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सरकारी मेडिकल रिपोर्ट पर भरोसे की दलील खारिज! AIIMS जोधपुर की रिपोर्ट बनी निर्णायक, 70% दिव्यांग अभ्यर्थी को नौकरी देने का आदेश बरकरार

Rajasthan High Court Says Probation Cannot Bar Transfer, Orders Junior Assistant to Join New Posting Immediately
राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सरकार चाहती थी अपनी जांच रिपोर्ट को मिले प्राथमिकता, लेकिन AIIMS के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को चुनौती नहीं दिए जाने को कोर्ट ने माना अहम; कंपाउंडर/नर्स जूनियर ग्रेड पद पर नियुक्ति के खिलाफ राज्य की अपील खारिज

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने दिव्यांग अभ्यर्थी की नियुक्ति के मामले में राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है।

सरकार ने दलील दी थी कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता के संबंध में राज्य के अधिकारियों द्वारा की गई चिकित्सकीय जांच रिपोर्ट को अंतिम माना जाना चाहिए और AIIMS जोधपुर के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर नियुक्ति का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए।

लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य की दलील स्वीकार नहीं की और AIIMS जोधपुर के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को निर्णायक महत्व देते हुए अभ्यर्थी मुकेश कुमार मीणा को कंपाउंडर/नर्स जूनियर ग्रेड के पद पर नियुक्ति देने का एकलपीठ का आदेश बरकरार रखा।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि AIIMS के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को राज्य सरकार ने चुनौती नहीं दी थी और न ही उन्हें झूठा या जाली पाया गया।

ऐसे में एकलपीठ ने इन रिपोर्टों पर भरोसा करके नियुक्ति का आदेश दिया, तो उसमें कोई गलती नहीं थी।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर पेश की गई दलील को भी मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में लागू नहीं माना।

इसके साथ ही खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी।

सरकार ने कहा-राज्य की जांच रिपोर्ट को मिलना चाहिए महत्व

मामले में सबसे अहम विवाद अभ्यर्थी की दिव्यांगता के आकलन को लेकर था।

राज्य सरकार ने अभ्यर्थी को दोनों पैरों में दिव्यांगता होने के आधार पर नियुक्ति के लिए अपात्र माना था।

इसके विपरीत, AIIMS जोधपुर के मेडिकल बोर्ड ने दो बार जांच के बाद स्पष्ट किया कि अभ्यर्थी के बाएं पैर में 70 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता है, जबकि दाएं पैर में किसी प्रकार की दिव्यांगता नहीं है।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.एस. राजपुरोहित ने दलील दी कि राज्य के अधिकारियों द्वारा की गई चिकित्सकीय जांच की रिपोर्ट को अंतिम माना जाना चाहिए।

उनके अनुसार, अभ्यर्थी की दिव्यांगता का निर्धारण करने के लिए किसी अन्य रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

सरकार ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के State of Uttar Pradesh and Others v. Ravindra Kumar Sharma and Others, (2016) 4 SCC 791 के फैसले का हवाला भी दिया और हाईकोर्ट से एकलपीठ का आदेश निरस्त करने की मांग की।

हालांकि, राज्य सरकार की ओर से यह भी स्वीकार किया गया कि AIIMS के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को चुनौती नहीं दी गई थी और रिट याचिका पर फैसला करते समय उन रिपोर्टों पर कोई संदेह भी नहीं जताया गया था।

AIIMS की रिपोर्ट में खुलासा-एक पैर में 70% दिव्यांगता, दूसरा पूरी तरह सामान्य

मामला कोटा जिले के सांगोद निवासी मुकेश कुमार मीणा से जुड़ा है। मुकेश मीणा ने आयुर्वेद विभाग में कंपाउंडर/नर्स जूनियर ग्रेड पद की चयन प्रक्रिया में भाग लिया था और उसका चयन भी हो गया था। लेकिन 8 सितंबर 2025 को उसकी अभ्यर्थिता रद्द कर दी गई।

भर्ती विज्ञापन की शर्त के अनुसार, एक पैर में 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थी इस पद के लिए पात्र थे।

मुकेश कुमार मीणा ने बाएं पैर में 50 प्रतिशत दिव्यांगता का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था।

इसके बावजूद राज्य के अधिकारियों ने दोबारा जांच में उनकी दिव्यांगता दोनों पैरों में होने का निष्कर्ष निकाला और मुकेश मीणा को अपात्र कर दिया।

अभ्यर्थी ने इस कार्रवाई को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सुनवाई के दौरान AIIMS जोधपुर के मेडिकल बोर्ड से चिकित्सकीय परीक्षण कराने के आदेश दिए गए।

मेडिकल बोर्ड ने 2 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में बताया कि अभ्यर्थी के बाएं पैर में 70 प्रतिशत स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता है और दाएं पैर में कोई दिव्यांगता नहीं है।

इसके बाद दोबारा कराए गए परीक्षण की रिपोर्ट में भी यही निष्कर्ष सामने आया। दूसरी रिपोर्ट में मेडिकल बोर्ड ने 12 जनवरी 2026 की तारीख दर्ज की।

रिपोर्ट में बाएं पैर की दिव्यांगता का कारण पोस्ट-पोलियो रेजिडुअल पैरालिसिस बताया गया। मेडिकल बोर्ड ने केंद्र सरकार के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार दिव्यांगता का आकलन किया।

एकलपीठ ने दिया था नियुक्ति का आदेश

AIIMS जोधपुर के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 29 जनवरी 2026 को मुकेश कुमार मीणा की रिट याचिका स्वीकार कर ली थी।

एकलपीठ ने राज्य सरकार को मुकेश मीणा को कंपाउंडर/नर्स जूनियर ग्रेड पद पर नियुक्ति देने के आदेश दिए।

एकलपीठ ने पाया कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता केवल बाएं पैर में है और वह विज्ञापन में निर्धारित पात्रता की शर्त पूरी करता है। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए खंडपीठ के समक्ष विशेष अपील दायर की।

अपील में राजस्थान सरकार के साथ आयुर्वेद एवं भारतीय चिकित्सा विभाग के सचिव, आयुर्वेद विभाग के निदेशक, अतिरिक्त निदेशक, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय, AIIMS जोधपुर और मथुरादास माथुर अस्पताल से जुड़े अधिकारियों को अपीलकर्ता बनाया गया था।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी-रिपोर्टों को झूठा या जाली नहीं पाया गया

खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद AIIMS के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को महत्वपूर्ण माना।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों से स्पष्ट है कि अभ्यर्थी की दिव्यांगता केवल बाएं पैर में 70 प्रतिशत है और दाएं पैर में किसी प्रकार की दिव्यांगता नहीं है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि इन रिपोर्टों को चुनौती नहीं दी गई थी और उन्हें झूठा या जाली भी नहीं पाया गया।

इन्हीं परिस्थितियों में खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को ध्यान में रखकर अभ्यर्थी की नियुक्ति के पक्ष में आदेश देकर सही निर्णय लिया था।

फैसले का निर्णायक पहलू यह रहा कि राज्य सरकार AIIMS के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को चुनौती देने या उन्हें गलत साबित करने में सफल नहीं हुई।

इसलिए केवल राज्य की जांच रिपोर्ट को अंतिम मानने की दलील के आधार पर एकलपीठ के आदेश को निरस्त करने का कोई आधार नहीं मिला।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी सरकार को राहत नहीं दिला सका

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के State of Uttar Pradesh v. Ravindra Kumar Sharma मामले का हवाला देकर अपनी दलील को मजबूत करने का प्रयास किया।

लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि राज्य की ओर से जिस फैसले पर भरोसा किया गया, वह मौजूदा मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में लागू नहीं होता।

अदालत ने वर्तमान मामले में भर्ती विज्ञापन की पात्रता शर्त, AIIMS के मेडिकल बोर्ड की दोनों रिपोर्टों और उन रिपोर्टों को चुनौती नहीं दिए जाने के तथ्य को महत्वपूर्ण माना।

इसके बाद खंडपीठ ने राज्य सरकार की दलीलें स्वीकार नहीं कीं और एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

112 दिन की देरी माफ, लेकिन अपील में नहीं मिली राहत

राज्य सरकार ने विशेष अपील दायर करने में 112 दिन की देरी की थी। इस देरी को माफ कराने के लिए परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया।

अभ्यर्थी की ओर से इस आवेदन का विरोध नहीं किया गया। खंडपीठ ने आवेदन में बताए गए कारणों को स्वीकार करते हुए देरी माफ कर दी और इसके बाद अपील के गुण-दोष पर सुनवाई की।

हालांकि, देरी माफ होने के बावजूद राज्य सरकार को मामले के मूल मुद्दे पर राहत नहीं मिली। खंडपीठ ने विशेष अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

चयन प्रक्रिया पूरी करने वाले अभ्यर्थी की नियुक्ति का आदेश बरकरार

हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि मुकेश कुमार मीणा विभाग की चयन प्रक्रिया पूरी कर चुके थे।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों के अनुसार, उनकी दिव्यांगता भर्ती विज्ञापन में निर्धारित पात्रता शर्त के अनुरूप थी।

खंडपीठ ने एकलपीठ के 29 जनवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी।

इस तरह अभ्यर्थी को कंपाउंडर/नर्स जूनियर ग्रेड पद पर नियुक्ति देने का निर्देश प्रभावी बना हुआ है।

मामले में कौन-कौन हुए पेश?

राजस्थान सरकार एवं अन्य अपीलकर्ताओं की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.एस. राजपुरोहित उपस्थित हुए। वहीं, अभ्यर्थी मुकेश कुमार मीणा की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलरी ने पक्ष रखा।

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