टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

निर्दोष पक्षकार को वकील की गलती की सजा नहीं दी जा सकती, प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं से ऊपर है वास्तविक न्याय: हाईकोर्ट ने 25 बीघा जमीन के विवाद में एकतरफा फैसला किया रद्द

Rajasthan High Court Sets Aside Ex-Parte Decree Against 70-Year-Old Woman After Her Advocate’s Death

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 70 वर्षीय महिला को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ पारित एकतरफा निर्णय और डिक्री को रद्द कर दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई पक्षकार वर्षों तक मुकदमा लड़ता रहा हो और उसकी गैरहाजिरी उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई हो, तो उसे केवल प्रक्रियात्मक तकनीकी आधार पर न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि जब कोई पक्षकार अपना मुकदमा अधिवक्ता को सौंप चुका हो, तो सामान्य परिस्थितियों में उसे अधिवक्ता की गलती, चूक या लापरवाही का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला बलजीत कौर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि प्रक्रियात्मक कानून का उद्देश्य पक्षकार को न्याय से वंचित करना नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को सुचारु बनाना है।

यदि कोई पक्षकार मुकदमा लड़ने के लिए अधिवक्ता नियुक्त कर चुका है और उसकी गैरहाजिरी उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति के कारण हुई है, तो केवल अधिवक्ता की चूक के कारण उसे गंभीर संपत्ति अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

पर्याप्त कारण स्थापित होने पर एकतरफा डिक्री हटाकर मामले का फैसला दोनों पक्षों को सुनने के बाद गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने मुकदमे को छोड़ा नहीं था, बल्कि कई वर्षों तक उसका बचाव किया था।

कोर्ट ने कहा कि उसकी 19 जुलाई 2024 की गैरहाजिरी उसके अधिवक्ता की मृत्यु के कारण हुई और एकतरफा डिक्री के केवल नौ दिन के भीतर उसने उसे हटाने के लिए आवेदन कर दिया था।

25 बीघा कृषि भूमि से जुड़ा था विवाद

मामला श्रीगंगानगर जिले के घड़साना क्षेत्र की करीब 25 बीघा यानी 6.325 हेक्टेयर कृषि भूमि से जुड़ा था।

वर्ष 2013 में गोदावरी देवी ने भूमि पर घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया था।

वादी का कहना था कि विवादित भूमि उनके दिवंगत पति बाबूराम को पोंग बांध विस्थापित व्यक्ति के रूप में स्थायी रूप से आवंटित हुई थी।

पति की मृत्यु के बाद वह और उनके तीन बच्चे प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिस बने।

आरोप लगाया गया कि उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाकर भूमि को अन्य व्यक्तियों के पक्ष में ट्रांसफर कर दिया गया।

वादी ने 4 अगस्त 1998 और 14 मई 2004 के पंजीकृत विक्रय पत्रों को शून्य और अवैध घोषित करने तथा प्रतिवादियों को भूमि के कब्जे और उपयोग में हस्तक्षेप से रोकने की मांग की थी।

सद्भावना से जमीन खरीदने वाली खरीदार

वर्तमान अपीलकर्ता बलजीत कौर ने मुकदमे में उपस्थित होकर लिखित बयान दाखिल किया था।

उनका कहना था कि उन्होंने भूमि मूल्य देकर सद्भावना से खरीदी, खरीद से पहले राजस्व रिकॉर्ड की जांच की और विक्रेताओं के स्वामित्व तथा कब्जे से संतुष्ट होने के बाद पंजीकृत विक्रय पत्र के जरिए जमीन खरीदी।

उन्होंने यह भी कहा कि वह भूमि पर वास्तविक और लगातार भौतिक कब्जे में थीं और इसलिए 4 अगस्त 1998 तथा 14 मई 2004 के विक्रय पत्र वैध और कानूनसम्मत थे।

निचली अदालत ने विवाद पर आठ मुद्दे तय किए थे। इनमें विक्रय पत्रों की वैधता से जुड़े मुद्दे पर प्रमाण का भार वादी पर था, जबकि सीमा, वाद के कारण और वादी के प्रथम श्रेणी के वारिस होने सहित कई मुद्दों का भार प्रतिवादियों पर था। मुकदमा वर्ष 2018 से वादी के साक्ष्य के चरण में लंबित था।

