जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि पति या पत्नी बिना किसी शारीरिक अक्षमता या वैध कारण के लंबे समय तक वैवाहिक संबंध स्थापित करने से एकतरफा इनकार करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि जीवन समाप्त करने की धमकी देना भी मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए अपने फैसले में जेसलमेर फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिक्री को बरकरार रखते हुए पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं।
2018 में हुई थी शादी, कुछ ही दिनों बाद अलग रहने लगे
जैसलमेर निवासी याचिकाकर्ता महिला और उसके पति का विवाह 11 अक्टूबर 2018 को हुआ था।
विवाह के समय पत्नी जेसलमेर नगर परिषद में कनिष्ठ लेखाकार के पद पर कार्यरत थीं और पति बालोतरा में कुल्फी बनाने का व्यवसाय करते थे।
विवाह के बाद पत्नी करीब 10 दिन बालोतरा में पति के साथ रहीं और इसके बाद अपनी नौकरी के कारण जेसलमेर चली गईं। पति भी करीब 15-20 दिन जेसलमेर में उनके साथ रहे।
पति का आरोप था कि इसके बाद दोनों के बीच वैवाहिक संबंध नहीं रहे और पत्नी ने शारीरिक संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं दी।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने आत्महत्या करने की धमकी दी तथा उसके साथ मानसिक और शारीरिक क्रूरता की। इसके बाद पति बालोतरा लौट गया।
रिकॉर्ड के अनुसार 25 अक्टूबर 2018 के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध नहीं हुए और दोनों अलग-अलग रह रहे थे।
पत्नी ने लगाए पति पर पैसे मांगने और परेशान करने के आरोप
पत्नी ने पति के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पति छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ा करता था और भावनात्मक दबाव बनाकर उसके वेतन से पैसे मांगता था।
पत्नी के अनुसार, कई बार उसने पति को पैसे दिए, लेकिन उसकी मांग बढ़ती गई। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति उसे नौकरी छोड़कर बालोतरा आने या अपनी आधी तनख्वाह देने के लिए दबाव डालता था।
पत्नी ने अदालत में यह भी कहा कि वह पति के साथ रहने के लिए तैयार थी, लेकिन पति ने उसे अपने साथ रहने की अनुमति नहीं दी। इसी आधार पर उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग की थी।
फैमिली कोर्ट ने पति को दिया था तलाक
फैमिली कोर्ट, जेसलमेर ने दोनों पक्षों के साक्ष्य और दलीलों पर विचार करने के बाद 20 फरवरी 2024 को पति की हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत दायर याचिका स्वीकार कर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की थी।
वहीं पत्नी की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की याचिका खारिज कर दी गई थी।
इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में दो अलग-अलग अपीलें दायर की थीं, जिन्हें हाईकोर्ट ने एक साथ सुनवाई के लिए जोड़ दिया।
हाईकोर्ट ने पहले मानसिक क्रूरता की कानूनी कसौटी समझाई
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) में क्रूरता तलाक का आधार है, हालांकि कानून में क्रूरता की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी गई है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Samar Ghosh बनाम Jaya Ghosh फैसले का विस्तृत संदर्भ लेते हुए मानसिक क्रूरता के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा।
कोर्ट ने विशेष रूप से उस सिद्धांत पर ध्यान दिया जिसके अनुसार केवल सामान्य वैवाहिक मतभेद, छोटी-मोटी तकरार, रोजमर्रा के वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य परेशानियां अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं बनतीं।
मानसिक क्रूरता का आकलन पूरे वैवाहिक जीवन और परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए किया जाना चाहिए।
लंबे समय तक शारीरिक संबंध से इनकार मानसिक क्रूरता हो सकता है
हाईकोर्ट ने Samar Ghosh मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि बिना शारीरिक अक्षमता या वैध कारण के लंबे समय तक शारीरिक संबंध से एकतरफा इनकार मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि लंबे समय तक लगातार अलगाव की स्थिति में वैवाहिक संबंध केवल कानूनी बंधन बनकर रह सकता है।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया सोनल तलपाडा फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि उचित कारण के बिना लगातार वैवाहिक संबंध से इनकार मानसिक क्रूरता हो सकता है और धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक का वैध आधार बन सकता है।
पत्नी के अपने बयान ने भी मामले में अहम भूमिका निभाई
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण किया।
कोर्ट ने पाया कि पति ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा था कि 25 अक्टूबर 2018 के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध नहीं हुए।
पत्नी की ओर से भी इस बात का स्पष्ट खंडन नहीं किया गया कि इसके बाद वैवाहिक संबंध स्थापित हुए थे।
अदालत ने यह भी देखा कि पति के बयान के दौरान उससे ऐसा कोई प्रभावी सुझाव नहीं किया गया कि 25 अक्टूबर 2018 के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने थे अथवा पत्नी ने कभी शारीरिक संबंध से इनकार नहीं किया था।
पत्नी ने कहा-बड़े मुद्दे पर झगड़ा नहीं हुआ, छोटी बातों पर विवाद हुआ
हाईकोर्ट ने पत्नी के बयान का भी उल्लेख किया। पत्नी ने जिरह में कहा कि विवाह के बाद दोनों के बीच किसी बड़े मुद्दे को लेकर झगड़ा नहीं हुआ, बल्कि छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद होते थे।
पत्नी ने यह भी स्वीकार किया कि वह वर्ष 2016 से जेसलमेर में नौकरी कर रही थी और नौकरी में आने के बाद से अपनी बहन के साथ जेसलमेर में रह रही थी। सबसे महत्वपूर्ण रूप से उसने कहा कि वह गजेंद्र के साथ रहना चाहती है, लेकिन बालोतरा जाकर उसके साथ नहीं रहना चाहती।
आत्महत्या की धमकी और पत्र को भी कोर्ट ने माना महत्वपूर्ण
फैसले में कोर्ट ने उस पत्र का भी उल्लेख किया जिसे रिकॉर्ड के रूप में पेश किया गया था।
हाईकोर्ट के अनुसार पत्र से यह साबित हुआ कि पत्नी की ओर से पति को आत्महत्या की धमकी दी गई थी।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी को इस पत्र की जानकारी थी और वह तलाक की याचिका दायर होने से पहले से इसके बारे में जानती थी, लेकिन उसने इस संबंध में पुलिस या अदालत के समक्ष कोई कार्रवाई नहीं की।
दोनों परिस्थितियां मानसिक क्रूरता
खंडपीठ ने उपलब्ध साक्ष्य और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि मामले में पति-पत्नी के बीच 25 अक्टूबर 2018 से शारीरिक संबंध नहीं थे, दोनों के बीच किसी शारीरिक अक्षमता का मामला सामने नहीं आया और पत्नी द्वारा वैवाहिक संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं देने की बात pleadings और evidence से स्पष्ट होती है।
कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि बिना शारीरिक अक्षमता या वैध कारण के लंबे समय तक एकतरफा रूप से शारीरिक संबंध से इनकार Samar Ghosh में निर्धारित मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। साथ ही, आत्महत्या की धमकी को भी अदालत ने मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना।
तलाक की डिक्री में हस्तक्षेप से हाईकोर्ट ने किया इनकार
खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर दिया गया तलाक का फैसला साक्ष्य और कानून पर आधारित है और इसमें हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
इसलिए पति के पक्ष में दी गई तलाक की डिक्री के खिलाफ अपील खारिज की जाती है।
कोर्ट ने आगे कहा कि जब तलाक की डिक्री के खिलाफ पत्नी की अपील ही खारिज हो रही है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग पर विचार करना भी कानूनन संभव नहीं है। इसलिए धारा 9 वाली अपील भी खारिज कर दी गई।
दोनों अपीलें खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को बरकरार रखते हुए दोनों अपीलें खारिज कर दीं।