जोधपुर। राजस्थान में वर्षों से चली आ रही खाप पंचायतों की मनमानी, सामाजिक बहिष्कार (हुक्का-पानी बंद), भारी-भरकम जुर्माने और सामाजिक उत्पीड़न की प्रथाओं पर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सख्त प्रहार किया है।
राजस्थान में खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्यभर में सक्रिय तथाकथित खाप या जाति पंचायतों की मनमानी के फैसलों को असंवैधानिक बताया है।
जस्टिस फरजन्द अली की एकलपीठ ने शुक्रवार को रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दर्जनों याचिकाओं का निस्तारण करते हुए महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा कि किसी भी गैर-कानूनी सामुदायिक संस्था को नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने का कोई अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि “कानून से ऊपर कोई नहीं है।”
“यह समानांतर न्याय व्यवस्था अस्वीकार्य”
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि इस प्रकार की जाति पंचायतें किसी भी प्रकार से वैधानिक नहीं हैं और इनका कार्य संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा:
“ऐसी संस्थाएं स्वयं को न्यायिक प्राधिकरण के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं, जबकि इनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यह कानून के शासन को कमजोर करता है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।”
कोर्ट ने यह भी माना कि इन पंचायतों के फैसले अक्सर बिना किसी सुनवाई के सुनाए जाते हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।
“हुक्का-पानी बंद”, मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से “हुक्का-पानी बंद” जैसी प्रथा को खतरनाक बताते हुए इसे सामाजिक उत्पीड़न का सबसे क्रूर रूप बताया।
कोर्ट ने कहा:
यह केवल सामाजिक बहिष्कार नहीं, बल्कि व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन पर हमला है। इससे व्यक्ति की गरिमा (dignity) और जीवन जीने के अधिकार का हनन होता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का सीधा उल्लंघन है।
“किसी व्यक्ति को समाज से काट देना, उसके साथ लेन-देन बंद करना और उसे अलग-थलग करना, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर सीधा हमला है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल सामाजिक अलगाव नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन को गहराई से प्रभावित करता है।
ऐसे मामलों में पीड़ितों को न केवल सामाजिक कार्यक्रमों से बाहर कर दिया जाता है, बल्कि उनके साथ लेन-देन, व्यापार, यहां तक कि रोजमर्रा के संपर्क भी बंद कर दिए जाते हैं।
जबरन वसूली और आर्थिक शोषण
फैसले में यह भी सामने आया कि कई मामलों में पंचायतें भारी-भरकम जुर्माना लगाकर लोगों से पैसे वसूलती हैं। इन पैसों का कोई वैधानिक आधार नहीं होता, बल्कि यह पूरी तरह से दबाव और डर के माहौल में लिया जाता है।
एक मामले में तो पीड़ित को अपनी पत्नी के निधन के बाद महंगे धार्मिक कार्यक्रम करने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें उसे करीब ₹3.5 लाख खर्च करने पड़े। इसके बाद भी उससे ₹5 लाख की अतिरिक्त मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—जिनमें शक्ति वाहिनी केस (ऑनर किलिंग और खाप पंचायतों पर रोक), कौशल किशोर केस (मौलिक अधिकारों की सुरक्षा) और बीरभूम मामला (सामाजिक बहिष्कार और सामूहिक दंड)—का हवाला देते हुए कहा कि:
“राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों को ऐसे निजी अत्याचारों से बचाए।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह करना या न करना — व्यक्तिगत अधिकार, जीवनशैली चुनना — व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संबंध रखना — निजी निर्णय है।
किसी भी व्यक्ति को इन फैसलों के लिए दंडित करना पूरी तरह असंवैधानिक है।
क्या है मामला
यह फैसला राज्य के विभिन्न जिलों—सिरोही, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, जालौर और ब्यावर—से जुड़े एक दर्जन से अधिक मामलों की सुनवाई के बाद दिया गया है, जिनमें समान प्रकृति के खाप पंचायतों के फैसलों के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए थे।
इन मामलों में मुख्य रूप से सामाजिक बहिष्कार (हुक्का-पानी बंद), जबरन आर्थिक दंड, धमकी, मानसिक उत्पीड़न और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।
एकलपीठ ने अपने फैसले में न केवल खाप पंचायतों के फैसलों को खारिज किया, बल्कि राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को सख्त आदेश जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया कि अब इस तरह की प्रथाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट द्वारा गठित आयोग की रिपोर्ट ने खोली पोल
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पांच सदस्यीय आयोग का गठन किया था, जिसमें चार अधिवक्ता—रामावतार सिंह चौधरी, भागीरथ राय बिश्नोई, शोभा प्रभाकर, देवकीनंदन व्यास—और एक सामाजिक कार्यकर्ता महावीर कांकरिया शामिल थे।
इस आयोग ने पाली, बांसवाड़ा, जालोर, जोधपुर और जैसलमेर जिलों का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि “हुक्का-पानी बंद” एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जिससे व्यक्ति को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ा जा सके।
हाईकोर्ट का फैसला और आदेश
जस्टिस फरजन्द अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में खाप पंचायतों से जुड़े मामलों में जांच, एफआईआर दर्ज करने से लेकर जागरूकता अभियान को लेकर आदेश जारी किए हैं।
हाईकोर्ट ने खाप पंचायतों से जुड़े मामलों की जांच 90 दिन में पूरी करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने राज्य के डीजीपी को आदेश दिया है कि इस तरह के मामलों की जांच अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी करेंगे।
हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों की मॉनिटरिंग के लिए राज्य के हर जिले में नोडल अधिकारी नियुक्त करने के आदेश दिए हैं, जिसकी नियुक्ति संबंधित जिला कलेक्टर और एसपी के समन्वय से की जाएगी।
हाईकोर्ट ने राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार करने और उसकी SOP (Standard Operating Procedure) जारी करने का आदेश दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में किसी भी प्रकार के सामाजिक बहिष्कार, जबरन वसूली या धमकी के मामलों में तुरंत FIR दर्ज कर सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने सरकार को समाज में जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाने को कहा है, ताकि लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग हों।
हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिकाओं में जिन लोगों को खतरा है, उन्हें तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान करने के आदेश दिए गए हैं।
महाराष्ट्र की तर्ज पर कानून बनाने के आदेश
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि राजस्थान में अभी सामाजिक बहिष्कार रोकने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है।
इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह महाराष्ट्र के “सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम, 2016” की तर्ज पर कानून बनाए।
‘नाता प्रथा’ पर चिंता
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘नाता प्रथा’ को लेकर भी चिंता जताई।
कोर्ट ने कहा:
यह कई बार महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है। महिलाओं को “वस्तु” की तरह देखने की मानसिकता को बढ़ावा देती है।
इस पर भी कानून और सामाजिक स्तर पर गंभीर विचार की जरूरत बताई गई।