75 वर्षिय कोटा के रिटायर्ड सहायक लोक अभियोजक को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, पूरी विभागीय कार्रवाई रद्द
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
करीब 13 साल पुरानी कथित लापरवाही के आधार पर एक रिटायर्ड अभियोजक के खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई को कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने इसे “प्रतिशोध की कार्रवाई” (Act of Vengeance) और “सत्ता के दुरुपयोग” (Abuse of Power) का स्पष्ट उदाहरण बताते हुए राज्य सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया।
यह फैसला जस्टिस मुननुरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने रिटायर्ड लोक अभियोजक डॉ. बृज बल्लभ शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
‘प्रतिशोध’ और ‘सत्ता के दुरुपयोग’ की कड़ी टिप्पणी
इस केस में राजस्थान हाईकोर्ट ने असाधारण रूप से सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। आदेश में कहा गया—
यह कार्रवाई “Act of Vengeance” यानी बदले की भावना से प्रेरित है, विभाग ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग (Abuse of Power) किया है, मामूली आरोपों को गंभीर बनाकर पेश करना मनमानी है, पेंशन तक रोक दी गई!
कोर्ट ने कहा कि डॉ. शर्मा 2010 में रिटायर हो चुके थे, लेकिन विभागीय कार्रवाई के नाम पर उनके पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभ रोक दिए गए। कोर्ट ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण और अन्यायपूर्ण” बताया।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की उम्र का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की उम्र करीब 75 वर्ष है, वे गंभीर स्वास्थ्य स्थिति में हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें वर्षों तक उनके अधिकारों से वंचित रखना मानवीय दृष्टि से भी गलत है।
क्या है पूरा मामला?
मामला डॉ. बृज बल्लभ शर्मा से जुड़ा है, जो कोटा में डिप्टी डायरेक्टर (प्रॉसिक्यूशन) के पद से रिटायर हो चुके हैं।
वर्ष 1994-95 में जब वे झालावाड़ के अकलेरा कोर्ट में सहायक लोक अभियोजक थे, उस दौरान रजिस्टर में कुछ प्रविष्टियों को लेकर उन पर लापरवाही के आरोप लगाए गए।
याचिकाकर्ता पर चालान दाखिल करने की तारीख गलत होने, मामलों के निस्तारण की तारीख गलत दर्ज करने, फाइल वापसी की तारीख नहीं भरने और लंबित व निपटाए गए मामलों का सत्यापन नहीं देने के आरोप लगाए गए थे।
1994-95 में लगाए गए इन सामान्य आरोपों पर करीब 13 साल बाद सरकार ने वर्ष 2008 में विभागीय कार्रवाई शुरू की, जो कि याचिकाकर्ता के ठीक रिटायरमेंट से पहले थी।
याचिकाकर्ता लोक अभियोजक की दलीलें
रिटायर्ड लोक अभियोजक डॉ. बृज बल्लभ शर्मा की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन नंदवाना, यश नंदवाना, जी.वी. चौहान, सव्यसाची पुरी और यशस्वी शर्मा ने पैरवी करते हुए विभागीय कार्रवाई को पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण, देरी से की गई और कानूनी रूप से अस्थिर बताया।
अधिवक्ताओं ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप केवल रजिस्टर में प्रविष्टियों से संबंधित हैं। इन सभी को उन्होंने सिर्फ तकनीकी त्रुटियां (clerical/technical lapses) बताया, न कि कोई गंभीर कदाचार।
अधिवक्ता ने कहा कि सहायक लोक अभियोजक (APP) का कार्य रजिस्टर में एंट्री करना नहीं होता, यह काम कार्यालय में नियुक्त क्लर्क/लिपिक स्टाफ का होता है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि न तो किसी ड्यूटी चार्ट में और न ही किसी सेवा नियम में यह जिम्मेदारी याचिकाकर्ता पर डाली गई है, इसलिए उनके खिलाफ कर्तव्य उल्लंघन (dereliction of duty) का आरोप ही गलत है।
13 साल की देरी के बाद शुरू हुई कार्रवाई को अवैध बताते हुए अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कथित घटनाएं 1994-95 की हैं, जबकि विभागीय कार्रवाई 2008 में शुरू की गई। यानी लगभग 13 वर्षों की असामान्य देरी हुई।
दलील दी गई कि इतनी लंबी देरी अपने आप में यह साबित करती है कि कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है और कानून की नजर में टिक नहीं सकती।
अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि कार्रवाई रिटायरमेंट (2010) के ठीक पहले शुरू की गई और जानबूझकर इसे लंबित रखा गया, ताकि उन्हें पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों से वंचित किया जा सके।
अधिवक्ता ने कहा कि पहले याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोपों को Rule 17 (सामान्य प्रक्रिया) के तहत लिया गया और बाद में अचानक इसे Rule 16 (गंभीर आरोप) में बदल दिया गया।
यह बदलाव बिना किसी ठोस आधार के किया गया, जो मनमानी और दुर्भावना को दर्शाता है।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह पूरी कार्रवाई संबंधित अधिकारियों की “बदले की भावना” से प्रेरित है।
अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता की उम्र लगभग 75 वर्ष है और वे गंभीर रूप से बीमार हैं (“on deathbed” स्थिति)। इसके बावजूद उन्हें उनके वैधानिक लाभ नहीं मिले, जो अमानवीय और अन्यायपूर्ण है।
राज्य सरकार का जवाब
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने विभागीय कार्रवाई को सही ठहराते हुए दलील दी कि याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोप केवल मामूली नहीं हैं, बल्कि वे कर्तव्य निर्वहन में गंभीर लापरवाही (serious misconduct) को दर्शाते हैं।
सरकार ने कहा कि लोक अभियोजक के तौर पर यह कोई एकल त्रुटि नहीं, बल्कि “कई स्तरों पर लगातार चूक (multiple omissions)” का मामला है, जो एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी के लिए गंभीर है।
देरी को लेकर सरकार ने कहा कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए कोई निर्धारित समय सीमा (limitation period) नहीं होती और देरी का मूल्यांकन आरोपों की गंभीरता (gravity) के आधार पर किया जाना चाहिए। इसलिए केवल देरी के आधार पर कार्रवाई को रद्द नहीं किया जा सकता।
Rule 16 में परिवर्तन को उचित बताते हुए सरकार ने कहा कि प्रारंभ में आरोप मामूली लगे, लेकिन बाद में जांच में पाया गया कि वे गंभीर हैं। इसी आधार पर कार्रवाई को Rule 17 से Rule 16 में बदला गया, जो कि विभागीय अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत वैध निर्णय है।
सरकार ने यह भी कहा कि न्यायालयों से जुड़े रिकॉर्ड में गड़बड़ी का सीधा प्रभाव न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ता है, इसलिए ऐसी लापरवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ पूरी कार्रवाई को देरी, दुर्भावना और गलत आधार पर की गई बताते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए पाया कि पहले आरोपों को Rule 17 (साधारण कार्रवाई) के तहत लिया गया, लेकिन रिटायरमेंट से ठीक पहले इन्हें Rule 16 (गंभीर आरोप) में बदल दिया गया।
यही नहीं, 2025 में जांच अधिकारी भी नियुक्त कर दिया गया, जबकि कर्मचारी 2010 में ही रिटायर हो चुका था।
कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को “सुनियोजित उत्पीड़न” करार देते हुए कहा कि सरकार ने मामूली गलती को बड़ा अपराध बना दिया।
हाईकोर्ट ने साफ कहा—
“रजिस्टर में प्रविष्टियों से जुड़ी त्रुटियां कोई गंभीर कदाचार नहीं हैं।” रजिस्टर में एंट्री करना अभियोजक की जिम्मेदारी साबित नहीं हुई। इसके लिए क्लर्कीय स्टाफ मौजूद रहता है। सरकार यह साबित ही नहीं कर पाई कि याचिकाकर्ता ने कोई नियम तोड़ा।
हाईकोर्ट ने 13 साल की देरी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “13 साल बाद विभागीय कार्रवाई शुरू करना पूरी तरह असंगत और अनुचित है।”
कोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई उचित समय सीमा में होनी चाहिए, वरना यह न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट का बड़ा फैसला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 2008 में जारी की गई चार्जशीट को रद्द कर दिया।
साथ ही Rule 17 से Rule 16 में बदलाव को खारिज करते हुए 2025 में नियुक्त जांच अधिकारी की नियुक्ति भी रद्द कर दी।
साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया।