बीमारी के बावजूद मेडिकल बोर्ड नहीं बनाकर किया गया था डिस्चार्ज, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को बकाया भुगतान का भी दिया आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सेना के पूर्व सिपाही ओमप्रकाश को दिव्यांग (डिसेबिलिटी) अथवा अमान्य (इनवैलिड) पेंशन देने का आदेश दिया है।
करीब 31 वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करने वाले पूर्व सैनिक को राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सेना द्वारा सेवा के दौरान बीमारी से पीड़ित सैनिक का मेडिकल बोर्ड न कराना और उसकी चिकित्सा स्थिति को रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करना गंभीर त्रुटि है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सैनिक को उसके वैधानिक पेंशन अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुधेश बंसल और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने यह फैसला देते हुए सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के 16 अगस्त 2022 के आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया और केंद्र सरकार, रक्षा मंत्रालय तथा संबंधित सैन्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को इनवैलिड पेंशन का लाभ प्रदान करें.
क्या है पूरा मामला?
सीकर जिले के फतेहपुर निवासी याचिकाकर्ता ओमप्रकाश को 13 जून 1984 को आर्मी सर्विस कोर (ASC) में सिपाही के रूप में भर्ती किया गया था।
लगभग 11 वर्ष की सेवा के बाद 1 जून 1995 को उन्हें सेना से डिस्चार्ज कर दिया गया।
सेना ने उन्हें आर्मी रूल्स, 1954 के नियम 13(3) आइटम III(v) के तहत “अनडिजायरेबल सोल्जर” मानते हुए सेवा से हटाया था।
सेना का कहना था कि उनके खिलाफ पांच “रेड इंक एंट्री” दर्ज थीं, जिसके आधार पर उन्हें सेवा में बनाए रखना उचित नहीं था।
हालांकि ओमप्रकाश का दावा था कि सेवा के दौरान वे गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गए थे और उनकी वास्तविक स्थिति को छिपाकर उन्हें पेंशन से वंचित किया गया।
सेना की नौकरी के दौरान हुई गंभीर बीमारी
याचिका में दावा किया गया कि याचिकाकर्ता ओमप्रकाश वर्ष 1993 में बीमार पड़ गए थे।
उन्हें दिल्ली कैंट स्थित आर्मी हॉस्पिटल में 4 नवंबर 1993 से 12 नवंबर 1993 तक भर्ती रखा गया।
वहां डॉक्टरों ने उन्हें “रेडियल नर्व पाल्सी (राइट)” यानी RNP (Rt) नामक न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित पाया।
इसके बाद उन्हें पुनः 10 दिसंबर 1993 से 17 जनवरी 1994 तक जोधपुर मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती रहना पड़ा। वहां भी वही बीमारी दर्ज की गई।
अस्पतालों द्वारा जारी डिस्चार्ज स्लिप्स में इस बीमारी का स्पष्ट उल्लेख था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बीमारी के बावजूद सेना ने न तो उनकी दिव्यांगता का मूल्यांकन कराया और न ही मेडिकल बोर्ड गठित किया।
मेडिकल बोर्ड नहीं बनाना बना बड़ा मुद्दा
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि ओमप्रकाश को 1 जून 1995 को सेवा से हटाने से पहले किसी भी प्रकार के रिलीज मेडिकल बोर्ड (RMB) के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
फैसले में कहा गया कि जब कोई सैनिक पहले से दो बार सैन्य अस्पतालों में भर्ती रह चुका हो और उसके पास बीमारी का स्पष्ट रिकॉर्ड मौजूद हो, तब उसे सेवा से हटाने से पहले मेडिकल बोर्ड द्वारा उसकी स्थिति का आकलन करना अनिवार्य था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि सेवा समाप्ति प्रमाणपत्र में सैनिक की मेडिकल श्रेणी (Medical Category) वाला कॉलम खाली छोड़ दिया गया था। अदालत ने इसे बीमारी को छिपाने का प्रयास माना।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि सेना यह बताने में पूरी तरह विफल रही कि आखिर ओमप्रकाश का मेडिकल बोर्ड क्यों नहीं कराया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि सैनिक सेवा में भर्ती होते समय स्वस्थ था और बीमारी उसे सेवा के दौरान हुई। इसलिए नियमों के अनुसार यह माना जाएगा कि बीमारी सैन्य सेवा के दौरान उत्पन्न हुई और सेवा से प्रभावित या बढ़ी (Attributable to and Aggravated by Service) थी।
कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड छिपाना तथा मेडिकल बोर्ड नहीं बनाना प्रशासनिक लापरवाही और दुर्भावना को दर्शाता है।
AFT ने क्यों खारिज कर दी थी याचिका?
ओमप्रकाश ने पहले राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे बाद में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) को स्थानांतरित कर दिया गया।
AFT ने 16 अगस्त 2022 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
ट्रिब्यूनल ने मुख्य रूप से यह माना कि याचिका काफी देरी से दायर की गई थी और याचिकाकर्ता नियमित पेंशन की पात्रता के लिए आवश्यक 15 वर्ष की सेवा पूरी नहीं कर पाया था।
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के दृष्टिकोण को गलत बताते हुए कहा कि AFT ने मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर विचार ही नहीं किया।
अदालत ने कहा कि नियमित पेंशन और इनवैलिड पेंशन दो अलग-अलग विषय हैं।
जहां नियमित सेवा पेंशन के लिए 15 वर्ष की सेवा आवश्यक है, वहीं सेना पेंशन विनियम, 1961 के विनियम 198 के अनुसार इनवैलिड पेंशन के लिए केवल 10 वर्ष की योग्यता सेवा पर्याप्त है।
ओमप्रकाश ने 10 वर्ष 11 माह 18 दिन की सेवा पूरी की थी, इसलिए वे इनवैलिड पेंशन के पात्र थे।
रेड इंक एंट्री के आधार पर पेंशन नहीं रोकी जा सकती
मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी था कि क्या पांच रेड इंक एंट्री होने के कारण सैनिक को पेंशन से वंचित किया जा सकता है?
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चार या अधिक रेड इंक एंट्री होना किसी सैनिक को स्वतः सेवा से हटाने का आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने कहा कि रेड इंक एंट्री केवल यह दर्शाती है कि संबंधित सैनिक को डिस्चार्ज करने पर विचार किया जा सकता है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि उसे हटाया ही जाए।
सुप्रीम कोर्ट के वीरेंद्र कुमार दुबे बनाम चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, विजय शंकर मिश्रा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अमरेंद्र कुमार पांडे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सैनिक की पूरी सेवा, परिस्थितियां और स्वास्थ्य स्थिति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
बीमारी और अनुशासनात्मक कार्रवाई के बीच संबंध
हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज पांच में से चार रेड इंक एंट्री वर्ष 1994 के दौरान हुई थीं।
यही वह समय था जब वह RNP (Rt) नामक न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित था।
कोर्ट ने कहा कि यह मानना उचित होगा कि बीमारी के कारण उसकी कार्यक्षमता और व्यवहार प्रभावित हुई होगी. इसलिए उस अवधि में हुई अनुशासनात्मक त्रुटियों को पूरी तरह जानबूझकर किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अधिक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए था।
देरी के बावजूद क्यों मिला लाभ?
केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि ओमप्रकाश ने 1995 में सेवा से हटाए जाने के बाद लगभग 14 वर्ष बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया था, इसलिए उनका दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पेंशन का अधिकार एक निरंतर (Continuing Cause of Action) अधिकार है।
यदि किसी व्यक्ति को वैधानिक रूप से मिलने वाली पेंशन नहीं दी जा रही है तो उसका दावा केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन कोई दान या अनुग्रह नहीं बल्कि अर्जित अधिकार है।
सेना पेंशन नियमों की विस्तृत व्याख्या
अदालत ने सेना पेंशन विनियम, 1961 के विनियम 197 और 198 का विस्तार से उल्लेख किया।
विनियम 197 के अनुसार ऐसे सैनिक जिन्हें बीमारी या दिव्यांगता के कारण सेवा से हटाया गया हो, वे इनवैलिड पेंशन पाने के पात्र हो सकते हैं।
विनियम 198 के अनुसार इसके लिए न्यूनतम 10 वर्ष की योग्यता सेवा आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह शर्त पूरी कर ली थी और रिकॉर्ड से यह भी साबित हो गया कि बीमारी सेवा के दौरान हुई थी। इसलिए उन्हें इनवैलिड पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।
31 साल बाद मेडिकल बोर्ड संभव नहीं
कोर्ट ने माना कि यदि समय रहते मेडिकल बोर्ड बनाया गया होता तो दिव्यांगता का प्रतिशत निर्धारित किया जा सकता था।
लेकिन अब 31 वर्ष बीत चुके हैं। ऐसे में नया मेडिकल बोर्ड गठित करना व्यावहारिक नहीं है।
इसलिए अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड, अस्पताल के दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता दिव्यांगता/अमान्य पेंशन का पात्र है।
कब से मिलेगी पेंशन?
हालांकि हाईकोर्ट ने यह माना कि ओमप्रकाश की पात्रता 1 जून 1995 से ही बन गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि विलंबित दावों में संतुलन बनाए रखने के लिए बकाया राशि को सीमित किया जा सकता है।
इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को उसकी याचिका दायर करने की तारीख से तीन वर्ष पूर्व की अवधि से बकाया पेंशन का भुगतान किया जाए।
इसके साथ ही जुलाई 2026 से नियमित रूप से इनवैलिड पेंशन जारी रखने के निर्देश भी दिए गए।
तीन महीने में भुगतान का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जून 2026 तक की समस्त बकाया राशि तीन महीने के भीतर अदा की जाए।
यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया जाता है तो देरी की अवधि के लिए 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।