक्सो और किशोर न्याय कानून से जुड़े मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों को प्रशिक्षण देने पर विचार करें, ताकि भविष्य में जांच के दौरान ऐसी कानूनी चूक दोबारा न हो।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह टिप्पणी एक आरोपी को जमानत देते हुए की।
हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो और किशोर न्याय कानून के मामलों में जांच अधिकारियों के लिए कानूनी प्रावधानों की सही समझ बेहद जरूरी है।
अगर जांच कानून के अनुसार नहीं होगी तो इसका सीधा असर मुकदमे की निष्पक्षता पर पड़ेगा। इसी वजह से कोर्ट ने अपने आदेश की कॉपी डीजीपी को भी भेजने के निर्देश दिए।
क्या है मामला?
मामला एक ऐसे आरोपी से जुड़ा है, जिसके खिलाफ अपहरण, दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
आरोपी को 10 नवंबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था और पुलिस उसके खिलाफ चालान भी पेश कर चुकी है।
आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सबसे बड़ा सवाल पीड़िता की उम्र को लेकर उठाया।
उम्र तय करने में कहां हुई चूक?
बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि जांच के दौरान पुलिस पीड़िता का जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं कर सकी। वहीं जन आधार कार्ड में उसकी उम्र 18 वर्ष दर्ज थी, जबकि मेडिकल जांच में उसकी उम्र 15 से 18 वर्ष के बीच बताई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की उम्र तय करना बेहद अहम होता है, क्योंकि उसी के आधार पर पॉक्सो एक्ट के प्रावधान लागू होते हैं।
हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान उम्र तय करने में कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने बताया- उम्र कैसे तय होगी
हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम की धारा 94 उम्र निर्धारण की स्पष्ट प्रक्रिया बताती है।
इसके तहत सबसे पहले जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल रिकॉर्ड या नगर निकाय के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज देखे जाने चाहिए। केवल तब, जब ऐसे दस्तावेज उपलब्ध न हों, मेडिकल परीक्षण का सहारा लिया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बजाय केवल एक मेडिकल अधिकारी की राय के आधार पर उम्र तय करने की कोशिश की गई, जो कानून में तय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थी।
डीजीपी को आदेश
हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला केवल एक आरोपी की जमानत तक सीमित नहीं है।
इससे यह भी सामने आया कि कई बार जांच अधिकारी पॉक्सो और किशोर न्याय कानून के प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं कर पाते।
इसी वजह से कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि पॉक्सो और किशोर न्याय कानून से जुड़े मामलों की जांच करने वाले अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देने पर विचार किया जाए, ताकि भविष्य में उम्र निर्धारण जैसे महत्वपूर्ण मामलों में कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी न हो।
हाईकोर्ट ने माना कि जांच अधिकारियों को कानून में तय प्रक्रिया की बेहतर जानकारी होना जरूरी है। तभी पॉक्सो और किशोर न्याय कानून से जुड़े मामलों की निष्पक्ष और सही जांच सुनिश्चित की जा सकेगी।
इसी उद्देश्य से हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भेजने के निर्देश दिए, ताकि इस संबंध में आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
आरोपी को जमानत
हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल पीड़िता की उम्र को लेकर रिकॉर्ड में स्पष्टता नहीं है। इसका अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान पेश होने वाले साक्ष्यों के आधार पर होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी लंबे समय से जेल में है, पुलिस जांच पूरी हो चुकी है और चालान भी पेश किया जा चुका है। मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना भी नहीं है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने की शर्त पर जमानत देने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि पॉक्सो और किशोर न्याय कानून से जुड़े मामलों में जांच के दौरान कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
खासकर पीड़ित की उम्र तय करते समय जांच अधिकारियों को किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के प्रावधानों का पालन करना होगा।