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हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह करने वालों को कानून के संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता-राजस्थान हाईकोर्ट, मीणा समुदाय के दंपती को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मिला तलाक

Rajasthan High Court Grants Divorce to Meena Couple Under Hindu Marriage Act, Waives 6-Month Cooling-Off Period

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने मीणा अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित एक दंपती के वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनकी शादी को आपसी सहमति से हिंदू विवाह अधिनियम के तहत समाप्त करने की डिक्री पारित की है।

इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए ने स्पष्ट किया कि

यदि अनुसूचित जनजाति से संबंधित पक्षकार हिंदू धर्म, रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं तथा उनका विवाह हिंदू विधियों के अनुसार संपन्न हुआ है, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह विच्छेद की राहत देने से केवल अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों में आपसी सहमति से तलाक के लिए निर्धारित छह महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ किया जाना उचित है।

कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष पांच वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे थे, उनके बीच सुलह की कोई संभावना नहीं थी और तलाक को लेकर दोनों की सहमति थी।

यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने लक्ष्मी मीणा और बहादुर सिंह मीणा की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट, कोटा के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें दंपती के तलाक संबंधी दीवानी वाद को खारिज कर दिया गया था।

केवल समुदाय की पहचान निर्णायक नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के जरिए स्पष्ट किया हैं कि अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के वैवाहिक मामलों में हिंदू विवाह अधिनियम की प्रयोज्यता निर्धारित करते समय केवल समुदाय की पहचान निर्णायक नहीं होगी।

संबंधित पक्षकारों द्वारा अपनाए गए धर्म, विवाह की विधि, रीति-रिवाजों और मामले के साक्ष्यों पर भी विचार करना आवश्यक है।

साथ ही यह भी कि जब दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हों, सुलह की कोई संभावना न हो और वैवाहिक विवाद आपसी सहमति से समाप्त करने पर दोनों सहमत हों, तो कानून के अंतर्गत उपलब्ध राहत परिस्थितियों के अनुसार प्रदान की जा सकती है।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता लक्ष्मी मीणा और बहादुर सिंह मीणा का विवाह 12 जून 2017 को हुआ था।

दोनों मीणा समुदाय से संबंधित हैं। विवाह के बाद करीब तीन वर्ष के वैवाहिक जीवन के दौरान उनके बीच गंभीर वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो गए, जो समय के साथ बढ़ते गए।

इसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच वैवाहिक संबंधों में विवाद और अलगाव की स्थिति पैदा हो गई।

वैवाहिक संबंधों को सामान्य करने की संभावना समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने का निर्णय लिया।

इस संबंध में 15 सितंबर 2024 को दोनों के बीच एक लिखित समझौता किया गया। इसके आधार पर 22 सितंबर 2024 को हाड़ौती आदिवासी मीणा सामाजिक सुधार संघ की ओर से विवाह विच्छेद का प्रमाणपत्र भी जारी किया गया।

इसके बाद लक्ष्मी मीणा ने 1 अक्टूबर 2024 को फैमिली कोर्ट संख्या-1, कोटा में सिविल वाद दायर कर आपसी सहमति के आधार पर विवाह समाप्त करने की डिक्री मांगी।

बहादुर सिंह मीणा ने भी इस मांग का विरोध नहीं किया और बाद में वह कोर्ट में अनुपस्थित रहने के कारण एकपक्षीय कार्यवाही के दायरे में आ गए।

हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 3 सितंबर 2025 को वाद खारिज कर दिया।

कोर्ट का मुख्य आधार यह था कि पक्षकारों ने मीणा समुदाय में प्रचलित रीति-रिवाजों और परंपराओं के संबंध में आवश्यक अभिवचन नहीं किए थे और यह भी स्थापित नहीं किया गया था कि उनका विवाह-विच्छेद समुदाय की प्रथाओं के अनुसार हुआ है।

फैमिली कोर्ट के इस निर्णय को चुनौती देते हुए लक्ष्मी मीणा ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की क्या दलील थी?

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने संयुक्त रूप से दलील दी कि भले ही पक्षकार अनुसूचित जनजाति के सदस्य हैं, लेकिन वे हिंदू धर्म का पालन करते हैं और उनका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था।

अधिवक्ताओं के अनुसार, विवाह के दौरान पवित्र अग्नि के समक्ष सप्तपदी सहित हिंदू विवाह की अन्य परंपराओं का पालन किया गया था।

दोनों पक्षों ने विवाह के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की प्रक्रिया को स्वीकार किया था। ऐसे में उनके मामले में अधिनियम की धारा 13-B के तहत आपसी सहमति से तलाक की डिक्री पारित की जा सकती है।

दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि पहले से दायर दीवानी वाद को आपसी सहमति से तलाक की संयुक्त याचिका के रूप में स्वीकार कर विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित की जाए।

अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने को लेकर क्या कहा?

