लार्सन एंड टुब्रो को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, विलय हो चुकी LTHE कंपनी के नाम पर जारी जीएसटी आदेश नई कंपनी के रजिस्ट्रेशन पर जारी करने के आदेश
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने जीएसटी कानून और कॉर्पोरेट विलय से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद में दूरगामी प्रभाव वाला रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि जिस कंपनी का विधिवत विलय हो चुका हो और जो कानूनन अस्तित्व में न रही हो, उसके नाम पर पारित कर आदेश अधिकार-क्षेत्र की गंभीर त्रुटि हैं और टिकाऊ नहीं हो सकते।
यानी विलय हो चुकी कंपनी के बाद उसके पुराने जीएसटी रजिस्ट्रेशन पर आदेश पारित नहीं होंगे।
साथ ही, हाईकोर्ट ने एक व्यावहारिक समाधान देते हुए यह सिद्धांत स्थापित किया कि विलय की सूचना विभाग को मिलते ही पुराने जीएसटी नंबर को उस प्रभावी तिथि से ‘डिम्ड कैंसिल’ (Deemed Cancelled) माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने इसके साथ विलय हो चुकी कंपनी के जीएसटी नंबर पर जारी किए गए टैक्स डिमांड को नई कंपनी के वैध जीएसटी नंबर पर एक माह में अपलोड करने का आदेश दिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने Larsen And Toubro Ltd. की ओर से दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया है।
ये है मामला
लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (एलएंडटी) की हाइड्रोकार्बन डिवीजन कंपनी L&T Hydrocarbon Engineering Ltd. (LTHE) का नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई द्वारा 28 जनवरी 2022 को स्वीकृत स्कीम ऑफ अमलगमेशन के तहत विलय कर दिया गया।
यह विलय 1 अप्रैल 2021 से प्रभावी माना गया।
लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड ने विलय की सूचना जीएसटी प्राधिकरणों को दे दी।
इसके बावजूद 8 दिसंबर 2023 और 06 अगस्त 2024 को GST DRC-07 के तहत विभाग ने कर निर्धारण/मांग संबंधी आदेश LTHE के नाम से पारित कर दिए।
कंपनी की दलीलें
लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि 1 अप्रैल 2021 से LTHE का विधिक अस्तित्व समाप्त हो चुका था, अतः उसके नाम पर आदेश पारित करना शून्य है।
कंपनी की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के Principal Commissioner of Income Tax vs. Maruti Suzuki (India) Limited (2020) 18 SCC 331 फैसले के अनुसार, गैर-मौजूद इकाई के नाम पर पारित आदेश ‘जुरिस्डिक्शनल डिफेक्ट’ हैं, जिन्हें बाद में सुधारा नहीं जा सकता।
कंपनी ने कहा कि यदि विभाग को कर निर्धारण करना था तो उसे नई, अस्तित्वमान कंपनी के वैध जीएसटी नंबर पर करना चाहिए था।
CGST अधिनियम की धारा 75(3) के तहत राजस्व को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी; विभाग नए सिरे से वैधानिक प्रक्रिया अपनाकर आदेश पारित कर सकता है।
कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि विलय की सूचना के बावजूद पुराने नाम पर आदेश पारित करना न केवल तकनीकी त्रुटि है, बल्कि न्यायसंगत प्रशासनिक आचरण के विपरीत है।
GST Council का जवाब
मामले में केंद्रीय राजस्व विभाग और GST Council की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि पुराना जीएसटी नंबर निरस्त नहीं हुआ था, इसलिए आदेश वैध हैं।
विभाग ने कहा कि LTHE का जीएसटी रजिस्ट्रेशन विधिवत निरस्त नहीं हुआ था; अतः उपलब्ध रजिस्ट्रेशन संख्या पर आदेश पारित किया गया।
विभाग ने कहा कि CGST अधिनियम की धारा 28 (पंजीकरण में संशोधन) और धारा 29 (निरस्तीकरण/निलंबन) स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करती हैं।
विभाग ने कहा कि रजिस्ट्रेशन निरस्तीकरण की पहल पंजीकृत व्यक्ति द्वारा की जानी चाहिए थी; जब तक ऐसा न हो, विभाग उपलब्ध जीएसटी नंबर पर ही कार्य करेगा।
राजस्व का तर्क था कि विभाग ने विधि के अनुरूप कार्य किया है और कोई दुर्भावना नहीं है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले में महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु तय करते हुए कहा कि सामान्यतः आदेश उसी जीएसटी नंबर पर अपलोड होते हैं, जिस पर पंजीकरण है। किंतु यह सिद्धांत तब लागू होगा, जब वह इकाई विधिक रूप से अस्तित्व में हो। यदि विभाग को यह सूचना मिल चुकी है कि कंपनी का विलय हो चुका है और वह अस्तित्वहीन हो गई है, तो उसके नाम पर आदेश पारित करना स्वीकार्य नहीं है।
अर्थात, जब कंपनी अस्तित्व खो देती है, तो उसका पंजीकरण भी उसी तिथि से निरस्त समझा जाएगा, भले ही औपचारिक निरस्तीकरण आदेश लंबित हो।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थापित विधिक सिद्धांत के अनुसार गैर-मौजूद इकाई के नाम पर आदेश नहीं टिक सकते।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने इसे अधिकार-क्षेत्र की मूल त्रुटि माना।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर मांग स्वतः समाप्त नहीं होगी। यदि पुराने जीएसटी नंबर से संबंधित कोई मांग है, तो उसे नई कंपनी के वैध जीएसटी नंबर पर अपलोड किया जा सकता है और नई कंपनी विधि अनुसार उसका प्रतिवाद/अपील कर सकती है।
जीएसटी कानून में teething issues
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जीएसटी कानून को लेकर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि:
“हम यह समझते हैं कि जीएसटी कानून, जो वर्ष 2017 में हाल ही में लागू हुआ है, उसमें कुछ प्रारंभिक व्यावहारिक कठिनाइयाँ (teething issues) हो सकती हैं।”
हाईकोर्ट ने कहा कि इसलिए वह उपर्युक्त आदेश पारित करते हुए एक “डिमिंग क्लॉज” लागू कर रहा है, जिसके तहत ऐसी स्थितियों में, जहाँ कोई कंपनी अस्तित्वहीन हो चुकी है और किसी अन्य कंपनी में विलय हो गई है, उसके जीएसटी पंजीकरण को निरस्त माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जीएसटी नंबर आवंटित हो जाने के बाद सभी आदेश उसी नंबर पर पोर्टल पर अपलोड किए जाने चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि जब विभाग को यह जानकारी दे दी गई है कि पूर्ववर्ती जीएसटी नंबर वाली कंपनी किसी अन्य कंपनी में विलय हो चुकी है और उसका अलग जीएसटी पंजीकरण नंबर है, तब जीएसटी अधिनियम में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए थी कि पूर्व जीएसटी नंबर स्वतः निरस्त (ऑटोमेटिक कैंसिल) माना जाए, क्योंकि यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि किसी गैर-मौजूद इकाई के नाम पर आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
लेकिन कर डिमांड नहीं होगी समाप्त
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस इकाई का अस्तित्व समाप्त हो चुका है और याचिकाकर्ता कंपनी में विलय हो गई है, उस गैर-मौजूद इकाई को आवंटित जीएसटी नंबर उक्त तिथि से निरस्त माना जाएगा।
अन्य शब्दों में, जैसे ही विभाग को यह सूचना प्राप्त होती है कि कोई कंपनी अस्तित्वहीन हो गई है और किसी अन्य कंपनी में विलय हो चुकी है, उस स्थिति में नई कंपनी का जीएसटी नंबर प्रभावी हो जाएगा और पूर्व का जीएसटी नंबर निरस्त माना जाएगा।
कोर्ट ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि पूर्व जीएसटी नंबर से संबंधित कोई मांग (कर डिमांड) लंबित है, तो उसे नई कंपनी के जीएसटी नंबर पर अपलोड किया जा सकता है और नई कंपनी को विधि के अनुसार उन मांगों का सामना करना होगा।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने राजस्व विभाग को आदेश दिया है कि एक माह के भीतर संबंधित आदेश याचिकाकर्ता के नए जीएसटी नंबर पर अपलोड करे।
साथ ही उस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता को सभी वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता होगी।
