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महज डांट-फटकार आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं: छात्रा आत्महत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने दो शिक्षिकाओं समेत तीन आरोपियों को दी राहत

Rajasthan High Court Discharges Three Accused in Student Suicide Case, Says Mere Scolding Is Not Abetment

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने बीकानेर में 12वीं कक्षा की छात्रा की आत्महत्या से जुड़े करीब दो दशक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दो शिक्षिकाओं समेत तीन आरोपियों को बड़ी राहत दी है।

हाईकोर्ट ने बीकानेर की सत्र कोर्ट की ओर से धारा 305 आईपीसी के तहत आरोप तय करने के आदेश को रद्द करते हुए तीनों आरोपियों को इस मामले से डिस्चार्ज कर दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी छात्र को पढ़ाई, अनुशासन, नियमित उपस्थिति या खराब प्रदर्शन को लेकर डांटना-फटकारना मात्र आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता।

जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाया, उसकी योजना बनाई या उसमें सक्रिय मदद की, तब तक उसके खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का मामला नहीं बनता।

इसी आधार पर जस्टिस कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने बीकानेर की अतिरिक्त सत्र कोर्ट के 9 फरवरी 2021 के आदेश को रद्द करते हुए दो शिक्षिकाओं समेत तीनों आरोपियों को धारा 305 आईपीसी के आरोप से डिस्चार्ज कर दिया।

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आत्महत्या नोट से शुरू हुआ विवाद

मामला वर्ष 2005 का है, जब बीकानेर के एक स्कूल में कक्षा 12वीं की छात्रा ने 19 अक्टूबर को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि छात्रा ने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें स्कूल के कुछ शिक्षकों पर उसे प्रताड़ित करने, अपमानित करने और स्कूल से निकालने की कोशिश करने के आरोप लगाए गए थे।

परिजनों का कहना था कि शिक्षकों द्वारा लगातार दबाव और अपमान के कारण छात्रा मानसिक रूप से परेशान हो गई, जिसके चलते उसने यह कदम उठाया।

इसी आधार पर शिक्षकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और जांच शुरू की गई।

हालांकि, जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि मौजूद साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं बनता।

इसके बावजूद बाद में सत्र कोर्ट ने तीनों आरोपियों के खिलाफ धारा 305 आईपीसी के तहत आरोप तय कर दिए, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

मामले में शिक्षको ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने पैरवी करते की।

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जांच में क्या सामने आया?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच के दौरान पुलिस को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे शिक्षकों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला बनता हो।

पुलिस ने शिक्षकों, छात्रा के सहपाठियों और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए। जिसमें बताया गया कि छात्रा नियमित रूप से स्कूल नहीं आ रही थी और पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं दे रही थी।

जांच में सामने आया कि शिक्षक छात्रा को नियमित रूप से कक्षा में आने, पढ़ाई करने और क्लास टेस्ट में शामिल होने के लिए कहते थे।

उसे कई बार समझाया गया और जरूरत पड़ने पर उसे डांटते भी थे। यह भी कहा गया कि यदि वह लगातार अनुपस्थित रही तो अपने पिता को स्कूल लेकर आए।

जांच में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर पुलिस ने 19 सितंबर 2006 को नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की और कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य और गवाहों के बयान प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ दुष्प्रेरण का मामला नहीं बनाते।

ऐसे में नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट की अनदेखी कर आरोप तय करना उचित नहीं था।

हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत?

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 305 आईपीसी के तहत मामला तभी बनता है, जब पहले यह साबित हो कि आरोपी ने धारा 107 आईपीसी के तहत आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण किया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दुष्प्रेरण का मतलब केवल किसी व्यक्ति को मानसिक तनाव देना नहीं है।

इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया, उसकी योजना बनाई या जानबूझकर ऐसी मदद की, जिससे आत्महत्या हुई।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी छात्र को डांटना, पढ़ाई के लिए टोकना या अनुशासन बनाए रखने के लिए की गई सामान्य कार्रवाई को अपने आप दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।

जब तक आत्महत्या के लिए उकसाने की स्पष्ट मंशा और उससे जुड़ा कोई ठोस कृत्य साबित न हो, तब तक आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

शिक्षकों की जिम्मेदारी पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षक और छात्र का रिश्ता अनुशासन, मार्गदर्शन और पढ़ाई से जुड़ा होता है।

अगर कोई छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं आता, पढ़ाई में लापरवाही करता है या अनुशासन का पालन नहीं करता, तो उसे समझाना, जरूरत पड़ने पर डांटना-फटकारना और पढ़ाई के लिए प्रेरित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे सामान्य अनुशासनात्मक कदमों को केवल इस वजह से आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता कि बाद में छात्र ने कोई गलत कदम उठा लिया।

जब तक शिक्षक की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने की स्पष्ट मंशा और उससे जुड़ा कोई प्रत्यक्ष कृत्य साबित न हो, तब तक उस पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

बीकानेर सत्र कोर्ट का आदेश रद्द

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और जांच रिपोर्ट का मूल्यांकन करने पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, जिससे यह माना जा सके कि आरोपियों ने छात्रा को आत्महत्या के लिए उकसाया था या जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा की थीं, जिनके कारण उसने यह कदम उठाया।

हाईकोर्ट ने माना कि जब रिकॉर्ड से धारा 107 आईपीसी के तहत दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्व साबित ही नहीं होते, तो धारा 305 आईपीसी के तहत आरोप तय करने का भी कोई कानूनी आधार नहीं बचता।

ऐसे में बीकानेर की सत्र कोर्ट का 9 फरवरी 2021 का आदेश कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता था

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने बीकानेर की सत्र कोर्ट के आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया और दो शिक्षिकाओं समेत तीनों आरोपियों को इस मामले से डिस्चार्ज कर दिया।

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