हाईकोर्ट ने कहा कंपनी के नेटवर्क की खराबी को नीलामी को दोबारा शुरू करने का आधार नहीं बनाया जा सकता
जोधपुर: ई-नीलामी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट से JSW सीमेंट को बड़ा झटका लगा है। नागौर के किशनपुरा लाइमस्टोन ब्लॉक की ई-नीलामी को चुनौती देने वाली कंपनी की याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने माना कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि उसकी 40.10 प्रतिशत की संशोधित बोली जमा नहीं हो पाने की वजह एमएसटीसी के ई-ऑक्शन प्लेटफॉर्म की तकनीकी खराबी थी।
हाईकोर्ट के मुताबिक, बोली जमा करने में आई परेशानी कंपनी की तरफ नेटवर्क से जुड़ी थी। ऐसे में नीलामी को दोबारा शुरू कराने की मांग भी मंजूर नहीं की जा सकती।
दरअसल कंपनी ने दावा किया था कि नीलामी के आखिरी दौर में एमएसटीसी के पोर्टल में तकनीकी गड़बड़ी के कारण उसकी 40.10 प्रतिशत की बोली जमा नहीं हो पाई।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि गड़बड़ी एमएसटीसी के पोर्टल में थी। जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने जेएसडब्ल्यू की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और तकनीकी जांच से परेशानी कंपनी की तरफ नेटवर्क में आई दिक्कत से जुड़ी नजर आती है। ऐसे में नीलामी को दोबारा शुरू करने का कोई आधार नहीं बनता।
Article 226 में दखल की सीमा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे पर जोर दिया।
कोर्ट ने Jagdish Mandal के सिद्धांतों को लागू करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि नीलामी में कोई arbitrariness, mala fide, bias या irrationality थी अथवा तकनीकी बाधा MSTC के प्लेटफॉर्म की खराबी के कारण हुई थी।
इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप का पहला परीक्षण ही JSW के खिलाफ गया।
कोर्ट ने यह भी माना कि concluded auction को केवल इस आधार पर नहीं खोला जा सकता कि कोई असफल बोलीदाता बाद में अधिक बोली लगाने की इच्छा जताता है।
सार्वजनिक नीलामी में प्रक्रिया की निश्चितता और अंतिमता भी महत्वपूर्ण
आखिरी मिनट में अटकी JSW की बोली
मामला नागौर जिले के किशनपुरा लाइमस्टोन ब्लॉक की नीलामी का है। यह ब्लॉक भदाना, देह और जिंदास गांवों के पास है।
10 दिसंबर 2025 को इसकी ई-नीलामी हुई थी। जेएसडब्ल्यू ने 40 प्रतिशत तक बोली लगाई। इसके बाद जेके सीमेंट ने 40.05 प्रतिशत की बोली लगा दी।
नियम के मुताबिक आखिरी 8 मिनट में नई बोली आने पर नीलामी का समय बढ़ जाता था।
इसी दौरान जेएसडब्ल्यू ने 40.10 प्रतिशत की नई बोली लगाने की कोशिश की।
कंपनी का कहना था कि इसी समय पोर्टल पर दिक्कत आ गई। उसकी बोली आगे नहीं बढ़ सकी और वह रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई।
जेएसडब्ल्यू ने तुरंत एमएसटीसी को शिकायत दी। कंपनी ने स्क्रीनशॉट, वीडियो और दूसरे रिकॉर्ड भी सौंपे।
लेकिन एमएसटीसी की जांच में पोर्टल में कोई खराबी नहीं मिली।
इसके बाद 17 दिसंबर 2025 को जेके सीमेंट को 40.05 प्रतिशत की बोली के आधार पर पसंदीदा बोलीदाता घोषित कर दिया गया।
खोली JSW के दावे की पोल
जेएसडब्ल्यू का कहना था कि उसकी तरफ इंटरनेट कनेक्शन ठीक था। कंपनी ने बताया कि उसका नेटवर्क दो इंटरनेट सर्विस कंपनियों के जरिए चलता है।
कंपनी के मुताबिक, लोड बैलेंसिंग की वजह से आईपी पता बदल सकता है। उसके इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की रिपोर्ट में भी उस समय नेटवर्क चालू रहने की बात कही गई थी।
लेकिन एमएसटीसी की तकनीकी रिपोर्ट में अलग बात सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, जेएसडब्ल्यू ने नीलामी के आखिरी दौर में कई बार लॉगिन करने की कोशिश की थी।
यूजर आईडी और पासवर्ड से जुड़ा पहला चरण पूरा हो गया था। दिक्कत डिजिटल सिग्नेचर की पुष्टि वाले दूसरे चरण में आई।
तकनीकी रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल सिग्नेचर की पुष्टि 19:40:42 बजे हुई। तब तक बोली लगाने का समय खत्म हो चुका था।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि उसी दौरान जेएसडब्ल्यू के आईपी पते में बार-बार बदलाव हुआ।
तकनीकी समिति के मुताबिक, इसकी वजह से डिजिटल सिग्नेचर करते समय नेटवर्क कनेक्शन टूट सकता था।
दूसरी नीलामियों में नहीं आई ऐसी दिक्कत
हाईकोर्ट के सामने एक और अहम बात आई। जिस समय जेएसडब्ल्यू को बोली जमा करने में परेशानी हुई, उसी समय एमएसटीसी के पोर्टल पर दूसरी नीलामियां भी चल रही थीं।
इन नीलामियों में ऐसी तकनीकी खराबी की कोई शिकायत नहीं आई।
एमएसटीसी का कहना था कि अगर पोर्टल में ही खराबी होती, तो दूसरी नीलामियां भी प्रभावित होतीं।
तकनीकी टीम ने बाद में इस स्थिति की अलग से जांच भी की।
जांच में सामने आया कि जेएसडब्ल्यू की तरफ नेटवर्क में दिक्कत होने पर ऐसी ही समस्या आ सकती थी।
हाईकोर्ट ने इन सभी बातों को ध्यान में रखा।
हाीकोर्ट ने माना कि जेएसडब्ल्यू को बोली जमा करने में परेशानी हुई थी, लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि इसकी वजह एमएसटीसी के पोर्टल की तकनीकी खराबी थी।
टेंडर की शर्त भी JSW के खिलाफ गई
फैसले में टेंडर की एक शर्त भी अहम रही। धारा 1.12 में साफ कहा गया था कि इंटरनेट, बिजली, कंप्यूटर या दूसरी तकनीकी दिक्कत की जिम्मेदारी बोली लगाने वाली कंपनी की होगी।
यानी अगर कंपनी के अपने सिस्टम में परेशानी की वजह से बोली जमा नहीं हो पाती है, तो इसके लिए एमएसटीसी या सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जेएसडब्ल्यू इस शर्त को जानते हुए नीलामी में शामिल हुई थी। जब तकनीकी जांच में भी नेटवर्क की दिक्कत कंपनी की तरफ से जुड़ी मिली, तो इसकी जिम्मेदारी एमएसटीसी पर नहीं डाली जा सकती।
550 करोड़ के नुकसान का दावा खारिज
जेएसडब्ल्यू ने हाईकोर्ट से नीलामी फिर शुरू करने की मांग की थी।
कंपनी का कहना था कि अगर उसे दोबारा बोली लगाने का मौका मिले तो वह 50 प्रतिशत तक बोली लगा सकती है।
कंपनी ने कहा कि 40.05 प्रतिशत की बोली पर नीलामी खत्म होने से सरकारी खजाने को करीब 550 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस दावे को पक्का नुकसान नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि 550 करोड़ रुपए का हिसाब कई अनुमानों पर आधारित है।
इसमें पूरे खनिज भंडार के निकलने और लंबे समय तक कीमत एक जैसी रहने जैसी बातें मानकर हिसाब लगाया गया है।
इसलिए इसे सरकार का तय नुकसान नहीं माना जा सकता।
नीलामी दोबारा कराने की मांग भी ठुकराई
हाईकोर्ट ने कहा कि नीलामी में किसी तरह की मनमानी, पक्षपात या गलत काम साबित नहीं हुआ है।
जेएसडब्ल्यू यह भी नहीं दिखा सकी कि नीलामी दोबारा कराने का उसका कोई कानूनी अधिकार है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि सिर्फ इसलिए नीलामी दोबारा नहीं कराई जा सकती कि हारने वाला बोलीदाता बाद में ज्यादा रकम देने की बात कह रहा है।
जब नीलामी पूरी हो चुकी हो और उसमें कोई बड़ी गड़बड़ी साबित न हुई हो, तो उसे दोबारा कराने के लिए ठोस वजह जरूरी है।
इस मामले में जेएसडब्ल्यू ऐसी कोई वजह साबित नहीं कर सकी।
हाईकोर्ट ने की याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि जेएसडब्ल्यू की 40.10 प्रतिशत की बोली जमा नहीं हो पाने की परेशानी को एमएसटीसी के पोर्टल की खराबी से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है।
हईकोर्ट ने यह भी कहा कि नीलामी दोबारा शुरू कराने के लिए जेएसडब्ल्यू के पक्ष में ऐसा कोई कानूनी हक नहीं बनता, जिसके आधार पर कोर्ट दोबारा नीलामी का आदेश दे सके।
इसी आधार पर जस्टिस संजीत पुरोहित ने जेएसडब्ल्यू सीमेंट की याचिका खारिज कर दी।
स्टे आवेदन समेत सभी लंबित आवेदन भी निपटा दिए गए