20 थानों में पायलट प्रोजेक्ट का प्रस्ताव, 935 नए पद और आधुनिक जांच लैब स्थापित करने की सिफारिश
जयपुर। राजस्थान में पुलिस व्यवस्था को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है।
अपराधों की धीमी जांच, बढ़ते लंबित मामलों और कम दोषसिद्धि दर पर गंभीर चिंता जताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच शाखा (Investigation Wing) और कानून-व्यवस्था शाखा (Law & Order Wing) को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
इसके साथ ही पुलिस थानों में तीसरी प्रशासनिक शाखा (Administrative Wing) बनाने का भी प्रस्ताव सामने आया है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की अदालत में हुई सुनवाई के दौरान राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने एक विस्तृत कार्ययोजना पेश की, जिसमें राज्य के 20 पुलिस थानों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर तीन अलग-अलग इकाइयां स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इनमें जांच यूनिट, कानून-व्यवस्था यूनिट और प्रशासनिक यूनिट शामिल होंगी।
चौंकाने वाले आंकड़े आए सामने
पुलिस मुख्यालय द्वारा अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया कि राजस्थान में महिलाओं के खिलाफ अपराधों और संपत्ति संबंधी अपराधों में दोषसिद्धि दर कई मामलों में केवल 40 से 50 प्रतिशत के बीच बनी हुई है।
वहीं साइबर अपराध, आर्थिक अपराध और एनडीपीएस मामलों की जांच अक्सर दो वर्ष से अधिक समय तक लंबित रहती है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कई शहरी थानों में एक जांच अधिकारी के पास एक समय में 40 से 70 तक सक्रिय मामले रहते हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण जांच प्रभावित होती है और मामलों का बोझ बढ़ता जाता है।
अब हर थाने में होंगी तीन अलग-अलग यूनिट
पुलिस मुख्यालय द्वारा तैयार रिपोर्ट में प्रस्ताव दिया गया है कि चयनित थानों में तीन अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएं—जांच यूनिट, कानून-व्यवस्था यूनिट और प्रशासनिक यूनिट।
शुरुआती चरण में 20 पुलिस थानों में इस मॉडल को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार जांच अधिकारियों को नियमित कानून-व्यवस्था ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और अन्य व्यवस्थाओं में नहीं लगाया जाएगा, ताकि वे पूरी तरह अपराधों की जांच पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
20 थानों में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट
राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने केरल, पंजाब, दिल्ली और बिहार के मॉडल का अध्ययन करने के बाद राज्य के लिए नया ढांचा तैयार किया है।
इसके तहत राज्य के 20 चयनित पुलिस थानों में पायलट प्रोजेक्ट लागू किया जाएगा। प्रत्येक थाने में जांच, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के लिए अलग-अलग इकाइयां बनाई जाएंगी।
प्रस्ताव के अनुसार जांच अधिकारियों को नियमित कानून-व्यवस्था ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी और अन्य सामान्य व्यवस्थाओं में नहीं लगाया जाएगा, ताकि वे पूरी तरह अपराधों की जांच पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
935 नए पदों की जरूरत
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस नई व्यवस्था को सफल बनाने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की आवश्यकता होगी।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत लगभग 935 नए पद सृजित करने, अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने और साइबर, फोरेंसिक तथा वित्तीय अपराधों के विशेषज्ञों को अनुबंध पर नियुक्त करने की सिफारिश की गई है।
हाईकोर्ट के आदेश पर पेश हुई रिपोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में पुलिस प्रशासन और जांच व्यवस्था से जुड़े पुलिस सुधारों को लेकर सख्त आदेश दिए थे।
हाईकोर्ट ने लगातार पुलिस जांच में देरी के चलते मामलों की सुनवाई लंबे समय तक नहीं होने को गंभीर माना था।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में एक ही पुलिस अधिकारी को एफआईआर दर्ज करने, अपराधों की जांच करने, वीआईपी ड्यूटी निभाने, जुलूसों और धरना-प्रदर्शनों की निगरानी करने तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे कई कार्य एक साथ करने पड़ते हैं।
इसका सीधा असर जांच की गुणवत्ता पर पड़ता है और मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी होती है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि जांच एक तकनीकी और समयबद्ध प्रक्रिया है, जबकि कानून-व्यवस्था की ड्यूटी तत्काल प्रतिक्रिया और निरंतर उपस्थिति की मांग करती है। ऐसे में एक ही अधिकारी से दोनों जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से निभाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
जिसकी अनुपालना में राजस्थान पुलिस की समिति की विस्तृत रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की गई है।
20 साल बाद भी लागू नहीं हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में पुलिस सुधारों के तहत जांच और कानून-व्यवस्था के कार्यों को अलग करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
लेकिन दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी राजस्थान में इस दिशा में कोई ठोस व्यवस्था लागू नहीं हो सकी।
इसी को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने राज्य सरकार, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से जवाब मांगा था, जिसके बाद यह विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई।
आधुनिक जांच लैब बनाने के निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान में आधुनिक जांच प्रयोगशालाओं (Investigation Labs) की कमी पर भी चिंता व्यक्त की है।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान में कई मामलों में वैज्ञानिक जांच और विश्लेषण के लिए दूसरे राज्यों की प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे जांच में देरी होती है और अपराधियों को इसका लाभ मिलता है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि समय आ गया है कि राजस्थान में अत्याधुनिक जांच प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएं और पुलिस जांच तंत्र को आधुनिक तकनीकों तथा प्रशिक्षित मानव संसाधन से सशक्त बनाया जाए।
सरकार को निर्देश
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए हैं कि वे पुलिस जांच तंत्र को मजबूत करने, अत्याधुनिक जांच प्रयोगशालाएं स्थापित करने और पुलिस बल की क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
अदालत ने कहा कि निष्पक्ष और त्वरित जांच प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और राज्य सरकार का दायित्व है कि वह इसके लिए पर्याप्त संसाधन, आधारभूत ढांचा और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराए।
हाईकोर्ट ने पुलिस मुख्यालय द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव और उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए कहा कि आधुनिक अपराधों की जांच के लिए आधुनिक संसाधन, प्रशिक्षित जांच अधिकारी और मजबूत जांच तंत्र समय की आवश्यकता है।
मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी, जिसमें राजस्थान पुलिस और गृह विभाग को हाईकोर्ट के समक्ष प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी।
यदि यह मॉडल सफल रहा तो आने वाले समय में राजस्थान की पुलिस व्यवस्था में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है, जिससे अपराधों की जांच तेज होगी और न्यायिक प्रक्रिया को भी गति मिलेगी।
