जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के सेशन कोर्ट परिसर में चिकित्सा सुविधाओं की कमी को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को तत्काल आवश्यक मेडिकल स्टाफ और एंबुलेंस उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य का अधिकार और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार हैं और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराए।
राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन, जोधपुर के महासचिव विजय चौधरी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने यह आदेश दिया.
60 अदालतें, रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही
महासचिव विजय चौधरी की ओर से अधिवक्ता निशांत बोरा ने पैरवी करते हुए कहा कि सेशन कोर्ट परिसर में करीब 60 न्यायालय संचालित हैं।
यहां 600 से अधिक कोर्ट स्टाफ, करीब 1500 से 2000 अधिवक्ता तथा लगभग 3000 से अधिक litigants और उनके परिजन नियमित रूप से आते हैं।
इसके बावजूद परिसर में पर्याप्त मेडिकल स्टाफ, आवश्यक दवाइयां, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
पहले चलती थी जनता क्लिनिक, अब पर्याप्त स्टाफ नहीं
याचिकाकर्ता एसोसिएशन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि 7 दिसंबर 2019 को राजस्थान हाईकोर्ट के नए परिसर में स्थानांतरण से पहले, पुराने भवन परिसर में जनता क्लिनिक संचालित होती थी, जहां अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, वादकारियों और आमजन के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध थीं।
लेकिन हाईकोर्ट के नए परिसर में स्थानांतरण के बाद सेशन कोर्ट परिसर स्थित जनता क्लिनिक/सरकारी डिस्पेंसरी में पर्याप्त मेडिकल स्टाफ तैनात नहीं किया गया।
स्वीकृत 9 पदों में सिर्फ सीमित स्टाफ तैनात
याचिका में बताया गया कि स्वीकृत कैडर के अनुसार डिस्पेंसरी में कुल 9 मेडिकल/पैरा-मेडिकल स्टाफ की आवश्यकता है। इनमें एक मेडिकल ऑफिसर, दो ग्रेड-II नर्सिंग स्टाफ, एक फैमिली हेल्थ वर्कर, एक फार्मासिस्ट, एक लैब टेक्नीशियन, दो वार्ड बॉय और एक स्वीपर शामिल हैं।
हालांकि, आदेश के अनुसार वर्तमान में केवल एक फैमिली हेल्थ वर्कर और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात थे। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और वार्ड बॉय के अभाव में किसी भी मेडिकल इमरजेंसी से निपटना मुश्किल था।
हार्ट अटैक से वकील की मौत का भी जिक्र
याचिका में बताया गया कि वकील जीवन राम चौधरी की सेशन कोर्ट परिसर में अचानक हार्ट अटैक के कारण मृत्यु हो गई थी।
आदेश में कहा गया कि मेडिकल स्टाफ और CPR जैसी प्राथमिक उपचार सुविधाओं के अभाव की स्थिति सामने आई।
कोर्ट ने कहा-न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत होना जरूरी
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि मजबूत और स्थिर न्यायिक व्यवस्था के लिए सुदृढ़ इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है।
कोर्ट परिसर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि न्याय की उस व्यवस्था का आधार है जो न्याय के आदर्शों को वास्तविकता में बदलती है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के All India Judges Association v. Union of India और Brij Mohan Lal v. Union of India जैसे फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक इंफ्रास्ट्रक्चर, Rule of Law और Access to Justice आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
हाईकोर्ट ने इस स्थिति को “alarming” यानी चिंताजनक बताया और कहा कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार का दायित्व है कि रोजाना सेशन कोर्ट परिसर आने वाले अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, वादकारियों और आमजन को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता, वादकारी, न्यायिक अधिकारी और कोर्ट स्टाफ न्याय व्यवस्था के चार महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। ऐसे में कोर्ट परिसर में उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त मेडिकल व्यवस्था होना बेहद आवश्यक है।
मेडिकल यूनिट में क्या-क्या होना चाहिए?
हाईकोर्ट ने कहा कि सेशन कोर्ट परिसर की मेडिकल सुविधा में पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स होने चाहिए।
इसमें पर्याप्त व्हीलचेयर और स्ट्रेचर, आवश्यक जीवनरक्षक दवाओं से युक्त मेडिकल डिस्पेंसरी, ऑक्सीजन की सुविधा, ब्लड शुगर जांच की सुविधा, ब्लड प्रेशर मॉनिटर, ECG मॉनिटर, इमरजेंसी मेडिकल रिस्पॉन्स सिस्टम, ICU सुविधा से लैस कम से कम एक एंबुलेंस, मेडिकल यूनिट के लिए सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित इमरजेंसी कॉन्टैक्ट नंबर शामिल होने चाहिए।
सरकार को तत्काल 7 तरह के स्टाफ की तैनाती के निर्देश
हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश के रूप में Principal Secretary, Department of Medical & Health और Director, Department of Medical & Health को निर्देश दिया कि बिना किसी और देरी के तत्काल 1 मेडिकल ऑफिसर, 2 ग्रेड-II नर्सिंग स्टाफ, 1 फार्मासिस्ट, 1 लैब टेक्नीशियन, 2 वार्ड बॉय और 1 स्वीपर तैनात किए जाएं।
एंबुलेंस भी तत्काल उपलब्ध कराने का आदेश
कोर्ट ने इसके साथ ही सेशन कोर्ट परिसर में किसी भी मेडिकल इमरजेंसी से निपटने के लिए एक एंबुलेंस तत्काल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
यह एंबुलेंस अधिवक्ताओं, वादकारियों, आमजन, कोर्ट स्टाफ और न्यायिक अधिकारियों की आपात स्थिति में उपयोग के लिए होगी।
डीजे को नियमित मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने District and Sessions Judge, Jodhpur Metropolitan को निर्देश दिया है कि मेडिकल सुविधाओं की नियमित मॉनिटरिंग के लिए एक प्रभावी सिस्टम विकसित किया जाए।
यदि किसी भी स्तर पर कमी सामने आती है तो इसकी सूचना तत्काल संबंधित चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को देकर सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मामले में हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब तलब किया है। आगे के आदेश नोटिस की तामील के बाद पारित किए जाएंगे।
आदेश की प्रति संबंधित स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जोधपुर मेट्रोपॉलिटन को आवश्यक अनुपालन के लिए भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्याय देने वाले संस्थानों में काम करने वाले अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ-साथ न्याय की तलाश में आने वाले वादकारियों और आमजन के लिए बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आवश्यक संवैधानिक दायित्व हैं।