बहुचर्चित 5 लाख रिश्वत कांड के आरोपी पुलिस इंस्पेक्टर रणिदान सिंह और एएसआई जगदीश कुमार को बड़ी राहत, FIR रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस इंस्पेक्टर रणिदान सिंह और सहायक उपनिरीक्षक (ASI) जगदीश कुमार को बड़ी राहत देते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) में दर्ज रिश्वत मांगने सहित अन्य आरोपों से जुड़ी FIR निरस्त कर दी है।
जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने अपने महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों के मामले में भी अभियोजन के लिए अपराध के आवश्यक तत्वों का प्रथमदृष्टया सामने आना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह संतुलन स्पष्ट किया कि एक ओर भ्रष्टाचार के मामलों में जांच को समय से पहले रोका नहीं जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया को ऐसे अभियोजन का माध्यम भी नहीं बनने दिया जा सकता, जिसके समर्थन में आवश्यक कानूनी आधार उपलब्ध न हो।
हाईकोर्ट ने दोनों पुलिसकर्मियों की याचिकाएं स्वीकार करते हुए एसीबी, जयपुर में दर्ज उनके खिलाफ FIR और उससे जुड़ी समस्त कार्यवाही को निरस्त करने का आदेश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
मामला दिल्ली निवासी सुरेंद्र धारिवाल की शिकायत से जुड़ा था। शिकायत के अनुसार, 8 नवंबर 2021 को गंगाशहर थाने में दर्ज एक FIR की जांच के सिलसिले में पुलिसकर्मी दिल्ली स्थित उनकी दुकान पर पहुंचे थे।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि पुलिस ने दुकान से ₹1,02,000 नकद, दो मोबाइल फोन, तीन CPU, दो लैपटॉप और एक DVR जब्त किए, लेकिन इन वस्तुओं को जब्ती मेमो में दर्ज नहीं किया और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिकायतकर्ता को बीकानेर लाने के बाद तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर रणिदान सिंह ने रिहाई के बदले ₹5 लाख की मांग की।
शिकायतकर्ता के इनकार करने पर उसे मामले में फंसाने और उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने का भी आरोप लगाया गया।
जमानत पर रिहा होने के बाद शिकायतकर्ता ने 7 जनवरी 2022 को कथित तौर पर जब्त सामान वापस लेने के लिए पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया।
आरोप था कि सामान लौटाने के बदले भी रिश्वत मांगी गई।
ACB ने ऐसे किया था डिमांड वेरिफिकेशन
शिकायतकर्ता ने इसके बाद ACB, जयपुर में शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत के अनुसार, अधिकारियों ने 15 जनवरी 2022 को मुलाकात के दौरान रिश्वत की मांग की आशंका के आधार पर सत्यापन की कार्रवाई की।
ACB की टीम ने डिजिटल ऑडियो रिकॉर्डिंग उपकरणों के साथ शिकायतकर्ता को बीकानेर भेजा।
15 जनवरी 2022 को शिकायतकर्ता की एएसआई जगदीश कुमार से मुलाकात हुई।
आरोप था कि जगदीश कुमार ने सीधे तौर पर रकम की मांग नहीं की, लेकिन इशारे से बताया कि जब्त नकदी में से ₹1 लाख रणिदान सिंह को दिए गए थे।
16 जनवरी 2022 को शिकायतकर्ता की रणिदान सिंह से मुलाकात हुई।
आरोप लगाया गया कि इस दौरान उन्होंने जब्त CPU में से एक अपने पास रख लिया। कथित रिकॉर्डिंग का पता चलने के बाद शिकायतकर्ता और उसके साथ मौजूद ACB अधिकारी को पुलिस थाने में रोक लिए जाने का भी आरोप था।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि रणिदान सिंह CPU, रिकॉर्डिंग उपकरण, मोबाइल फोन और पावर बैंक लेकर थाने से चले गए।
ACB ने रिकॉर्ड की गई बातचीत, गवाहों के बयानों और अन्य सामग्री का विश्लेषण करने के बाद दोनों पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला बनना माना था।
पहले भी निरस्त हुई थी FIR, सुप्रीम कोर्ट ने वापस भेजा मामला
इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 8 अक्टूबर 2024 को FIR को इस आधार पर निरस्त कर दिया था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2025 को Surendra Dhariwal v. State of Rajasthan & Anr. मामले में हाईकोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए दोनों याचिकाओं पर नए सिरे से सुनवाई के लिए मामला वापस भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में धारा 17A लागू नहीं होती और हाईकोर्ट को FIR निरस्त करने के अन्य आधारों पर सभी पक्षों को सुनकर गुण-दोष के आधार पर फैसला करना होगा।
