जोधपुर NDPS केस में बड़ा खुलासा: बहन की पैरवी और दिए गए वीडियो से खुली पुलिस कहानी की पोल, हाईकोर्ट ने दिए दोबारा जांच के आदेश,
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने गंभीर अपराधों में पुलिस की तलाशी के मामले में देशभर की पुलिस कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाला रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक जजमेंट दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि गंभीर अपराधों या कठोर सजा वाले मामलों में तलाशी और जब्ती की पूरी प्रक्रिया बॉडी-वॉर्न कैमरों और वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड की जाए।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यह कदम जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि साक्ष्यों से छेड़छाड़, झूठे आरोप या मनगढ़ंत कहानियों की संभावना को रोका जा सके।
Justice Farjand Ali की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट जोधपुर के लूणी थाना क्षेत्र से जुड़े एक NDPS मामले की सुनवाई करते हुए दिया है।
हाईकोर्ट ने मामले में पुलिस रिकॉर्ड और कोर्ट में पेश किए गए वीडियो के बीच गंभीर विरोधाभास पाए जाने पर पूरी जांच पर सवाल उठाते हुए “री-इन्वेस्टिगेशन” यानी शुरू से दोबारा जांच के आदेश दिए हैं।
साथ ही हाईकोर्ट ने आरोपी याचिकाकर्ता गोकलराम को सशर्त चार महीने की अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मामला जोधपुर के पुलिस थाना लूणी में दर्ज एक NDPS केस से जुड़ा है।
पुलिस के अनुसार 10-11 नवंबर 2025 की रात एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स से सूचना मिलने के बाद लूणी थाना पुलिस ने नाकाबंदी की थी।
पुलिस का दावा था कि खाराबेरा पुरोहितान क्षेत्र में एक स्कॉर्पियो वाहन को रोका गया था।
पुलिस के अनुसार वाहन चालक गोकलराम भागने का प्रयास कर रहा था, जिसे पकड़ लिया गया, जबकि एक अन्य व्यक्ति अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गया।
पुलिस ने वाहन से लगभग 5 क्विंटल 43 किलो डोडा पोस्त, 35 जिंदा कारतूस, एक खाली मैगजीन और छह फर्जी नंबर प्लेट बरामद करने का दावा किया।
इसके बाद आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।
लेकिन मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब कोर्ट के सामने एक वीडियो पेश किया गया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पाया कि FIR, परचा कायम और जब्ती मेमो में दर्ज घटनाक्रम तथा वीडियो में दिखाई दे रही परिस्थितियों के बीच गंभीर अंतर है।
बहन ने की याचिकाकर्ता भाई की पैरवी
याचिकाकर्ता गोकलराम की ओर से उसकी बहन डालू उर्फ दीपिका ने राजस्थान हाईकोर्ट में पैरवी करते हुए कई दलीलें पेश कीं।
याचिकाकर्ता की बहन ने कोर्ट में दावा किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR और वास्तविक घटनाक्रम में गंभीर अंतर है।
याचिकाकर्ता की बहन ने कहा कि पुलिस ने जिस प्रकार घटना का वर्णन FIR, परचा कायम और जब्ती मेमो में किया है, वीडियो उससे पूरी तरह अलग कहानी दिखाता है।
याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि गोकलराम को झूठे तरीके से NDPS मामले में फंसाया गया है और पुलिस द्वारा तैयार किया गया पूरा घटनाक्रम संदिग्ध है।
यह भी दलील दी गई कि यदि पुलिस की कार्रवाई वास्तविक और वैधानिक होती, तो वीडियो और आधिकारिक रिकॉर्ड में विरोधाभास नहीं होता।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कथित बरामदगी, गिरफ्तारी और तलाशी की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं हुई।
तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की जो कहानी पुलिस ने प्रस्तुत की, वह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाती।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने कहा कि पूरी जांच पक्षपातपूर्ण, अविश्वसनीय और दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती है।
मूल कहानी ही विवादित
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि मामले में केवल “फर्दर इन्वेस्टिगेशन” पर्याप्त नहीं होगी, क्योंकि संदेह केवल जांच की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि FIR की मूल कहानी ही विवादित हो चुकी है।
इसलिए मामले में शुरू से “री-इन्वेस्टिगेशन” की आवश्यकता है।
याचिकाकर्ता की बहन ने दलील दी कि NDPS जैसे गंभीर मामलों में पुलिस द्वारा कानूनन निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
तलाशी और जब्ती की कार्रवाई में पारदर्शिता अनिवार्य है, क्योंकि ऐसे मामलों में बरामदगी ही अभियोजन का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है।
अदालत को यह भी बताया गया कि आरोपी लंबे समय से जेल में बंद है और यदि जांच निष्पक्ष नहीं है, तो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन हो रहा है। इसलिए अदालत से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने तथा आरोपी को राहत देने की मांग की गई।
सरकार और पुलिस का जवाब
मामले में राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता तथा पुलिस अधिकारियों ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा।
सरकार ने कहा कि पुलिस ने एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स से प्राप्त सूचना के आधार पर विधि अनुसार कार्रवाई की थी।
सरकार के अनुसार 10-11 नवंबर 2025 की रात लूणी थाना पुलिस ने नाकाबंदी की और एक संदिग्ध स्कॉर्पियो वाहन को रोका।
पुलिस का कहना था कि वाहन चालक गोकलराम भागने का प्रयास कर रहा था, लेकिन उसे पकड़ लिया गया, जबकि उसका एक साथी फरार हो गया।
पुलिस ने कहा कि वाहन की तलाशी NDPS एक्ट की अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन करते हुए की गई और तलाशी के दौरान लगभग 5 क्विंटल 43 किलो डोडा पोस्त, 35 जिंदा कारतूस, एक खाली मैगजीन तथा छह फर्जी नंबर प्लेट बरामद हुईं।
पुलिस और सरकार ने यह भी कहा कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने अन्य व्यक्तियों की संलिप्तता स्वीकार की और बताया कि मादक पदार्थ कपासन से देचू सप्लाई के लिए ले जाया जा रहा था। इसके आधार पर आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट, आर्म्स एक्ट और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
कुछ अनियमितताएं स्वीकार
हालांकि सुनवाई के दौरान पुलिस आयुक्त द्वारा भी प्रथम दृष्टया जांच प्रक्रिया में कुछ अनियमितताओं की संभावना स्वीकार किए जाने का उल्लेख अदालत ने अपने आदेश में किया।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिकॉर्ड और वीडियो सामग्री के बीच विरोधाभास दिखाई देता है।
पुलिस की ओर से यह भी जानकारी दी गई कि कुछ मामलों में पुलिस अधिकारियों को बॉडी-वॉर्न कैमरे उपलब्ध कराए गए हैं।
इसी पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में तलाशी और जब्ती की कार्रवाई बॉडी कैमरा और वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ की जानी चाहिए।
राज्य पक्ष ने जांच की प्रक्रिया का समर्थन किया, लेकिन अदालत ने उपलब्ध वीडियो और रिकॉर्ड को देखते हुए माना कि मामले में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दोबारा जांच आवश्यक है।
कोर्ट आंखें बंद नहीं कर सकता
Justice Farjand Ali ने अपने विस्तृत फैसले में इस मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि यह प्रकरण केवल एक साधारण आपराधिक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ मामला है।
हाईकोर्ट ने वीडियो को देखने के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि FIR, परचा कायम और जब्ती मेमो में दर्ज घटनाक्रम तथा वीडियो में दिखाई दे रही परिस्थितियों के बीच गंभीर विरोधाभास है।
कोर्ट ने कहा कि यदि वीडियो सही पाया जाता है, तो अभियोजन की पूरी कहानी संदेह के घेरे में आ जाती है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वीडियो एक अलग कहानी बयान करता दिखाई देता है और यदि किसी व्यक्ति को किसी जिम्मेदार पुलिस अधिकारी द्वारा झूठे मामले में फंसाया गया है, तो यह कानून के शासन तथा आपराधिक न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायालय ऐसे मामलों में आंखें बंद नहीं कर सकता।
निष्पक्ष जांच प्रत्येक आरोपी का संवैधानिक अधिकार
हाईकोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष जांच और निष्पक्ष सुनवाई प्रत्येक आरोपी का मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से उत्पन्न होता है।
कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी की जिम्मेदारी केवल आरोपी को गिरफ्तार करना नहीं है, बल्कि सत्य को सामने लाना है।
यदि जांच प्रथम दृष्टया पक्षपातपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या अविश्वसनीय प्रतीत हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य हो जाता है।
अदालत ने कहा कि जांच ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे यह प्रतीत हो कि जांच एजेंसी किसी पूर्वाग्रह या दुर्भावना से कार्य कर रही है। कानून के समक्ष कोई व्यक्ति पद या प्रभाव के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त नहीं कर सकता।
“फर्दर इन्वेस्टिगेशन” और “री-इन्वेस्टिगेशन”
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Vinay Tyagi बनाम Irshad Ali का उल्लेख करते हुए कहा कि “Further Investigation” और “Re-Investigation” दोनों अलग अवधारणाएं हैं।
हाईकोर्ट ने कहा:
“Further Investigation” तब होती है, जब पहले की जांच सामान्य रूप से सही हो, लेकिन कुछ अतिरिक्त साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता हो।
जबकि “Re-Investigation” या “De Novo Investigation” तब आवश्यक होती है, जब पूरी जांच प्रक्रिया ही संदिग्ध, पक्षपातपूर्ण या अविश्वसनीय दिखाई दे।
कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला केवल जांच में कमी का नहीं है, बल्कि FIR की पहली पंक्ति से ही पूरी कहानी संदेह के घेरे में दिखाई दे रही है।
इसलिए केवल पूरक जांच पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि शुरू से दोबारा जांच आवश्यक है।
यह केवल जांच की कमी नहीं, पूरी कहानी संदिग्ध
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में प्रश्न केवल यह नहीं है कि जांच में कुछ कमियां रह गईं, बल्कि यह है कि घटना वास्तव में उसी प्रकार हुई भी थी या नहीं, जैसा पुलिस रिकॉर्ड में बताया गया है।
कोर्ट ने कहा कि घटना का समय, घटना का स्थान, आरोपी की गिरफ्तारी, बरामदगी की सत्यता और पूरी अभियोजन कहानी सभी संदेह के घेरे में दिखाई दे रहे हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में न्यायालय केवल मूकदर्शक नहीं रह सकता।
BNSS की धारा 105 पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 105 को आपराधिक जांच में एक महत्वपूर्ण सुधार बताया।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाता है।
अदालत ने कहा कि कानून में “shall” शब्द का उपयोग यह स्पष्ट करता है कि यह बाध्यकारी प्रावधान है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पहले तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया मुख्य रूप से स्वतंत्र गवाहों पर आधारित होती थी, लेकिन BNSS ने तकनीक आधारित पारदर्शिता को बढ़ावा दिया है।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान पारदर्शिता बढ़ाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने, फर्जी बरामदगी के आरोप रोकने और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
बॉडी-वॉर्न कैमरा अनिवार्य
हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों में पुलिस अधिकारियों द्वारा बॉडी-वॉर्न कैमरा का उपयोग “Need of the Hour” यानी समय की आवश्यकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती की कार्रवाई आपराधिक जांच का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि इन कार्रवाइयों को बॉडी कैमरा के माध्यम से रिकॉर्ड किया जाए, तो इससे जांच की विश्वसनीयता बढ़ेगी और झूठे आरोपों की संभावना कम होगी।
अदालत ने क्यों जताई चिंता?
कोर्ट ने कहा कि पहले तलाशी और जब्ती की कार्रवाई मुख्य रूप से स्वतंत्र गवाहों पर आधारित होती थी, लेकिन आधुनिक समय में तकनीक आधारित साक्ष्य अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं।
अदालत ने कहा कि वीडियो रिकॉर्डिंग से निम्न समस्याओं को रोका जा सकता है:
झूठी बरामदगी के आरोप, फर्जी कहानी तैयार करना, जब्ती प्रक्रिया में अनियमितता और पुलिस कार्रवाई पर अविश्वास।
कोर्ट ने कहा कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
अमेरिका का उदाहरण भी दिया
हाईकोर्ट ने कहा कि अमेरिका जैसे देशों में बॉडी-वॉर्न कैमरा पुलिसिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
हालांकि भारत में अभी तक इसे व्यापक रूप से लागू नहीं किया गया है, लेकिन BNSS की धारा 105 इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।
कोर्ट ने कहा कि बॉडी कैमरा प्रणाली संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्षता, गरिमा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
बॉडी-वॉर्न कैमरा क्या होता है?
बॉडी-वॉर्न कैमरा वह छोटा कैमरा होता है, जिसे पुलिस अधिकारी अपने यूनिफॉर्म पर लगाते हैं। यह कैमरा पुलिस कार्रवाई के दौरान हर गतिविधि को रिकॉर्ड करता है।
अमेरिका, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में पुलिसिंग के दौरान बॉडी कैमरा उपयोग अब सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। इसका उद्देश्य पुलिस और आम जनता दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा विवाद की स्थिति में वास्तविक घटनाक्रम सामने लाना होता है।
भारत में अब तक इसका उपयोग सीमित स्तर पर हो रहा था, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले ने इसे गंभीर अपराधों में आवश्यक सुरक्षा उपाय के रूप में देखा है।
NDPS मामलों में विशेष महत्व
NDPS एक्ट के मामलों में तलाशी और बरामदगी ही अभियोजन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती है। ऐसे मामलों में छोटी प्रक्रिया संबंधी त्रुटियां भी पूरे केस को प्रभावित कर सकती हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि NDPS एक्ट की धारा 51 के अनुसार, जहां विशेष कानून में विरोधाभास नहीं है, वहां सामान्य आपराधिक प्रक्रिया लागू होगी। इसलिए अब NDPS मामलों में भी BNSS की धारा 105 के अनुसार वीडियो रिकॉर्डिंग आवश्यक होगी।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि देशभर में NDPS मामलों में अक्सर फर्जी फंसाने और अवैध बरामदगी के आरोप लगते रहे हैं।
कोर्ट ने दिए री-इन्वेस्टिगेशन के आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला केवल “फर्दर इन्वेस्टिगेशन” का नहीं, बल्कि “री-इन्वेस्टिगेशन” का है।
अदालत ने कहा कि जब पूरी FIR की कहानी ही संदेह के घेरे में हो, तब केवल अतिरिक्त जांच पर्याप्त नहीं होती, बल्कि शुरू से नई जांच आवश्यक हो जाती है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि जांच नए अधिकारी को सौंपी जाए, जो अधिकारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से नीचे रैंक का न हो।
कोर्ट ने कहा कि पहले की जांच से उसका कोई संबंध न हो।
इन बिंदुओं पर दोबारा होगी जांच
हाईकोर्ट ने यह भी तय किया कि किन बिंदुओं की दोबारा जांच होगी।
घटना का वास्तविक समय और स्थान — क्या घटना वास्तव में उसी समय और स्थान पर हुई, जैसा FIR में लिखा गया?
आरोपी की मोबाइल लोकेशन — मोबाइल डेटा और टॉवर लोकेशन की जांच होगी।
पुलिस अधिकारियों की भूमिका — कार्रवाई में शामिल अधिकारियों की भूमिका और व्यवहार की जांच होगी।
तलाशी और जब्ती की वैधता — क्या पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार हुई?
वीडियो और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य — प्रस्तुत वीडियो की सत्यता और प्रामाणिकता की जांच होगी।
आरोपी को मिली अंतरिम राहत
कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी लगभग 165 दिनों से जेल में है और दोबारा जांच में समय लग सकता है।
अदालत ने कहा कि निष्पक्ष जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने आरोपी याचिकाकर्ता को चार महीने के अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया हैं.
इसके लिए अदालत ने ₹1 लाख के निजी मुचलके और ₹50-50 हजार की दो जमानतों की शर्त रखी।