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एक बार बेल बॉन्ड स्वीकार हो जाने के बाद पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी के पास उन्हें रद्द करने का अधिकार नहीं-राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court: Police Cannot Cancel Bail Bonds Once Accepted, Says Only Court Has Authority

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी आरोपी के बेल बॉन्ड एक बार स्वीकार कर लिए गए हैं, तो पुलिस या जांच एजेंसी उन्हें अपने स्तर पर रद्द नहीं कर सकती।

स्वीकार किए गए बेल बॉन्ड को रद्द करने का अधिकार केवल न्यायालय के पास है।

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला मानवेन्द्र सिंह राठौड़ उर्फ मोनू द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

याचिका में जोधपुर के बोरूंदा थाने में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई थी।

क्या है पूरा मामला

नागौर निवासी सत्यनारायण अग्रवाल ने 2 जनवरी 2023 को बोरूंदा थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई थी।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसका कृषि मंडी रोड स्थित गोदाम पिछले 40 वर्षों से उसके कब्जे में है और वह उसका उपयोग करता आ रहा है।

शिकायत में कहा गया कि 20 दिसंबर 2022 को मानवेन्द्र सिंह राठौड़ उर्फ मोनू, जीतू सिंह तथा 10-15 अन्य लोग गोदाम का ताला तोड़कर अंदर घुस गए, तोड़फोड़ की और गोदाम के बाहर “मधु सिंह” का नाम लिख दिया।

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जब वह 30 दिसंबर को गोदाम पहुंचा तो आरोपियों ने उसे धमकी दी कि वे जबरन गोदाम पर कब्जा कर लेंगे और जान से मारने की धमकी भी दी।

इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 447 और 427 के तहत मामला दर्ज किया।

याचिकाकर्ता ने लगाए गंभीर आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि एफआईआर झूठी और दुर्भावनापूर्ण है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता का कहना था कि विवादित गोदाम संख्या 23 का पट्टा याचिकाकर्ता के दादा के नाम पर है और वास्तव में शिकायतकर्ता ने ही उस पर अवैध कब्जा कर रखा है।

याचिकाकर्ता का दावा था कि उसे राजनीतिक और व्यक्तिगत कारणों से फंसाया गया।
 
सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह लगाया गया कि शुरुआत में केवल जमानती धाराएं लगाई गई थीं और पुलिस ने बेल बॉन्ड स्वीकार भी कर लिए थे, लेकिन बाद में मामले को गैर-जमानती बनाने के लिए बिजली अधिनियम की धारा 136 जोड़ दी गई।

याचिकाकर्ता ने कहा कि एफआईआर में कहीं भी बिजली मीटर चोरी या बिजली उपकरण से छेड़छाड़ का उल्लेख नहीं था।

याचिकाकर्ता के अनुसार शुरुआती जांच में भी बिजली अधिनियम की धारा 136 का कोई मामला नहीं पाया गया था।

बाद में बिजली विभाग के एक कर्मचारी का बयान लेकर इस धारा को जोड़ा गया, जिससे मामला गैर-जमानती बन गया और पुलिस ने पहले स्वीकार किए गए बेल बॉन्ड भी निरस्त कर दिए। इसके बाद आरोपी को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।

शिकायतकर्ता और सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से याचिका का विरोध किया गया।

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि आगे की जांच में बिजली अधिनियम की धारा 136 के तहत अपराध सामने आया, इसलिए उसे जोड़ा गया।

उनका कहना था कि विस्तृत जांच में आईपीसी की धारा 451, 427 और बिजली अधिनियम की धारा 136 का अपराध सिद्ध पाया गया।

कोर्ट ने माना-संपत्ति विवाद है असली जड़

हाईकोर्ट ने केस डायरी और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि प्रथमदृष्टया यह मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा हुआ है।

कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता लंबे समय से गोदाम के कब्जे में था, जबकि उसका पट्टा याचिकाकर्ता के दादा के नाम पर था।

इससे स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था।

धारा 136 जोड़ने पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि घटना के समय बिजली चोरी या बिजली उपकरण चोरी का कोई आरोप सामने नहीं आया था।

यहां तक कि बिजली विभाग ने भी इस संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं करवाई।
 
कोर्ट ने कहा कि शुरुआत में केवल जमानती धाराओं के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन बाद में बिजली अधिनियम की धारा 136 जोड़कर मामले को गैर-जमानती बना दिया गया।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जो धारा 136 जोड़ने को उचित ठहराता हो।

न्यायालय ने कहा कि मीटर रीडर की रिपोर्ट घटना के लगभग एक महीने बाद तैयार की गई थी, जो न तो तत्काल थी और न ही विश्वसनीय या पुष्ट।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि वास्तव में बिजली मीटर से छेड़छाड़ हुई होती तो बिजली विभाग तुरंत कार्रवाई करता।

कोर्ट ने बेहद कठोर शब्दों में कहा कि घटनाक्रम यह संकेत देता है कि धारा 136 को आरोपी की स्वतंत्रता सीमित करने के उद्देश्य से जोड़ा गया, न कि किसी वास्तविक साक्ष्य के आधार पर।

बेल बॉन्ड रद्द करने पर ऐतिहासिक टिप्पणी

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सबसे अहम कानूनी बिंदू पुलिस के अधिकार क्षेत्र को लेकर  स्पष्ट टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि क्या एक बार बेल बॉन्ड स्वीकार हो जाने के बाद पुलिस अपने स्तर पर उसे रद्द कर सकती हैं.

इस कानूनी बिंदू को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक बार बेल बॉन्ड स्वीकार हो जाने के बाद पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी के पास उन्हें रद्द करने का अधिकार नहीं रहता।

यह पूरी तरह न्यायिक अधिकार है और केवल अदालत ही ऐसा कर सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान यदि गंभीर या गैर-जमानती धाराएं जुड़ भी जाती हैं, तब भी पुलिस स्वतः बेल रद्द नहीं कर सकती।

यदि जांच एजेंसी को लगता है कि आरोपी को जमानत पर बने रहने का अधिकार नहीं है, तो उसे सक्षम अदालत में जाकर जमानत निरस्तीकरण की अर्जी दायर करनी होगी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच एजेंसी को स्वतः बेल रद्द करने की शक्ति दे दी जाए, तो यह न्यायिक शक्तियों को पुलिस को सौंपने जैसा होगा, जो कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
एफआईआर पूरी तरह रद्द नहीं की

हालांकि हाईकोर्ट ने बिजली अधिनियम की धारा 136 को लेकर गंभीर सवाल उठाए, लेकिन अदालत ने एफआईआर पूरी तरह रद्द करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत संज्ञेय अपराध का प्रथमदृष्टया मामला बनता है और इस स्तर पर जांच में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध “भजनलाल केस” का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला उन श्रेणियों में नहीं आता, जहां शुरुआती स्तर पर एफआईआर को निरस्त किया जा सके। इसलिए बिजली अधिनियम की धारा 136 को छोड़कर अन्य धाराओं में जांच जारी रहेगी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि जांच एजेंसी को बेल बॉन्ड रद्द करने का अधिकार नहीं है, इसलिए याचिकाकर्ता द्वारा पहले जमा किए गए बेल बॉन्ड प्रभावी बने रहेंगे। अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए संबंधित आवेदन भी निस्तारित कर दिए।

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