इसके बाद जस्टिस संजीत पुरोहित की पीठ ने मामले की दोबारा सुनवाई की।
बहस 8 जुलाई 2026 को पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था।
पुलिसकर्मियों की ओर से क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सी एस कोटवानी ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि FIR में लगाए गए आरोप अस्पष्ट और अपुष्ट हैं तथा उपलब्ध सामग्री से भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 के तहत रिश्वत मांगने का मूल तत्व सामने नहीं आता।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जिस पुराने मामले में शिकायतकर्ता को गिरफ्तार किया गया था, उसकी जांच पूरी हो चुकी थी और 22 दिसंबर 2021 को चार्जशीट दाखिल की जा चुकी थी।
ऐसे में उसी मामले में अनुकूल कार्रवाई के बदले बाद में रिश्वत मांगने का आरोप परिस्थितियों के अनुरूप नहीं था।
याचिकाकर्ताओं ने 7 जनवरी 2022 की कथित टेलीफोनिक बातचीत की रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड या अन्य पुष्टिकारक सामग्री उपलब्ध नहीं होने की बात भी उठाई।
यह भी बताया कि 16 जनवरी की घटना से संबंधित गंगाशहर थाने में दर्ज एक अन्य FIR संख्या की जांच के बाद 2 दिसंबर 2023 को नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की गई थी।
बचाव पक्ष ने शिकायतकर्ता की ओर से दुर्भावना और बदले की भावना से कार्यवाही शुरू कराने का आरोप लगाते हुए FIR निरस्त करने की मांग की।
शिकायतकर्ता और सरकार ने क्या कहा?
शिकायतकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि FIR निरस्त करने की शक्ति का इस्तेमाल सीमित परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।
इस स्तर पर अदालत को विवादित तथ्यों और साक्ष्यों की विश्वसनीयता का विस्तृत परीक्षण नहीं करना चाहिए, क्योंकि उनका मूल्यांकन मुकदमे के दौरान किया जा सकता है।
यह भी दलील दी गई कि रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित किया जा सकता है तथा प्रत्यक्ष साक्ष्य का अभाव अपने आप में FIR निरस्त करने का आधार नहीं है।
शिकायतकर्ता की ओर से रिकॉर्ड की गई बातचीत को भी अभियोजन के समर्थन में महत्वपूर्ण सामग्री बताया गया।
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने भी याचिकाओं का विरोध किया और कहा कि जांच के दौरान एकत्र सामग्री से प्रथमदृष्टया अपराध बनता है।
जज की अहम टिप्पणी: FIR निरस्त करने की शक्ति व्यापक, लेकिन इस्तेमाल सावधानी से
जस्टिस संजीत पुरोहित ने फैसले में स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां व्यापक हैं, लेकिन FIR निरस्त करने के लिए उनका प्रयोग अत्यंत सावधानी और न्यायिक विवेक के साथ किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि इस स्तर पर अदालत को यह देखना होता है कि FIR में लगाए गए आरोप और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री प्रथमदृष्टया कथित अपराध के आवश्यक तत्वों को स्थापित करते हैं या नहीं।
यदि आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बन रही हो अथवा न्याय के उद्देश्य पूरे करने के लिए हस्तक्षेप आवश्यक हो, तो हाईकोर्ट कार्यवाही निरस्त कर सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में FIR निरस्त करने से पहले अधिक सतर्कता आवश्यक है।
लेकिन गंभीरता के कारण यह अनिवार्यता समाप्त नहीं हो जाती कि आरोपों और उपलब्ध सामग्री से अपराध के आवश्यक तत्व कम से कम प्रथमदृष्टया सामने आने चाहिए।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के State of Haryana v. Bhajan Lal, Madhavrao Jiwajirao Scindia v. Sambhajirao Chandrojirao Angre और State of A.P. v. Golconda Linga Goswamy सहित विभिन्न फैसलों के सिद्धांतों का हवाला दिया।
रिश्वत मांगने का आरोप साबित करने के लिए क्या जरूरी?
फैसले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के आवश्यक तत्वों पर विस्तार से विचार किया गया।
अदालत ने बताया कि इस अपराध के लिए मुख्य रूप से यह देखना जरूरी है कि आरोपी लोक सेवक है, उसने किसी व्यक्ति से अनुचित लाभ प्राप्त किया, स्वीकार किया या प्राप्त करने का प्रयास किया और यह कृत्य लोक कर्तव्य के अनुचित या बेईमान निर्वहन से जुड़ा था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के B. Jayaraj v. State of A.P., P. Satyanarayana Murthy v. State of A.P., N. Vijayakumar v. State of T.N. और संविधान पीठ के Neeraj Dutta v. State (NCT of Delhi) के फैसलों का हवाला देते हुए रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने के प्रमाण के महत्व को रेखांकित किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल रकम की बरामदगी या कब्जा अपने आप में रिश्वत का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
मांग और स्वीकार किए जाने के तथ्य प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित किए जा सकते हैं, लेकिन अभियोजन सामग्री से आवश्यक तत्व सामने आने चाहिए।
जब्त सामान लौटाने के बदले रिश्वत की मांग के आरोप पर भी विचार
हाईकोर्ट ने शिकायत में लगाए गए अलग-अलग आरोपों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया।
अदालत ने पाया कि उपलब्ध सामग्री से धारा 7 के तहत अनुचित लाभ मांगने या प्राप्त करने का आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होता।
अदालत ने जबरन वसूली के आरोप पर भी विचार किया।
फैसले में कहा गया कि इस अपराध के लिए कथित वसूली के परिणामस्वरूप मूल्यवान सुरक्षा या संपत्ति का सौंपा जाना आवश्यक है, जबकि रिकॉर्ड पर ऐसी सुपुर्दगी सामने नहीं आई।
साक्ष्य को नष्ट करने या गायब करने के आरोप के संबंध में अदालत ने ध्यान दिया कि इसी घटना से संबंधित FIR में जांच के बाद नकारात्मक अंतिम रिपोर्ट पेश की गई थी।
हाईकोर्ट के अनुसार, मौजूदा रिकॉर्ड से इस अपराध का होना भी प्रथमदृष्टया सामने नहीं आया।
दुर्भावना और न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर अदालत
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि शिकायतकर्ता के खिलाफ पहले से दर्ज आपराधिक मामले में पुलिस कार्रवाई के बाद यह शिकायत की गई, जिससे बदले की भावना की आशंका पैदा होती है।
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री का समग्र मूल्यांकन किया।
पीठ ने अंततः माना कि इस मामले में हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग केवल अनुमेय ही नहीं, बल्कि कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय के उद्देश्य सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।
दोनों याचिकाएं स्वीकार, FIR और संबंधित कार्यवाही निरस्त
अपने फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने रणिदान सिंह और जगदीश कुमार की दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।
अदालत ने ACB, जयपुर में दर्ज FIR को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 तथा IPC की धारा 201 और 384 के साथ धारा 120-B के तहत लगाए गए आरोपों के संबंध में निरस्त कर दिया।
FIR से उत्पन्न समस्त परिणामी कार्यवाही भी निरस्त कर दी गई।