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देशभर के लाखों मजदूरों के पक्ष में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- दैनिक मजदूर की आय की गणना 30 दिन के आधार पर, 26 दिन का फार्मूला खारिज! बेलदार अकुशल श्रमिक

Rajasthan High Court Rules Daily Wage Income Must Be Calculated for 30 Days; Beldar Classified as Unskilled Worker

मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण आदेश; लेबर मंत्रालय को नोटिफिकेशन संशोधित करने के आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने मोटर दुर्घटना मुआवजा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के लाखों दैनिक वेतनभोगी मजदूरों पर पड़ सकता है।

हाईकोर्ट ने इस रिपोर्टेबल जजमेंट में विस्तृत सुनवाई के बाद ऐसा निर्णय दिया है, जिसमें एक ओर ‘बेलदार’ की श्रेणी को स्पष्ट किया, वहीं दूसरी ओर दैनिक वेतनभोगी मजदूरों की आय की गणना को लेकर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया गया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘बेलदार’ (Beldar) को कुशल (Skilled) नहीं बल्कि अकुशल (Unskilled) श्रमिक की श्रेणी में ही माना जाएगा।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि दैनिक मजदूरों की मासिक आय की गणना 26 दिनों के बजाय 30 दिनों के आधार पर की जानी चाहिए।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने लक्ष्मण कुमावत की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

मोटरसाइकिल से टक्कर

ब्यावर निवासी अपीलकर्ता लक्ष्मण कुमावत 27 अगस्त 2020 को मोटरसाइकिल चला रहे थे, तभी सामने से आए वाहन ने टक्कर मार दी। हादसे में उन्हें गंभीर और साधारण दोनों प्रकार की चोटें आईं, उनके पैर का ऑपरेशन हुआ और उन्हें 13% स्थायी विकलांगता (Permanent Disability) हुई।

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), ब्यावर ने उनके दावे पर 15 फरवरी 2024 को फैसला देते हुए उन्हें 2,87,625 रुपये का मुआवजा दिया।

लेकिन अपीलकर्ता का कहना था कि मुआवजा कम आंका गया है और आय गणना में गंभीर त्रुटि की गई है।

एमएसीटी कोर्ट के इस आदेश को लक्ष्मण कुमावत ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए अपील दायर की।

अपील में मुख्य कानूनी बिंदु

राजस्थान हाईकोर्ट में दायर अपील में सुनवाई के दौरान दो मुख्य कानूनी बिंदु रखे गए, जिसमें—

क्या ‘बेलदार’ का कार्य कुशल श्रमिक की श्रेणी में आता है या अकुशल श्रमिक में?

क्या दैनिक मजदूर की मासिक आय 26 दिन के आधार पर जोड़ी जानी चाहिए या 30 दिन के आधार पर?

अपीलकर्ता की दलीलें

अपीलकर्ता लक्ष्मण कुमावत की ओर से तर्क दिया गया कि वे बेलदार के रूप में कार्यरत थे और इस कार्य को कुशल श्रमिक माना जाना चाहिए।

अपीलकर्ता के अधिवक्ता का कहना था कि उनका कार्य शारीरिक श्रम के साथ तकनीकी समझ भी मांगता है, इसलिए उन्हें कुशल (Skilled) श्रमिक की श्रेणी में रखा जाना चाहिए था।

ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें अकुशल श्रमिक मानकर न्यूनतम मजदूरी तय करना गलत है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने मासिक आय की गणना 26 दिन के आधार पर की, जबकि दैनिक मजदूर वास्तव में 30 दिन काम करते हैं।

दैनिक वेतनभोगी मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश का वेतन नहीं मिलता। यदि वे काम नहीं करेंगे तो उन्हें भुगतान नहीं मिलेगा। इसलिए यह मान लेना कि वे हर सप्ताह एक दिन अवकाश लेते हैं, वास्तविकता के विपरीत है।

याचिकाकर्ता ने 13% स्थायी विकलांगता के कारण भविष्य में आय में कमी का तर्क दिया और अधिक मुआवजे की मांग की।

बीमा कंपनी की दलीलें

बीमा कंपनी ने कहा कि बेलदार का कार्य अकुशल श्रमिक की श्रेणी में आता है। श्रम विभाग की अधिसूचनाओं में बेलदार को अकुशल श्रमिक की सूची में शामिल किया गया है।

बीमा कंपनी ने दलील दी कि न्यूनतम मजदूरी अधिसूचनाओं के अनुसार मासिक आय 26 कार्य दिवसों के आधार पर जोड़ी जाती है।

यह नियम साप्ताहिक अवकाश को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा 26 दिन का आधार अपनाना उचित था।

बीमा कंपनी ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने सभी मदों—चिकित्सा व्यय, दर्द एवं पीड़ा, विशेष देखभाल—को ध्यान में रखते हुए उचित मुआवजा दिया है। इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

बीमा कंपनी ने कहा कि अधिसूचना के पार्ट-III (Classification of Workers) में ‘बेलदार’ को स्पष्ट रूप से अकुशल श्रमिकों की सूची में शामिल किया गया है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की अधिसूचनाओं के आधार पर कहा कि अधिसूचना में ‘बेलदार’ को स्पष्ट रूप से अकुशल श्रमिकों की श्रेणी में रखा गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि कुशल श्रमिक वह होता है जिसके पास विशेष तकनीकी प्रशिक्षण या योग्यता हो। बेलदार के कार्य में ऐसी तकनीकी योग्यता आवश्यक नहीं है। इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा बेलदार को अकुशल श्रमिक मानना सही है।

हाईकोर्ट ने दूसरे कानूनी बिंदु पर कहा कि ट्रिब्यूनल ने मासिक आय की गणना 26 दिन के आधार पर की थी।

कोर्ट ने इस तथाकथित “26-दिवसीय नियम” की समीक्षा करते हुए कहा कि 26 दिन का नियम साप्ताहिक अवकाश की धारणा पर आधारित है।

कोर्ट ने कहा कि लेकिन वास्तविकता में दैनिक मजदूरों को अवकाश का वेतन नहीं मिलता और वे केवल उतने दिन की मजदूरी पाते हैं जितने दिन काम करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि

अधिकांश दैनिक मजदूर “हाथ से मुंह तक” की स्थिति में जीवनयापन करते हैं, इसलिए यह मान लेना कि हर दैनिक मजदूर सप्ताह में एक दिन अवकाश लेता है, व्यावहारिक नहीं है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा:

“दैनिक वेतनभोगी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 30 दिनों के आधार पर जोड़ी जानी चाहिए, न कि 26 दिनों के आधार पर।”

हाईकोर्ट ने इस आधार पर 252 रुपये प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर 30 दिन की मासिक आय 7,560 रुपये निर्धारित की।

इसके साथ ही 40% भविष्यगत आय जोड़कर 15 का गुणांक (Multiplier) और 13% विकलांगता के आधार पर आय हानि सहित कुल मुआवजा 3,20,665.60 रुपये निर्धारित किया।

चूंकि ट्रिब्यूनल ने 2,87,625 रुपये पहले ही दिए थे, इसलिए हाईकोर्ट ने 33,040.60 रुपये अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को दो माह में अतिरिक्त राशि 6% वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया।

इसके साथ ही श्रम मंत्रालय और राजस्थान श्रम विभाग को अधिसूचना संशोधन पर विचार करने हेतु आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए गए।

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