वयस्कों के आपसी सहमति वाले संबंध में बाद में दर्ज एफआईआर को बताया कानून के दुरुपयोग का उदाहरण, राजस्थान हाईकोर्ट ने रेप व अपहरण का मामला किया रद्द
जोधपुर। आपसी सहमति से बने प्रेम संबंधों के टूटने के बाद रेप जैसे गंभीर मामलों में एफआईआर दर्ज कराने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि दो बालिगों के बीच बने सहमति वाले प्रेम संबंध को बाद में “रेप” या “अपहरण” का मामला नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने साफ कहा कि असफल प्रेम संबंधों को आपराधिक मुकदमों में बदलना कानून के दुरुपयोग के समान है और यह न्याय व्यवस्था के दुरुपयोग को बढ़ावा देता है।
आपसी सहमति के बाद बने संबंध टूटने पर युवती ने अपने प्रेमी युवक के खिलाफ रेप और अपहरण जैसे गंभीर मामलों में मुकदमा दर्ज कराया था।
आरोपी प्रेमी युवक की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने रेप और अपहरण जैसे गंभीर मामलों में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।
क्या है मामला
यह मामला राजस्थान के सिरोही जिले का था, जिसमें एक युवती ने अपने प्रेमी रहे जगदीश नामक युवक और उसके परिवार के लोगों के खिलाफ अपहरण, रेप और साजिश जैसी गंभीर धाराओं में FIR दर्ज करवाई थी।
दर्ज की गई FIR में IPC की धारा 344, 366, 376, 376(2)(n) और 120B लगाई गई थीं।
मामले में याचिकाकर्ता आरोपी जगदीश पुत्र वर्दा राम सहित अन्य पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता युवती का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया।
शिकायतकर्ता युवती की ओर से याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया गया कि मुख्य आरोपी जगदीश और अन्य सह-अभियुक्तों ने युवती को अपने प्रभाव और विश्वास में लेकर उसके साथ संबंध बनाए तथा बाद में उसके साथ गलत व्यवहार किया।
FIR में यह आरोप भी लगाया गया कि युवती को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोककर रखा गया और उसके साथ दुष्कर्म किया गया।
याचिकाकर्ता प्रेमी युवक की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रियंका बोराना ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता युवती और मुख्य आरोपी जगदीश के बीच लंबे समय से प्रेम संबंध थे तथा दोनों वयस्क थे।
अधिवक्ता ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार युवती स्वयं अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। अदालत के सामने पेश किए गए रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा गया कि दस्तावेजों में मिसिंग पर्सन रिपोर्ट, युवती के बयान, विवाह प्रमाण पत्र और हलफनामा शामिल थे।
अधिवक्ता प्रियंका बोराना ने कहा कि यह पूरा मामला एक सहमति से बने प्रेम संबंध को बाद में आपराधिक रंग देने का प्रयास है।
अधिवक्ता के अनुसार शिकायतकर्ता युवती और जगदीश के बीच पिछले लगभग दो वर्षों से प्रेम संबंध थे तथा दोनों लगातार संपर्क में थे। दोनों बालिग थे और अपनी इच्छा से एक-दूसरे के साथ रहना चाहते थे।
अदालत को बताया गया कि 13 फरवरी 2023 को शिकायतकर्ता के भाई द्वारा पुलिस थाना बारलूट, जिला सिरोही में एक मिसिंग पर्सन रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
लेकिन अगले ही दिन 14 फरवरी 2023 को युवती स्वयं पुलिस के समक्ष उपस्थित हुई और स्पष्ट रूप से बयान दिया कि वह अपनी मर्जी से जगदीश के साथ गई थी।
आर्य समाज में किया था विवाह
अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस में दिए बयान के अनुसार उसने पुलिस को बताया कि उसके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती, अपहरण या दबाव नहीं हुआ।
अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता और जगदीश ने अपने संबंध को सामाजिक और वैधानिक रूप देने के लिए विवाह करने का निर्णय लिया था।
इस तथ्य के पक्ष में रिकॉर्ड दस्तावेज पेश किया गया कि दोनों ने 25 जून 2022 को विवाह अनुबंध (Marriage Agreement) किया था और बाद में 29 मार्च 2023 को जोधपुर स्थित आर्य समाज मंदिर, मेड़ती गेट में विधिवत हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया।
इस मामले में आर्य समाज का विवाह प्रमाण पत्र भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
हाईकोर्ट में एक नोटराइज्ड शपथपत्र भी पेश किया गया, जिसमें शिकायतकर्ता युवती ने स्वयं स्वीकार किया था कि वह पिछले दो वर्षों से जगदीश को जानती है, दोनों के बीच प्रेम संबंध हैं तथा उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से विवाह किया है।
युवती ने मांगी थी सुरक्षा, परिजनों से बताया था खतरा
याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि यह दस्तावेज स्वयं यह साबित करता है कि संबंध पूरी तरह सहमति पर आधारित था।
याचिकाकर्ता की अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता पूर्व में स्वयं राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष सुरक्षा की मांग लेकर आई थी।
उस याचिका में युवती ने कहा था कि उसने अपनी इच्छा से जगदीश से विवाह किया है और उसके परिवारजन इस विवाह से नाराज हैं, जिससे उसे खतरा है। इस पर हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को सुरक्षा संबंधी आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए थे।
याचिकाकर्ता पक्ष के अनुसार यह तथ्य भी स्पष्ट करता है कि युवती स्वेच्छा से जगदीश के साथ रह रही थी।
दबाव के बाद दर्ज कराया रेप का मुकदमा
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि बाद में पारिवारिक दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के कारण शिकायतकर्ता अपने परिवार के पास लौट गई।
इसके बाद एक पत्र के माध्यम से उसने यह कहा कि वह अब संबंध आगे नहीं रखना चाहती, लेकिन उस पत्र में कहीं भी दुष्कर्म, जबरदस्ती या अपहरण जैसे आरोप नहीं लगाए गए। इसके बावजूद बाद में गंभीर धाराओं में FIR दर्ज करवा दी गई।
याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत में जोर देकर कहा कि FIR दुर्भावनापूर्ण है और केवल प्रतिशोध तथा दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यदि पूरे रिकॉर्ड, दस्तावेजों, बयान और परिस्थितियों को देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मामला सहमति से बने संबंध का है, न कि किसी जबरदस्ती या यौन अपराध का।
सुप्रीम कोर्ट का हवाला
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि असफल प्रेम संबंधों को बाद में रेप के मुकदमों में बदलना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अधिवक्ता ने कहा कि धारा 376 IPC जैसे गंभीर प्रावधानों का उपयोग केवल वास्तविक अपराधों में होना चाहिए, न कि ऐसे मामलों में जहां दोनों पक्षों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से बना हो।
युवती और सरकार ने किया याचिका का विरोध
प्रतिवादी पक्ष अर्थात राज्य सरकार की ओर से अदालत में याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज FIR पूरी तरह गंभीर आरोपों पर आधारित है और प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है, इसलिए हाईकोर्ट को FIR निरस्त नहीं करनी चाहिए।
राज्य पक्ष ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि जांच अभी प्रारंभिक अवस्था में है तथा सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण ट्रायल के दौरान होना आवश्यक है।
शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से इसी आधार पर पुलिस ने IPC की धारा 344, 366, 376, 376(2)(n) और 120B के तहत मामला दर्ज किया।
सरकार ने यह भी कहा कि केवल विवाह प्रमाण पत्र या कुछ दस्तावेजों के आधार पर पूरे मामले को सहमति वाला संबंध नहीं माना जा सकता।
साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं
अभियोजन की ओर से यह तर्क दिया गया कि यह जांच और साक्ष्यों का विषय है कि युवती की सहमति वास्तव में स्वतंत्र थी या किसी दबाव, प्रभाव अथवा परिस्थितियों के कारण प्राप्त की गई थी।
प्रतिवादी पक्ष ने अदालत से कहा कि FIR निरस्तीकरण के स्तर पर न्यायालय को केवल आरोपों की प्रथम दृष्टया सत्यता देखनी चाहिए और विस्तृत साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।
राज्य सरकार का कहना था कि यदि FIR में गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो पुलिस को निष्पक्ष जांच करने का अवसर मिलना चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यता और परिस्थितियों की जांच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए।
सरकार ने कहा कि केवल इस आधार पर कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को जानते थे या उनके बीच संबंध थे, गंभीर अपराधों की जांच को प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
हालांकि रिकॉर्ड में यह तथ्य सामने आया कि शिकायतकर्ता को नोटिस भेजे जाने के बावजूद वह व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में उपस्थित नहीं हुई।
इसके बावजूद राज्य सरकार ने FIR और जांच को जारी रखने की मांग करते हुए कहा कि मामले के सभी पहलुओं की जांच आवश्यक है और FIR को रद्द करना उचित नहीं होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने मामले की सुनवाई करते हुए रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों, पुलिस रिकॉर्ड, युवती के पूर्व बयानों, विवाह प्रमाण पत्र, शपथपत्र तथा दोनों पक्षों की परिस्थितियों का विस्तृत परीक्षण किया।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि शिकायतकर्ता और मुख्य आरोपी जगदीश के बीच संबंध सहमति पर आधारित थे।
एकलपीठ ने विशेष रूप से इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि शिकायतकर्ता युवती स्वयं कई अवसरों पर पुलिस के समक्ष उपस्थित हुई और उसने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि 14 फरवरी 2023 तथा 1 अप्रैल 2023 को दिए गए उसके बयानों में कहीं भी अपहरण, दबाव या जबरदस्ती का आरोप नहीं था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता और आरोपी ने आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था और विवाह प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त युवती द्वारा दिया गया नोटराइज्ड शपथपत्र भी अदालत के समक्ष था, जिसमें उसने अपनी स्वतंत्र इच्छा से संबंध और विवाह स्वीकार किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि ये दस्तावेज मामले की वास्तविक परिस्थितियों को स्पष्ट करते हैं।
संबंध सामान्य और स्वैच्छिक
दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध फोटो और अन्य दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि दोनों के बीच संबंध सामान्य और स्वैच्छिक थे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता पहले स्वयं हाईकोर्ट आई थी और उसने अपने परिवार से खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह आरोपी के साथ अपनी इच्छा से रह रही थी।
हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि दोनों पक्ष बालिग थे और अपने जीवन से संबंधित निर्णय लेने के लिए सक्षम थे।
रेप में बदलने की प्रवृत्ति चिंताजनक
कोर्ट ने कहा कि यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से संबंध स्थापित करते हैं और बाद में किसी कारणवश संबंध समाप्त हो जाता है, तो मात्र उस आधार पर गंभीर आपराधिक धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि असफल प्रेम संबंधों को बाद में “रेप” के मामलों में बदलने की प्रवृत्ति चिंताजनक है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध, भावनात्मक विवाद या सामाजिक दबाव के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 376 IPC जैसे गंभीर अपराध के लिए यह आवश्यक है कि सहमति धोखे, दबाव या झूठे वादे के कारण प्राप्त की गई हो।
लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई साक्ष्य रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि युवती की सहमति किसी धोखे या छल के कारण प्राप्त की गई थी। इसके विपरीत रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि संबंध लंबे समय तक चला और विवाह तक पहुंचा।
पारिवारिक दबाव में दर्ज
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता को समन भेजे जाने के बावजूद वह अदालत में उपस्थित नहीं हुई।
अदालत ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना और कहा कि यह परिस्थिति याचिकाकर्ता पक्ष के उस तर्क को बल देती है कि FIR संभवतः पारिवारिक दबाव या बाद की परिस्थितियों में दर्ज कराई गई।
हाईकोर्ट ने “सुजॉय घोष बनाम झारखंड राज्य” सहित कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेज “sterling and impeccable quality” के हों और वे FIR में लगाए गए आरोपों को असंभव या अविश्वसनीय बनाते हों, तो हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए FIR रद्द कर सकता है।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने सिरोही जिले के बारलूट थाने में दर्ज FIR संख्या 111/2023 को रद्द करते हुए आरोपी प्रेमी युवक और याचिकाकर्ता जगदीश को बड़ी राहत दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है और उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए अभियोजन जारी रखना कानून और न्याय दोनों के विपरीत होगा।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही एफआईआर से जुड़ी संबंधित समस्त आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया।