जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बस के रास्ते को लेकर हुए विवाद में हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गोपाल और रामनिवास को राहत दी है।
हाईकोर्ट ने दोनों की सजा निलंबित कर अपील का फैसला आने तक जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान FIR में चोट पहुंचाने के तरीके और हथियार का स्पष्ट ब्योरा नहीं होने, कथित चश्मदीद रामनिवास को अभियोजन पक्ष की ओर से गवाह नहीं बनाए जाने और लोहे की रॉड की बरामदगी के तरीके पर गौर किया।
जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण और जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की बेंच ने पाया कि अपील में उठाए गए मुद्दों पर साक्ष्यों का दोबारा आकलन करने की जरूरत है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों की सजा निलंबित करने की अर्जियां मंजूर कर लीं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर की गई टिप्पणियों को अपील के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा।
गोपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह ने अधिवक्ता जगदीश सिंह के साथ पैरवी की, जबकि रामनिवास की ओर से अधिवक्ता आर.डी.एस.एस. खारलिया पेश हुए। राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक राजेश भाटी के साथ मनीष धाधीच और पूजा टाक ने पक्ष रखा।
नोखा कोर्ट ने हत्या में सुनाई थी उम्रकैद
मामला बीकानेर जिले के नोखा क्षेत्र का है। गोपाल और रामनिवास को ट्रायल कोर्ट, नोखा ने 8 अप्रैल 2024 को हत्या सहित कई अपराधों में दोषी ठहराया था।
दोनों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत उम्रकैद और 10,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। इसके अलावा, गैरकानूनी जमावड़े, मारपीट, नुकसान पहुंचाने और हथियारों से जुड़े अपराधों में भी सजा दी गई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।
गोपाल और रामनिवास ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील का अंतिम निपटारा होने में समय लगने की आशंका जताते हुए दोनों ने सजा निलंबित करने और जमानत पर रिहाई की मांग की।
बस रूट के विवाद में लोहे की रॉड से हत्या का आरोप
हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच विवाद बस के रास्ते को लेकर हुआ था। अभियोजन पक्ष का कहना था कि गोपाल और रामनिवास ने लोहे की रॉड से हमला किया, जिससे घायल व्यक्ति की मौत हो गई।
सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए मृतक के भाई राजाराम और गवाह फूलचंद के बयानों का हवाला दिया।
सरकारी पक्ष ने कहा कि इन गवाहों के बयान आरोपियों की भूमिका की पुष्टि करते हैं। डॉक्टर संजीव बुरी की गवाही का भी जिक्र किया गया, जिन्होंने मृतक की मौत का कारण सिर में लगी चोट को बताया था।
बचाव पक्ष ने गवाहों के बयानों पर उठाए सवाल
बचाव पक्ष ने कहा कि FIR में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस आरोपी ने किस हथियार से मृतक के शरीर के किस हिस्से पर चोट पहुंचाई।
मृतक के भाई राजाराम ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन उसके बयान से भी यह साफ नहीं हो पाया कि दोनों आरोपियों की अलग-अलग भूमिका क्या थी।
बचाव पक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि रामनिवास को घटना का चश्मदीद बताया गया, लेकिन अभियोजन पक्ष ने उसे गवाही के लिए पेश नहीं किया। उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि दोनों आरोपियों ने साझा इरादे से हत्या की थी।
वकीलों की दलील थी कि रिकॉर्ड पर मौजूद बयानों से यह साफ नहीं होता कि दोनों आरोपियों का मृतक की हत्या करने का पहले से कोई इरादा था।
लोहे की रॉड की बरामदगी पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने लोहे की रॉड की बरामदगी से जुड़े गवाह फूलचंद के बयान पर भी गौर किया। उसके मुताबिक, गोपाल की झोपड़ी से रॉड बरामद होने के दौरान वह बाहर खड़ा था।
इसी तरह, रामनिवास के घर से रॉड बरामद किए जाने के समय भी वह घर के बाहर मौजूद था।
वहीं, मृतक के भाई राजाराम ने अपने बयान में कहा था कि उसने आरोपियों के पास कोई हथियार नहीं देखा।
हाईकोर्ट ने इन बयानों और बरामदगी से जुड़े तथ्यों को सजा निलंबित करने की अर्जियों पर विचार करते समय अहम माना। हालांकि, इस स्तर पर कोर्ट ने इन पहलुओं पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।
हाईकोर्ट ने कहा- चोट और आरोपियों की भूमिका स्पष्ट नहीं
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि एफआईआर और राजाराम के बयान से इस स्तर पर यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि किस आरोपी ने मृतक के शरीर के किस हिस्से पर और किस हथियार से चोट पहुंचाई।
डॉक्टर संजीव बुरी ने गवाही में बताया कि मृतक के सिर में चोट लगी थी, जिसके बाद वह कोमा में चला गया और उसकी मौत हो गई। सरकारी पक्ष ने इस बयान के आधार पर जमानत का विरोध किया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर यह तय नहीं किया जा सकता कि सिर में चोट आरोपियों ने ही पहुंचाई थी। कोर्ट ने माना कि इस पहलू समेत अन्य साक्ष्यों की अपील की सुनवाई के दौरान दोबारा जांच की जरूरत है।
हाईकोर्ट ने सजा निलंबित करने के लिए क्या आधार माने?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि के बाद सजा निलंबित करने की अर्जी पर विचार करते समय अपील में उठाए गए आधारों को शुरुआती स्तर पर परखना होता है।
यह देखना जरूरी है कि क्या ऐसे सवाल मौजूद हैं, जिन पर अपीलीय कोर्ट को साक्ष्यों की दोबारा जांच करनी चाहिए।
FIR में हमले की भूमिका स्पष्ट नहीं होने, कथित चश्मदीद की गवाही नहीं होने और हथियारों की बरामदगी से जुड़े सवालों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोनों की अर्जियां स्वीकार कर लीं।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां अपील के अंतिम फैसले पर असर डालने वाली अंतिम राय नहीं मानी जाएंगी।
जमानत पर रिहाई के साथ रखीं शर्तें
हाईकोर्ट ने दोनों को 50,000 रुपए के निजी मुचलके और 25,000-25,000 रुपए के दो जमानतदार पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया।
उन्हें अपील का फैसला आने तक हर साल जनवरी में ट्रायल कोर्ट में पेश होना होगा। पता बदलने पर ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में अपने वकील को लिखित सूचना देनी होगी। जमानतदारों को भी पता बदलने पर ट्रायल कोर्ट को जानकारी देनी होगी।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि बुलाए जाने पर दोनों को ट्रायल कोर्ट में पेश होना होगा। ऐसा नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेजेगा।
दोषसिद्धि बरकरार, अपील पर फैसला बाकी
हाईकोर्ट ने गोपाल और रामनिवास की उम्रकैद की सजा को अपील के अंतिम निपटारे तक निलंबित किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों बरी हो गए हैं या उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी गई है। हत्या के मामले में उनकी अपील पर अंतिम फैसला होना अभी बाकी है।