जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act, 2009) को लेकर अपना विस्तृत फैसला जारी कर दिया है।
8 जनवरी को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की खंडपीठ ने खुली अदालत में फैसले का ओपनिंग पार्ट सुनाते हुए विस्तृत फैसला जारी करने का कहा था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने इस विस्तृत फैसले में प्री-प्राइमरी में भी 25% आरक्षण को अनिवार्य किया है।
राज्य सरकार, विभिन्न निजी स्कूलों, स्कूल संघों और सामाजिक संगठनों द्वारा दायर दर्जनों रिट याचिकाओं और विशेष अपीलों पर हाईकोर्ट ने कहा कि RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) और उसके प्रावधान को अलग-अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक संयुक्त योजना है, जिसका उद्देश्य सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) सुनिश्चित करना है। यदि कोई स्कूल प्री-प्राइमरी शिक्षा प्रदान करता है, तो वह आरटीई के दायरे से बाहर नहीं रह सकता।
विवाद का मूल कारण
विवाद की जड़ राज्य सरकार द्वारा जारी वे दिशानिर्देश थे, जिनमें कुछ शैक्षणिक सत्रों में आरटीई के तहत प्रवेश को केवल कक्षा 1 तक सीमित कर दिया गया था।
इसके चलते निजी स्कूल प्री-प्राइमरी स्तर पर सामान्य शुल्क लेकर बच्चों को प्रवेश दे रहे थे, जबकि कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को उसी स्तर पर प्रवेश से वंचित किया जा रहा था।
याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21A और RTE अधिनियम की भावना के खिलाफ बताया।
जनहित याचिकाओं में गंभीर सवाल
जनहित याचिकाओं में कहा गया कि RTE अधिनियम बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करता है।
यदि प्री-प्राइमरी स्तर को इससे बाहर रखा जाता है, तो समाज के सबसे कमजोर तबके के बच्चों के साथ भेदभाव होगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) का प्रावधान और उसका प्रोवाइज़ो स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई स्कूल प्री-स्कूल शिक्षा देता है, तो वहां भी 25% आरक्षण लागू होगा।
राज्य सरकार और स्कूलों का पक्ष
राज्य सरकार और कई निजी स्कूलों की ओर से यह दलील दी गई कि RTE अधिनियम मुख्य रूप से “एलीमेंट्री एजुकेशन” यानी कक्षा 1 से 8 तक लागू होता है और प्री-प्राइमरी शिक्षा इसके दायरे में नहीं आती।
साथ ही यह भी कहा गया कि प्री-प्राइमरी स्तर पर आरटीई लागू करने से वित्तीय बोझ बढ़ेगा और प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है।
हाईकोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को ऐसे दिशानिर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है, जो मूल कानून की भावना के विपरीत हों।
यदि संसद ने कानून बनाकर प्री-प्राइमरी स्तर पर भी आरक्षण का प्रावधान किया है, तो राज्य सरकार उसे सीमित नहीं कर सकती।
अनुच्छेद 14 और 21A का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का मौलिक अधिकार) का विशेष उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि कमजोर वर्ग के बच्चों को प्री-प्राइमरी शिक्षा से वंचित करना एक तरह का असंगत वर्गीकरण (Unreasonable Classification) है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
फैसले की 12 मुख्य बातें
1. प्री-प्राइमरी में भी 25% आरक्षण अनिवार्य
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन निजी गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में प्री-प्राइमरी शिक्षा (PP3+, PP4+, PP5+ या नर्सरी) दी जाती है, वहां भी RTE Act की धारा 12(1)(c) के तहत 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्ग और वंचित समूह के बच्चों के लिए आरक्षित करना अनिवार्य होगा।
2. RTE केवल कक्षा-1 तक सीमित नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि RTE Act का लाभ केवल कक्षा-1 तक सीमित नहीं किया जा सकता। जहां भी स्कूल प्री-स्कूल शिक्षा देता है, वहां RTE लागू होगा।
3. राज्य सरकार की सीमित शक्तियां
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को RTE Act के मूल प्रावधानों से आगे जाकर या उनके विपरीत कोई दिशानिर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है।
RTE के दायरे को सीमित करने वाले सभी दिशानिर्देश कानून विरुद्ध (Ultra Vires) होंगे।
4. दोहरी एंट्री सिस्टम मान्य, लेकिन RTE के साथ
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यदि कोई स्कूल प्री-प्राइमरी और एलीमेंट्री (कक्षा-1) दोनों स्तरों पर शिक्षा देता है,
तो दोनों स्तरों पर RTE के तहत 25% प्रवेश देना होगा।
5. प्री-प्राइमरी को RTE से बाहर नहीं रखा जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार या स्कूल यह तर्क नहीं दे सकते कि प्री-प्राइमरी शिक्षा RTE के दायरे में नहीं आती। धारा 12(1)(c) का प्रोवाइज़ो प्री-स्कूल पर भी लागू होता है।
6. कमजोर वर्ग के बच्चों के साथ भेदभाव असंवैधानिक
हाईकोर्ट ने कहा कि प्री-प्राइमरी स्तर पर केवल शुल्क देकर पढ़ने वाले बच्चों को प्रवेश देना और कमजोर वर्ग के बच्चों को वंचित करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) का उल्लंघन है।
7. स्कूल RTE दायित्व से बच नहीं सकते
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी निजी गैर-अल्पसंख्यक स्कूल यह कहकर RTE से बच नहीं सकता कि
उसे सरकार से समय पर प्रतिपूर्ति (Reimbursement) नहीं मिल रही। RTE एक वैधानिक और संवैधानिक दायित्व है।
8. RTE की योजना को खंडित नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने कहा कि RTE का उद्देश्य पूरे एलीमेंट्री एजुकेशन में 25:75 का सामाजिक संतुलन बनाए रखना है।
केवल एक ही स्तर पर RTE लागू करना इस उद्देश्य के विपरीत है।
9. राज्य सरकार के विरोधाभासी दिशानिर्देश अमान्य
हाईकोर्ट ने सरकार के दिशानिर्देश अमान्य बताते हुए कहा कि जो भी राज्य सरकार के दिशानिर्देश RTE Act के मूल ढांचे के विरुद्ध हैं, वे कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं माने जाएंगे।
10. पहले दिए गए अंतरिम आदेश को वैध ठहराया
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 23 अक्टूबर 2021 को दिया गया अंतरिम आदेश सही था और उसी भावना के अनुरूप अंतिम फैसला दिया जा रहा है।
11. RTE को सामाजिक न्याय का औजार माना गया
हाईकोर्ट ने कहा कि RTE कोई औपचारिक योजना नहीं, बल्कि सामाजिक समावेशन और समान अवसर सुनिश्चित करने का संवैधानिक साधन है।
12. सभी अपीलें और याचिकाएं निस्तारित
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही राज्य सरकार, स्कूल संघों और व्यक्तिगत स्कूलों द्वारा दायर सभी अपीलें और रिट याचिकाएं निस्तारित कीं।