फिर हुई अधिवक्ता की मृत्यु और महिला हो गई एकतरफा

मुकदमे के दौरान बलजीत कौर की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता धरमपाल गोदारा का निधन हो गया।

19 जुलाई 2024 को जब मामला सुनवाई के लिए आया तो अपीलकर्ता, उनके अधिवक्ता और अन्य सह-प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद निचली अदालत ने प्रतिवादियों के खिलाफ मुकदमे को एकतरफा चलाने का आदेश दे दिया।

बाद में बलजीत कौर को अपने अधिवक्ता के निधन और मुकदमे की एकतरफा कार्यवाही की जानकारी मिली। उन्होंने नया अधिवक्ता नियुक्त किया और 19 जुलाई 2024 के आदेश को वापस लेने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 9 नियम 7 के तहत आवेदन पेश किया।

लेकिन 28 अक्टूबर 2024 को जब उस आवेदन पर जवाब दाखिल होना था, नए अधिवक्ता के उपस्थित नहीं होने के कारण निचली अदालत ने आवेदन को गुण-दोष पर सुनवाई किए बिना गैर-प्रस्तुति के कारण खारिज कर दिया।

29 जनवरी 2025 को एकतरफा डिक्री, विक्रय पत्र भी रद्द

इसके बाद वादी ने स्वयं बतौर एकमात्र गवाह बयान दिया।

उसके बयान का क्रॉस-परीक्षण नहीं हो सका और उसके दस्तावेजों को भी चुनौती नहीं दी गई।

प्रतिवादियों के पक्ष में प्रमाण का भार वाले मुद्दों को भी इस आधार पर उनके खिलाफ तय कर दिया गया कि उनकी ओर से कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया था।

नतीजतन 29 जनवरी 2025 को निचली अदालत ने एकतरफा निर्णय और डिक्री पारित करते हुए 4 अगस्त 1998 और 14 मई 2004 के विक्रय पत्रों को वादी के अधिकारों के विरुद्ध अवैध और निष्प्रभावी घोषित कर दिया तथा स्थायी निषेधाज्ञा भी जारी कर दी।

डिक्री के सिर्फ 9 दिन बाद हाईकोर्ट जाने की तैयारी

एकतरफा डिक्री के महज नौ दिन के भीतर, 7 फरवरी 2025 को बलजीत कौर ने आदेश 9 नियम 13 और धारा 151 सीपीसी के तहत आवेदन दाखिल कर एकतरफा डिक्री रद्द करने की मांग की।

हालांकि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, घड़साना ने 5 अगस्त 2026 को उनका आवेदन खारिज कर दिया।

निचली अदालत का मुख्य आधार यह था कि उनका पहले का आदेश 9 नियम 7 वाला आवेदन गैर-हाजिरी के कारण खारिज हो चुका था और उन्हें एकतरफा कार्यवाही की जानकारी थी, इसलिए उन्होंने पर्याप्त तत्परता नहीं दिखाई।

‘पर्याप्त कारण’ की व्याख्या न्यायोन्मुख होनी चाहिए

हाईकोर्ट ने आदेश 9 नियम 13 सीपीसी की विस्तृत व्याख्या की।

हाईकोर्ट ने कहा कि एकतरफा डिक्री को दो परिस्थितियों में हटाया जा सकता है—पहली, जब समन की विधिवत तामील न हुई हो और दूसरी, जब समन की तामील के बावजूद प्रतिवादी उस समय उपस्थित होने से ‘पर्याप्त कारण’ से रोका गया हो जब मुकदमा सुनवाई के लिए बुलाया गया।

इस मामले में समन की तामील और बलजीत कौर द्वारा वकील के माध्यम से मुकदमे में उपस्थित होकर लिखित बयान दाखिल करने को लेकर विवाद नहीं था।

इसलिए मुख्य सवाल यह था कि 19 जुलाई 2024 को उनकी गैरहाजिरी के पीछे पर्याप्त कारण था या नहीं।

पर्याप्त कारण का अलग मूल्यांकन जरूरी

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘पर्याप्त कारण’ को कठोर और संकीर्ण अर्थ में नहीं देखा जा सकता। इसका परीक्षण मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि प्रतिवादी वास्तव में सुनवाई में उपस्थित रहना चाहता था या नहीं और उसने उपस्थित रहने के लिए अपनी ओर से उचित प्रयास किया या नहीं।

यदि गैरहाजिरी ऐसी परिस्थितियों के कारण हुई है जो पक्षकार के नियंत्रण से बाहर थीं और उसके खिलाफ लापरवाही, निष्क्रियता या दुर्भावना नहीं कही जा सकती, तो ऐसी परिस्थिति एकतरफा डिक्री हटाने के लिए पर्याप्त कारण हो सकती है।

“पक्षकार को उसके वकील की गलती की सजा नहीं दी जा सकती”

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अधिवक्ता की गलती और पक्षकार के अधिकार से जुड़ा रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिकूल न्याय प्रणाली में पक्षकार सामान्यतः अपने मुकदमे की पैरवी के लिए अधिवक्ता नियुक्त करते हैं।

हर तारीख पर पक्षकार की व्यक्तिगत उपस्थिति न तो सामान्य रूप से आवश्यक है और न ही व्यावहारिक।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई पक्षकार अधिवक्ता नियुक्त कर अपने मामले की पैरवी उसके सुपुर्द कर देता है और अपनी ओर से उचित कदम उठा चुका है, तो सामान्यतः उसे अधिवक्ता की गलती, चूक या लापरवाही का नुकसान नहीं उठाना चाहिए।

70 वर्षीय ग्रामीण महिला का अपने वकील की मौत से अनजान रहना असंभव नहीं

जस्टिस संजीत पुरोहित ने मामले की सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया।

अदालत ने कहा कि यह न तो असामान्य है और न ही अविश्वसनीय कि किसी दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली बुजुर्ग महिला को अपने अधिवक्ता की मृत्यु या मुकदमे की रोजमर्रा की कार्यवाही की जानकारी समय पर न हो।

खासकर तब, जब वह इस भरोसे में हो कि उसने जिस अधिवक्ता को मुकदमा सौंपा है, वही कानूनी और प्रक्रियात्मक कार्यवाही देख रहा है।

अदालत ने इस आधार पर बलजीत कौर की 19 जुलाई 2024 की गैरहाजिरी के स्पष्टीकरण को “वास्तविक और सद्भावनापूर्ण” माना।

निचली अदालत ने आवेदन गुण-दोष पर सुना ही नहीं

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से 28 अक्टूबर 2024 की कार्यवाही पर सवाल उठाया।

उस दिन आदेश 9 नियम 7 के तहत आवेदन केवल जवाब दाखिल करने के लिए सूचीबद्ध था, लेकिन निचली अदालत ने आवेदन को गुण-दोष पर सुनने या अगली तारीख देने के बजाय गैर-प्रस्तुति के आधार पर सीधे खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने इसे अनावश्यक जल्दबाजी माना।

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदन में उठाए गए कारणों पर वास्तविक निर्णय ही नहीं हुआ था।

इसलिए केवल उस आवेदन के गैर-प्रस्तुति के कारण खारिज होने को बलजीत कौर के खिलाफ पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।

गैरहाजिरी का पर्याप्त कारण था या नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश 9 नियम 13 की कार्यवाही में मुख्य जांच उस तारीख पर केंद्रित होनी चाहिए जिस दिन प्रतिवादी की गैरहाजिरी के आधार पर मुकदमा एकतरफा चलाया गया।

इसलिए 19 जुलाई 2024 की गैरहाजिरी के लिए पर्याप्त कारण था या नहीं, यह मुख्य प्रश्न था।

बाद की परिस्थितियों को इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि उस मूल प्रश्न की जांच ही पीछे छूट जाए।

पुराने आचरण को आधार बनाकर एकतरफा डिक्री बचाई नहीं जा सकती

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जी.पी. श्रीवास्तव और ए. मुरुगेसन सहित फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि आदेश 9 नियम 13 के आवेदन में यह देखा जाना चाहिए कि जिस तारीख को मुकदमा एकतरफा हुआ, उस तारीख पर गैरहाजिरी का पर्याप्त कारण था या नहीं।

अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने बलजीत कौर के मामले में पहले के आदेश और बाद की घटनाओं को अधिक महत्व दिया, जबकि मूल प्रश्न 19 जुलाई 2024 की गैरहाजिरी का था।

प्रक्रियात्मक कानून न्याय में मदद के लिए है, सजा देने के लिए नहीं

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संग्राम सिंह फैसले का हवाला देते हुए कहा कि प्रक्रिया संबंधी कानून न्याय को आगे बढ़ाने और उसे सुविधाजनक बनाने के लिए है। इसे ऐसा दंडात्मक साधन नहीं बनाया जा सकता जिससे पक्षकार न्याय पाने से ही वंचित हो जाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश 9 नियम 13 का उद्देश्य पक्षकारों को प्रभावी सुनवाई का अवसर देकर मुकदमे का गुण-दोष के आधार पर निर्णय सुनिश्चित करना है। यह न्याय के मूल सिद्धांत—दोनों पक्षों को सुनने के अधिकार से जुड़ा हुआ है।

‘न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय को आगे बढ़ाना है, तकनीकी बाधा बनना नहीं’

फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रक्रियात्मक अंतिमता महत्वपूर्ण है, लेकिन जहां कानून के अनुसार किसी पक्ष को मुकदमा लड़ने का अवसर बहाल किया जा सकता है, वहां केवल प्रक्रिया की अंतिमता के कारण मामले की गुण-दोष पर सुनवाई का रास्ता बंद नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि आदेश 9 नियम 13 के तहत राहत देने का उद्देश्य ही यही है कि यदि पर्याप्त कारण मौजूद है तो पक्षकार को सुनवाई का प्रभावी अवसर मिले और विवाद का निर्णय दोनों पक्षों को सुनकर किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के ‘कंच्छू’ फैसले का हवाला भी हाईकोर्ट ने खारिज किया

प्रतिवादी पक्ष ने कंच्छू बनाम प्रकाश चंद फैसले का हवाला देते हुए बलजीत कौर में लापरवाही का तर्क दिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि कंच्छू मामले में प्रतिवादी एकतरफा होने से पहले भी लगातार अनुपस्थित रहे थे, बार-बार स्थगन मांगते रहे और अपनी लगातार गैर-भागीदारी का संतोषजनक कारण नहीं बता सके थे।

लेकिन वर्तमान मामले में स्थिति अलग थी। बलजीत कौर ने समन मिलने के बाद मुकदमे में उपस्थिति दर्ज कराई, लिखित बयान दाखिल किया और वर्षों तक मुकदमा लड़ा।

उनकी 19 जुलाई 2024 की गैरहाजिरी उनके अधिवक्ता की मृत्यु से जुड़ी थी और जानकारी मिलने के बाद उन्होंने एकतरफा कार्यवाही वापस लेने के लिए कदम उठाए।

इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि उनका आचरण उदासीनता नहीं बल्कि मुकदमे को लड़ने की वास्तविक इच्छा और सतर्कता को दर्शाता है।

एकतरफा ट्रायल से महिला के संपत्ति अधिकारों पर पड़ा गंभीर असर

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि एकतरफा कार्यवाही से बलजीत कौर को गंभीर नुकसान हुआ।

उनका पंजीकृत विक्रय पत्र 14 मई 2004 का था और वह खुद को भूमि की वास्तविक और लगातार कब्जाधारी बता रही थीं।

लेकिन एकतरफा कार्यवाही के कारण वादी का एकमात्र बयान बिना प्रतिपरीक्षण के रह गया और उसके दस्तावेजों को भी चुनौती नहीं दी जा सकी।

इसके अलावा जिन मुद्दों पर प्रमाण का भार प्रतिवादियों पर था, उन्हें केवल इसलिए उनके खिलाफ तय कर दिया गया क्योंकि उनकी ओर से साक्ष्य पेश नहीं हो सका।

