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थाने में हंगामे पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जारी किया प्रेसनोट, High court ने सोशल मीडिया से आरोपी की फोटो-वीडियो हटाने के दिए आदेश

Kota-based 18-year-old girl and 19-year-old boy received High Court protection after reporting serious threats from family members.

जयपुर, 1 दिसंबर

Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए राज्य सरकार और पुलिस को आदेश दिया है कि भरतपुर जिले के एक आपराधिक मामले में आरोपी की सोशल मीडिया और यूट्यूब पर प्रसारित की जा रही सभी तस्वीरों को तुरंत हटाया जाए.

Rajasthan Highcourt ने पुलिसकर्मी से मारपीट के मामले में आरोपी दिव्यांश उर्फ हनी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.

भरतपुर के नदबई पुलिस थाने में कुर्सियों को फेकने, पुलिसकर्मी को धक्का देकर भाग जाने पर पुलिस ने 29 वर्/िाय दिव्यांश को गिरफतार किया था.

पुलिस ने गिरफतारी के बाद ना केवल याचिकाकर्ता आरोपी को लेकर प्रेसनोट जारी किया बल्कि उससे जुड़ा फोटो वीडियो भी जारी किया.

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए मामले की स्पष्ट कहा कि जब तक मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक आरोपी की पहचान संबंधी कोई भी तस्वीर या वीडियो सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं रहना चाहिए।

केस डायरी और जांच रिपोर्ट तलब

हाईकोर्ट ने मामले में लोक अभियोजक (PP) को निर्देश दिए कि वह मामले की केस डायरी तथा अब तक की जांच की तथ्यात्मक रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर कोर्ट के समक्ष पेश करें.

थाने में पुलिसकर्मी को धक्का देना का आरोप

नदबई पुलिस थाने के पुलिसकर्मी द्वारा दर्ज कराए मुकदमें के अनुसार 20 सितंबर 2025 की रात लगभग 11.50 बजे याचिकाकर्ता आरोपी बाजार में किसी ​से विवाद कर रहा था.

जिस पर पुलिसकर्मी उसे पुलिस थाने लेकर आया.

मुकदमें के अनुसार पुलिस थाने में डयूटी आफिसर के नहीं होने पर याचिकाकर्ता दिव्यांस ने थाने में कुर्सिया फेकना शुरू कर दिया और पुलिसकर्मी को धमकाते हुए धक्का देकर थाने से भाग गया.

पुलिस ने इस मामले में बाद में दिव्यांस को गिरफतार कर प्रेसनोट जारी करते हुए फोटो भी जारी किया था.

एक प्रकार की सजा

राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता परमेश्वर पिलानिया पुलिस के बर्ताव को एक तरह की सजा मानते हैं. उनके अनुसार….

“पुलिस द्वारा आरोपी को पकड़ने के बाद महिलाओं के कपड़े पहनाकर और पैर पर पट्टी बांधकर लंगड़ाते हुए जुलूस या परेड करवाना, घुटनों के बल बैठाकर फोटो खींचना, फिर इसका फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि सहित अनेक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रचार-प्रसार करना अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रकार की सजा है. सजा कानून के अनुसार ही दी जानी चाहिए, न कि आवाम की भावनाओं से प्रभावित होकर। पुलिस द्वारा इस प्रकार की सजा या दंड देना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। सजा देना केवल न्यायालय का काम है; इस शक्ति का पुलिस द्वारा प्रयोग करना समाज के लिए गंभीर हो सकता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा पुलिस थानों में CCTV कैमरों को लेकर गंभीर रुख अपनाया गया है, जिससे इन मामलों में कुछ सुधार होने की उम्मीद है।”

परमेश्वर पिलानिया, एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट

परमेश्वर पिलानिया, एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट

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