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राजस्थान हाईकोर्ट की नई इमारत में खामियों का मामला, 2 इंजीनियरों की अपील खारिज; चार्जशीट रद्द करने से कोर्ट का इनकार

Rajasthan High Court Refuses to Quash Chargesheet Against Two Engineers Over New Building Defects

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित नई इमारत में सामने आई गंभीर खामियों को लेकर दो इंजीनियरों को जारी चार्जशीट के मामले में हाईकोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया है।

हाईकोर्ट ने दोनों इंजीनियरों की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए चार्जशीट रद्द करने से भी इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अभी सिर्फ चार्जशीट जारी हुई है, इसे अंतिम सजा या दोष साबित होना नहीं माना जा सकता।

दोनों अधिकारियों को अपना जवाब देने और विभागीय जांच में अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।

जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने सुरेश शर्मा और जितेंद्र शर्मा की विशेष अपीलें खारिज कर दीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य तौर पर चार्जशीट के स्तर पर हाईकोर्ट विभागीय कार्रवाई में दखल नहीं देता।

इस मामले में भी ऐसी कोई खास वजह नहीं है, जिसके चलते चार्जशीट को इसी स्तर पर रद्द किया जाए।

नई इमारत में बार-बार हादसे

मामला राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित नई बिल्डिंग में निर्माण के दौरान सामने आई खामियों से जुड़ा है।

इस भवन का निर्माण राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को सौंपा गया था। यह काम लोक निर्माण विभाग की देखरेख में था।

सुरेश शर्मा इस प्रोजेक्ट में प्रोजेक्ट डायरेक्टर और जितेंद्र शर्मा प्रोजेक्ट ऑफिसर थे। सुरेश शर्मा 10 अक्टूबर 2010 से 27 अप्रैल 2021 तक प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे।

निर्माण में कमियां सामने आने के बाद सरकार ने 30 मई 2025 को दोनों अधिकारियों को चार्जशीट दी।

इमारत में कई बार छत और फॉल्स सीलिंग गिरने की घटनाएं हुईं।

20 फरवरी 2023 को चैंबर नंबर 14 की छत का हिस्सा गिर गया। इससे फॉल्स सीलिंग और फर्नीचर को नुकसान पहुंचा।

इससे पहले कोर्ट नंबर 2, 9 और 16 के साथ चैंबर नंबर 16 में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं।

29 अप्रैल 2023 को डोम वाले हिस्से की छत का एक हिस्सा गिर गया।

इसके बाद जून 2023 में सिविल मिसलेनियस अपील सेक्शन और बिल सेक्शन की छत का प्लास्टर गिर गया। बिल सेक्शन की फॉल्स सीलिंग भी नीचे आ गई।

बारिश में कोर्ट रूम भी नहीं बचा

सितंबर 2024 में बारिश के दौरान कोर्ट नंबर 2 और 16 में पानी भर गया।

हालात इतने खराब हुए कि दोनों कोर्ट रूम में चल रहा काम रोकना पड़ा और सुनवाई के लिए जगह बदलनी पड़ी।

इसी दौरान अकाउंट्स शाखा की फॉल्स सीलिंग भी गिर गई। कोर्ट नंबर 19 की फॉल्स सीलिंग में पानी भरने के बाद वह भी गिर गई।

24 सितंबर 2024 को गेट नंबर 3 पर मेडिएशन सेंटर के सामने लिफ्ट के पास छत का एक हिस्सा गिर गया।

इन घटनाओं के बाद इमारत की निर्माण गुणवत्ता और उसकी निगरानी पर सवाल उठे।

सरकार का आरोप है कि प्रोजेक्ट की निगरानी के दौरान दोनों अधिकारियों ने जरूरी सावधानी नहीं बरती।

इंजीनियरों ने चार्जशीट पर उठाए सवाल

दोनों अधिकारियों ने चार्जशीट को चुनौती देते हुए कहा कि उनकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से निर्माण कार्य की निगरानी तक थी।

उनका कहना था कि इमारत में सामने आई खामियों की असली वजह अभी तय नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि यह अभी साफ नहीं है कि नुकसान निर्माण में कमी की वजह से हुआ या डिजाइन में किसी समस्या के कारण।

अधिकारियों ने अलग-अलग जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पूरी वजह सामने आने से पहले ही उन्हें चार्जशीट दे दी गई।

दोनों ने यह भी कहा कि कार्रवाई चुनिंदा तरीके से की गई है और चार्जशीट में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप साफ नहीं हैं।

जांच रिपोर्ट में मिली खामियां

राज्य सरकार ने दोनों अधिकारियों की दलीलों का विरोध किया।

सरकार का कहना था कि उनकी जिम्मेदारी सिर्फ निर्माण कार्य को देखना नहीं थी। उन्हें यह भी देखना था कि निर्माण में घटिया सामान का इस्तेमाल न हो और ठेकेदार तय शर्तों और गुणवत्ता के मुताबिक काम करें।

सरकार ने कोर्ट को बताया कि निर्माण में सामने आई कमियों को लेकर जांच रिपोर्ट में गंभीर बातें सामने आई हैं।

इस मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई है।

सरकार के मुताबिक, चार्जशीट में दोनों अधिकारियों की निगरानी में हुई लापरवाही के अलग-अलग मामलों का भी जिक्र किया गया है।

कोर्ट ने क्यों नहीं रोकी कार्रवाई?

हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ चार्जशीट जारी होने के आधार पर कोर्ट विभागीय कार्रवाई में दखल नहीं देता।

ऐसे मामले में अधिकारी को पहले चार्जशीट का जवाब देने और विभागीय जांच में अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि चार्जशीट जारी होना अंतिम फैसला नहीं है।

अगर जांच में आरोप साबित नहीं होते हैं तो विभागीय कार्रवाई खत्म भी हो सकती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस समय अलग-अलग जांच रिपोर्टों को देखकर यह तय करना कि आरोप सही हैं या नहीं, विभागीय जांच के नतीजे पर पहुंचने जैसा होगा।

इस स्तर पर हाईकोर्ट के लिए ऐसा करना ठीक नहीं है।

भेदभाव का दावा भी खारिज

दोनों अधिकारियों ने यह भी कहा था कि निर्माण की निगरानी से जुड़े दूसरे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई और उन्हें ही चुनकर चार्जशीट दी गई।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद इस दलील को भी नहीं माना।

हाईकोर्ट ने बताया कि इस मामले में दोनों अधिकारियों समेत कुल 9 लोगों को चार्जशीट दी गई है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कार्रवाई सिर्फ इन दोनों के खिलाफ हुई।

वहीं दोनों अधिकारियों ने कहा था कि चार्जशीट में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप साफ नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि चार्जशीट में उनकी लापरवाही का जिक्र किया गया है।

निर्माण के दौरान हुई अलग-अलग घटनाओं और सामने आई खामियों को भी इन आरोपों से जोड़ा गया है।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि निरीक्षण रिपोर्टों में प्रोजेक्ट डायरेक्टर को पूरे निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

ऐसे में इमारत में गंभीर खामियां सामने आने के बाद दोनों अधिकारियों को चार्जशीट देना गलत नहीं कहा जा सकता।

अधिकारियों को नहीं मिली राहत

राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों अधिकारियों की विशेष अपीलें खारिज कर दीं।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों अधिकारी दोषी साबित हो गए हैं। अभी उनके खिलाफ विभागीय जांच की प्रक्रिया आगे चलेगी।

दोनों अधिकारियों को चार्जशीट का जवाब देने और जांच के दौरान अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।

हाईकोर्ट ने फिलहाल माना है कि इस शुरुआती चरण में चार्जशीट रद्द करने की कोई वजह नहीं है।

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