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छात्रसंघ चुनावों के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट से छात्रों को बड़ा झटका, तत्काल चुनाव कराने से इंकार

Rajasthan High Court Grants Relief to State Government in Student Union Election Restoration Case

छात्रसंघ चुनाव एक संवैधानिक अधिकार हैं, लेकिन यह अधिकार शिक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। भविष्य के लिए जारी किए स्पष्ट आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेशभर में छात्रसंघ चुनाव बहाली के मामले में तत्काल चुनाव कराने का आदेश देने से इंकार किया हैं.

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि छात्रसंघ चुनाव एक संवैधानिक अधिकार हैं, लेकिन यह अधिकार शिक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता.

अदालत ने इस संतुलन को आवश्यक बताते हुए युनिवर्सिटी को आदेश दिया हैं कि वह छात्रों के चुनावों के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और प्रभावी नीति निर्धारित करे, जिससे शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित न हों.

राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले से जहां प्रदेश के सभी कॉलेज युनिवर्सिटी में वर्ष 2025—26 के छात्रसंघ चुनाव की स्थिती साफ हो गयी हैं. छात्रसंघ चुनाव लड़ने की चाह रखने वाले युवाओं को झटका लगा हैं.

वही राजस्थान सरकार को हाईकोर्ट के इस फैसले से बड़ी राहत मिली हैं. हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में दाखिल सभी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए चुनाव आयोग और राज्य सरकार दोनों को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

14 नवंबर को जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने इस मामले में सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रखा था, जिस पर अब फैसला सुनाया गया है.

जस्टिस समीर जैन के जोधपुर होने और शीतकालीन अवकाश से पूर्व अंतिम कार्यदिवस के चलते राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस उमाशंकर व्यास की एकलपीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाया.

इस चरण पर चुनाव व्यावहारिक नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि इस चरण पर चुनाव व्यावहारिक नहीं है। हालांकि, अदालत ने भविष्य में छात्रसंघ चुनावों को लेकर विस्तृत आदेश दिए हैं.

छात्रनेता जय राव, अभय चौधरी, आकाश चौधरी व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं में अधिवक्ता शांतनु पारीक ने पैरवी करते हुए तर्क दिया कि छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें न कराना छात्रों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संगठन बनाने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

अधिवक्ता ने कहा कि लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार हर वर्ष चुनाव होना चाहिए, इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव टालता रहा है.

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि छात्रों से चुनाव शुल्क वसूला गया, लेकिन चुनाव नहीं कराए गए।

राज्य सरकार और विश्वविद्यालय का पक्ष

राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने पैरवी करते हुए अदातल से कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के तहत सेमेस्टर प्रणाली लागू होने, 180 अनिवार्य शिक्षण दिवस, परीक्षाओं के दबाव और प्रशासनिक कारणों से चुनाव संभव नहीं थे.

सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने विश्वविद्यालय के आंतरिक मंचों पर अपनी शिकायत दर्ज कराए बिना सीधे हाईकोर्ट का रुख किया, जिससे याचिकाएं प्रीमैच्योर हैं।

शिक्षा सर्वोपरी लेकिन चुनाव भी आवश्यक

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि छात्रसंघ चुनाव छात्रों में नेतृत्व क्षमता, लोकतांत्रिक सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करते हैं, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों का प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा और अकादमिक अनुशासन बनाए रखना है.

हाईकेार्ट ने कहा कि कुछ छात्रों की ओर से दायर याचिकाओं के आधार पर पूरे राज्य के लिए तत्काल चुनाव का आदेश देना उचित नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि छात्रों के लिए शिक्षा सर्वोपरी हैं लेकिन चुनाव भी आवश्यक हैं.

भविष्य के लिए आदेश

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विश्वविद्यालयों और राज्य सरकार को आदेश दिए कि भविष्य में छात्रसंघ चुनावों को लेकर एक पारदर्शी और समयबद्ध नीति बनाई जाए.

हाईकोर्ट ने आदेश दिया हैं कि हर वर्ष मार्च माह में चुनाव कैलेंडर घोषित किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव शुल्क का उपयोग केवल चुनाव प्रक्रिया के लिए हो और किसी भी प्रकार का बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप सख्ती से रोका जाए।

अकादमिक गतिविधियां न हों प्रभावित

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि चुनाव प्रक्रिया के कारण कक्षाएं, परीक्षाएं, शोध कार्य और सेमेस्टर सिस्टम बाधित नहीं होने चाहिए

साथ ही विश्वविद्यालय परिसरों का उपयोग सामान्य राजनीतिक चुनावों के लिए सीमित रखने पर भी जोर दिया गया।

चुनाव आयोग को आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही चुनाव आयोग को भी आदेश दिए हैं कि वह आम चुनावों के​ लिए विश्वविद्यालय के संकाय या क्षेत्र का प्रयोग नहीं किया जाए और उसकी जगह वैकल्पिक स्थान की तलाश की जाए.

इन सभी निर्देशों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने छात्रसंघ चुनावों से संबंधित सभी याचिकाओं को निस्तारित कर दिया.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि विश्वविद्यालय इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो संबंधित पक्ष पुनः कोर्ट का रुख कर सकते हैं।

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