मामले का प्रमुख कानूनी प्रश्न हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(2) की व्याख्या से जुड़ा था।

इस प्रावधान के अनुसार, सामान्यतः अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर तब तक लागू नहीं होता, जब तक केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचना जारी कर अन्यथा निर्देश न दे।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का उद्देश्य मान्यता प्राप्त जनजातियों की प्रथागत परंपराओं और रीति-रिवाजों की रक्षा करना है।

इसे ऐसे पक्षकारों को कानून के संरक्षण से वंचित करने के लिए नहीं पढ़ा जा सकता, जो स्वेच्छा से हिंदू धर्म, परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं तथा अपने वैवाहिक संबंधों के लिए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत राहत चाहते हैं।

खंडपीठ ने कहा कि जब पक्षकार स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे विवाह के लिए हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं, तो केवल उनके अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित होने के कारण उन्हें प्रथागत व्यवस्था के अंतर्गत जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Labishwar Manjhi v. Pran Manjhi, (2000) 8 SCC 587 के फैसले का उल्लेख किया।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के संदर्भ में माना था कि

यदि किसी जनजाति से संबंधित पक्षकार हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और संबंधित जनजाति की परंपराओं के बजाय हिंदू परंपराओं के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं, तो केवल उनकी जनजातीय पृष्ठभूमि के आधार पर उन्हें संबंधित अधिनियम के लाभ से बाहर नहीं रखा जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को वर्तमान मामले में प्रासंगिक माना और कहा कि अनुसूचित जनजातियों के प्रथागत अधिकारों की रक्षा करने वाले प्रावधान को कानून के लाभ से पूर्ण बहिष्कार के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला

खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के Satprakash Meena v. Alka Meena, 2021 SCC OnLine Del 3645 के निर्णय पर भी भरोसा किया।

उस मामले में भी मीणा समुदाय से संबंधित दंपती के विवाह-विच्छेद का प्रश्न हिंदू विवाह अधिनियम के संदर्भ में सामने आया था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के अनुसार विवाह संपन्न होने सहित संबंधित परिस्थितियों पर विचार करते हुए माना था कि यदि जनजाति के सदस्य स्वेच्छा से हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Chittapuli v. Union Government, 2021 SCC OnLine AP 1039 के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें संबंधित कानूनी प्रावधान को जनजातीय परंपराओं की सुरक्षा के उपाय के रूप में समझाया गया था।

हाईकोर्ट ने किन तथ्यों को माना महत्वपूर्ण?

खंडपीठ ने पक्षकारों के अभिवचनों, साक्ष्यों, लक्ष्मी मीणा के बयान और बहादुर सिंह मीणा के शपथपत्र पर विचार करने के बाद कई महत्वपूर्ण तथ्य दर्ज किए।

हाईकोर्ट के अनुसार:

दोनों पक्षों का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था और विवाह में सप्तपदी की रस्म निभाई गई थी।

दोनों पक्ष हिंदू धर्म, रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते थे।

उनके वैवाहिक संबंध से कोई संतान नहीं हुई थी।

दोनों पक्ष वर्ष 2021 से अलग रह रहे थे और इस अवधि में उनके बीच सहवास नहीं हुआ था।

दोनों पक्ष बिना किसी मिलीभगत के आपसी सहमति से विवाह समाप्त करना चाहते थे।

दोनों के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं बची थी।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ध्यान दिया कि किसी भी पक्ष ने यह नहीं कहा कि विवाह के लिए उन्होंने हिंदू परंपराओं से अलग किसी अन्य रीति या प्रथा का पालन किया था।

छह महीने की प्रतीक्षा अवधि क्यों की गई माफ?

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-B के तहत आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही में सामान्यतः छह महीने की प्रतीक्षा अवधि का प्रावधान है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने Amardeep Singh v. Harveen Kaur, (2017) 8 SCC 746 में स्पष्ट किया था कि यह अवधि अनिवार्य नहीं, बल्कि निर्देशात्मक प्रकृति की है और उपयुक्त परिस्थितियों में इसे माफ किया जा सकता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए पाया कि दोनों पक्ष पांच वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे थे, वैवाहिक संबंध बहाल होने की संभावना नहीं थी और दोनों की तलाक के लिए सहमति थी।

खंडपीठ ने माना कि धारा 13-B की उपधारा (1) और (2) की आवश्यक शर्तें इस मामले में पूरी थीं। इसलिए छह महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ करना उचित था।

स्थायी भरण-पोषण और अन्य मुकदमों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने यह भी बताया कि वर्तमान कार्यवाही के अतिरिक्त उनके बीच कोई अन्य दीवानी या आपराधिक मुकदमा लंबित नहीं है।

स्थायी भरण-पोषण का मुद्दा भी अंतिम रूप से सुलझा लिया गया था और दोनों पक्षों के बीच कोई बकाया शेष नहीं था। हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को भी रिकॉर्ड पर लिया।

हाईकोर्ट ने अंततः क्या आदेश दिया?

सभी तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट, कोटा के 3 सितंबर 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने 12 जून 2017 को संपन्न विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-B के तहत आपसी सहमति से समाप्त करने की डिक्री पारित की।

इसके साथ ही अपील स्वीकार कर ली गई और रजिस्ट्री को तदनुसार डिक्री तैयार करने का आदेश दिया गया।

मामले में अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुधीर यादव, मंगल सिंह सैनी और राजेश कुमार यादव तथा प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता अविनाश फेनिन उपस्थित हुए।

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