कथित समझौते का दस्तावेज भी पेश नहीं कर पाईं बलजीत कौर

मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। बलजीत कौर की ओर से यह दावा किया गया कि वादी गोदावरी ने एक शपथयुक्त समझौता/हलफनामा किया था, जिसमें कथित तौर पर उन्होंने बलजीत कौर के पक्ष में बिक्री को स्वीकार किया था, बिक्री की राशि प्राप्त होने की बात मानी थी और उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाने पर सहमति जताई थी।

लेकिन एकतरफा कार्यवाही के कारण बलजीत कौर को इस दस्तावेज को रिकॉर्ड पर रखने और वादी से इस संबंध में क्रॉस-परीक्षण करने का अवसर नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में उन्हें मुकदमा लड़ने का अवसर नहीं देना अचल संपत्ति से जुड़े उनके मूल अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डालता है।

सह-प्रतिवादियों की हार से बलजीत कौर का स्वतंत्र अधिकार खत्म नहीं होता

प्रतिवादी पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि सह-प्रतिवादियों के खिलाफ एकतरफा डिक्री अंतिम हो चुकी है और इसलिए बलजीत कौर के मामले को अलग से नहीं खोला जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने कहा कि बलजीत कौर स्वतंत्र रूप से 14 मई 2004 के पंजीकृत विक्रय पत्र के आधार पर दावा करने वाली बाद की खरीदार थीं। उन्होंने अपने स्वतंत्र बचाव के साथ मुकदमा लड़ा था और भूमि पर लगातार वास्तविक कब्जे का दावा किया था।

इसलिए उनके विक्रेताओं द्वारा अपने उपायों का इस्तेमाल नहीं करने के कारण उनका अपना अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।

“न्याय के दरवाजे किसी निर्दोष पक्षकार के लिए स्थायी रूप से बंद नहीं किए जा सकते”

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में न्याय का वास्तविक उद्देश्य प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं से ऊपर है।

अदालत ने पाया कि बलजीत कौर ने मुकदमा नहीं छोड़ा था। उन्होंने वर्षों तक मुकदमे का बचाव किया और यह साबित किया कि 19 जुलाई 2024 को उनकी गैरहाजिरी उनके अधिवक्ता की मृत्यु के कारण हुई।

इसके अलावा एकतरफा डिक्री के केवल नौ दिन के भीतर उन्होंने आदेश 9 नियम 13 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह आचरण लापरवाही नहीं बल्कि सतर्कता को दर्शाता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरे पक्ष को हुई असुविधा की भरपाई लागत के जरिए की जा सकती है, लेकिन किसी निर्दोष पक्षकार के लिए न्याय के दरवाजे स्थायी रूप से बंद नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट ने 2025 की एकतरफा डिक्री रद्द कर दी

जस्टिस संजीत पुरोहित ने बलजीत कौर की अपील स्वीकार करते हुए 5 अगस्त 2026 के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, घड़साना के आदेश को उस सीमा तक रद्द कर दिया, जिसमें उनके आदेश 9 नियम 13 के आवेदन को खारिज किया गया था।

बलजीत कौर का आदेश 9 नियम 13 सहपठित धारा 151 सीपीसी का आवेदन स्वीकार कर लिया गया।

इसके परिणामस्वरूप 29 जनवरी 2025 की एकतरफा निर्णय और डिक्री को बलजीत कौर के संबंध में रद्द कर दिया गया।

2013 से लंबित मुकदमा फिर शुरू होगा

हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 में दायर मूल दीवानी मुकदमे को उसके मूल क्रमांक और रिकॉर्ड पर बहाल कर दिया।

निचली अदालत को आदेश दिया गया कि मुकदमे की सुनवाई अब गुण-दोष के आधार पर शीघ्र पूरी की जाए और अनावश्यक स्थगन न दिए जाएं।

हाईकोर्ट ने मामले को प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से अधिमानतः छह महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया।

साथ ही 28 अक्टूबर 2024 का वह आदेश भी रद्द कर दिया गया, जिसके तहत बलजीत कौर का आदेश 9 नियम 7 वाला आवेदन गैर-प्रस्तुति के कारण खारिज किया गया था।

निचली अदालत को उस आवेदन का भी गुण-दोष के आधार पर निर्णय करने का निर्देश दिया गया।

सबसे अधिक लोकप्रिय