टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

हत्या का स्पष्ट इरादा नहीं होने पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हत्या की सजा में बदलाव, भुगती हुई सजा पर रिहाई

No Clear Intent to Kill: Rajasthan High Court Converts Life Imprisonment to Time Served

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने हत्या के मामले में दायर एक आपराधिक अपील का निस्तारण करते हुए दोषी को बड़ी राहत प्रदान दी हैं.

राजस्थान हाईकोर्ट ने घटना में हत्या का कोई पूर्वनियोजित या स्पष्ट इरादा सिद्ध नहीं होने के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को संशोधित करते हुए भुगती गई करीब 12 साल की सजा के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।

जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की खंडपीठ ने यह फैसला हरिसिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

पिता पुत्र पर किया था हमला

मामले के अनुसार 30 जून 2015 की शाम करौली जिले के थाना मासलपुर क्षेत्र में बाबूलाल अपने 12 वर्षीय पुत्र राजवीर के साथ गांव गोठरा से एक कार्यक्रम में शामिल होकर लौट रहे थे।

सी दौरान रास्ते में आरोपी हरि सिंह द्वारा कथित रूप से लाठी से हमला किया गया। सिर पर आई गंभीर चोट के कारण बाबूलाल की मृत्यु हो गई, जबकि पुत्र राजवीर घायल हो गया।

घटना के अगले दिन 1 जुलाई 2015 को मृतक के भतीजे सीताराम द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर पुलिस ने हत्या और मारपीट की धाराओं में मामला दर्ज किया।

जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया गया.

ट्रायल के बाद सत्र न्यायालय, करौली ने 3 फरवरी 2018 को मामले में आईपीसी की धारा 302 (हत्या) के तहत आजीवन कारावास तथा धारा 323 के तहत एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।

बचाव पक्ष की दलील

मामले में दोषी की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट में दायर अपील में कहा गया कि घटना अचानक हुई थी और इसमें हत्या का कोई स्पष्ट इरादा नहीं था।

बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी और मृतक के बीच कोई पुरानी रंजिश नहीं थी और न ही कोई पूर्व नियोजन इरादा.

अधिवक्ता ने कहा कि घटना रात के समय की है, जब ग्रामीण आमतौर पर लाठी साथ लेकर चलते हैं।

यह भी तर्क दिया गया कि सिर पर केवल एक ही वार किया गया, किसी प्रकार की क्रूरता या बार-बार वार नहीं हुआ। ऐसे में यह मामला हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 भाग-I IPC) का बनता है।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया और ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी गवाह की गवाही भरोसेमंद है और चिकित्सकीय साक्ष्य उससे मेल खाते हैं, इसलिए सजा में किसी तरह की नरमी नहीं की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और साक्ष्यों पर सभी पक्षो की बहस सुनने के बाद कहा कि कि अभियोजन हत्या का स्पष्ट इरादा साबित करने में असफल रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर पूरी तरह संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि घटना अचानक हुई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी और मृतक के बीच कोई पूर्व शत्रुता नहीं थी और घटना के पीछे कोई ठोस मोटिव सामने नहीं आया.

अदातल ने यह भी कहा कि मृतक घटना के समय नशे की हालत में था और सिर पर एक ही वार हुआ, वार की पुनरावृत्ति नहीं हुई.

कोर्ट ने यह भी कहा कि दोषी द्वारा जानबूझकर अत्यधिक घातक हमला करने के सबूत नही हैं.

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही इस मामले को को आईपीसी की धारा 302 IPC के बजाय धारा 304 भाग-I IPC के मानते हुए सजा में संशोधन करने का आदेश दिया.

सजा में किया गया संशोधन

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई हत्या की सजा को संशोधित करते हुए गैर-इरादतन हत्या की सजा में बदल दिया।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही दोषी द्वारा करीब 12 वर्ष 10 माह की अवधि (रिमिशन सहित) जेल में भुगती गई सजा को अपराध के लिए पर्याप्त मानते हुए रिहा करने का आदेश दिया.

सबसे अधिक लोकप्रिय