जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शादी के करीब 15 साल बाद पत्नी की आत्महत्या के मामले में उकसाने के आरोप में जेल में बंद पति को जमानत दे दी है।
जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि पत्नी को बेटा नहीं होने पर ताने देने और पति की दूसरी शादी की धमकी के आरोप सामने आए हैं, लेकिन रिकॉर्ड में प्रथमदृष्टया ऐसा स्पष्ट आधार नहीं दिखता, जिससे पति की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने या जानबूझकर मजबूर करने की बात सामने आए।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113A के तहत BSA की धारा 117 की कानूनी धारणा भी लागू नहीं होती, क्योंकि महिला की मौत शादी के 7 साल से ज्यादा समय बाद हुई थी।
हाईकोर्ट ने जमानत देते समय यह भी देखा कि पति 6 जून 2026 से जेल में है, जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। ट्रायल पूरा होने में समय लग सकता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर पति को आगे हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि जमानत के इस आवेदन पर की गई टिप्पणियां सिर्फ इसी मामले में जमानत देने तक सीमित हैं। इन टिप्पणियों का असर ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले पर नहीं पड़ेगा।
मामले में आरोपी बलवंत सिंह की ओर से अधिवक्ता राजक खान हैदर ने पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील सुरेंद्र बिश्नोई और शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रवीर कुमार ने पक्ष रखा।
15 साल की शादी के बाद पत्नी ने की थी आत्महत्या
मामला जालोर के सरवाना थाना क्षेत्र में दर्ज FIR नंबर 58/2026 से जुड़ा है। मृतका कैलाश कंवर की शादी आरोपी बलवंत सिंह से करीब 15 साल पहले हुई थी। दोनों की दो बेटियां थीं।
FIR में मृतका के पिता ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से उसे दहेज और पैसों को लेकर परेशान किया जाता था। कुछ समय पहले पति की ओर से नया कारोबार शुरू करने के लिए पैसे मांगने का भी आरोप लगाया गया। FIR में यह भी कहा गया कि महिला को बेटा नहीं होने पर ताने दिए जाते थे।
आरोप यह भी था कि महिला को पति की दूसरी शादी की धमकी दी जाती थी और उसके देवर ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया।
बेटे नहीं होने को लेकर प्रताड़ित करने का आरोप लगा
शिकायत के मुताबिक, कैलाश कंवर की दो बेटियां थीं। आरोप था कि उसे बेटा नहीं होने को लेकर ताने दिए जाते थे और पति की दूसरी शादी की बात कहकर भी प्रताड़ित किया जाता था।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि उसके देवर हरि सिंह ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया, ताकि उसके पति की दूसरी शादी हो सके।
26 अप्रैल 2026 को कैलाश कंवर की आत्महत्या की जानकारी उसके पिता को मिली। इसके बाद पिता की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
पुलिस ने BNS की धारा 85 और 108 के तहत चार्जशीट दाखिल की
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में प्रथमदृष्टया मौत का कारण फांसी लगाना बताया गया। रिपोर्ट में शरीर पर किसी अन्य बाहरी चोट का जिक्र नहीं मिला।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने पति बलवंत सिंह, ससुर शंकर सिंह और सास जोर कंवर के खिलाफ BNS की धारा 85 और 108 के तहत चार्जशीट दाखिल की।
वहीं, हरि सिंह समेत कुछ अन्य नामजद लोगों के खिलाफ जांच में पुलिस को प्रथमदृष्टया पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इसलिए पुलिस ने उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की।
हाईकोर्ट ने देखा- विवाद शादी के कई साल बाद शुरू हुआ
जमानत पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मृतका के पिता के जांच के दौरान दर्ज बयान को भी देखा। कोर्ट के मुताबिक, पिता ने बताया था कि शादी के बाद करीब 8-9 साल तक पति-पत्नी के बीच सब ठीक रहा।
उसके मुताबिक विवाद करीब 4 साल पहले, दूसरी बेटी के जन्म के बाद शुरू हुआ था। एक अहम बात यह भी सामने आई कि जांच के दौरान पिता के बयान में दहेज या पैसे की किसी खास मांग का स्पष्ट आरोप नहीं था। हालांकि उन्होंने अपनी बेटी को बेटा नहीं होने पर ताने देने की बात कही थी।
पहले भी आत्महत्या की कोशिश की बात रिकॉर्ड में आई
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद अन्य घटनाओं पर भी गौर किया। मृतका के पिता के बयान के मुताबिक, एक बार महिला ने कोई पदार्थ खा लिया था, जिसके बाद पति उसे अस्पताल लेकर गया था।
एक अन्य घटना में पति से विवाद के बाद महिला के पानी की टंकी में कूदने की बात भी सामने आई, लेकिन उसे बचा लिया गया था। इसके बाद उसे कुछ समय के लिए मायके भेजा गया था।
घटना से कुछ दिन पहले ही पिता की उससे फोन पर बात भी हुई थी और उसने बताया था कि सब ठीक चल रहा है।
‘ताने और धमकी के आरोप हैं, लेकिन उकसाने की कड़ी नहीं‘
हाईकोर्ट ने चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को देखा। रिकॉर्ड के मुताबिक, महिला को बेटा नहीं होने पर ताने दिए जाते थे और पति की दूसरी शादी की धमकी दी जाती थी।
जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि जमानत के स्तर पर उपलब्ध सबूतों से प्रथमदृष्टया ऐसा आधार नहीं दिखता, जिससे यह माना जा सके कि पति ने महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया, जानबूझकर मदद की या ऐसा कोई अन्य काम किया, जो आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के दायरे में आता हो।
यही इस जमानत आदेश का सबसे अहम हिस्सा है। कोर्ट ने आरोपों को खारिज नहीं किया, बल्कि यह देखा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के जरूरी तत्व जमानत के इस स्तर पर उपलब्ध सबूतों से प्रथमदृष्टया पूरे होते हैं या नहीं।
6 जून से जेल में था पति, जांच भी पूरी हो चुकी थी
हाईकोर्ट ने जमानत देते समय सिर्फ आरोपों की प्रकृति ही नहीं, बल्कि पति की हिरासत की अवधि और जांच की स्थिति को भी ध्यान में रखा।
हाईकोर्ट ने पाया कि बलवंत सिंह 6 जून 2026 से न्यायिक हिरासत में है, जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है। ट्रायल पूरा होने में काफी समय लग सकता है। साथ ही, अभियोजन की ओर से उसके फरार होने की कोई खास आशंका भी सामने नहीं रखी गई।
इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि बलवंत सिंह को आगे हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी मंजूर कर दी।
₹50 हजार के निजी बॉन्ड पर जमानत, कोर्ट ने शर्तें भी लगाईं
हाईकोर्ट ने बलवंत सिंह को ₹50,000 के निजी बॉन्ड और ₹25,000-₹25,000 की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने शर्त लगाई कि वह सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा, गवाहों को प्रभावित या धमकाने की कोशिश नहीं करेगा और किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा।
उसे ट्रायल कोर्ट में तय तारीखों पर उपस्थित भी होना होगा। शर्तों का उल्लंघन होने पर उसकी जमानत रद्द की जा सकती है।
जमानत का मतलब बरी होना नहीं, ट्रायल कोर्ट करेगा अंतिम फैसला
अहम बात यह है कि हाईकोर्ट का यह फैसला बरी किए जाने का फैसला नहीं है। कोर्ट ने केवल जमानत के स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों का आकलन किया है।
मामले में आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट उपलब्ध सबूतों और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा।