राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, कहा- ट्रांसफर सेवा का अभिन्न हिस्सा, सरकारी नौकरी में पोस्टिंग पसंद से नहीं, प्रशासनिक जरूरत से तय होगी, प्रशासनिक आवश्यकता पर अदालत नहीं करेगी हस्तक्षेप
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने रक्षा मंत्रालय के अधीन कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) के एक कर्मचारी के स्थानांतरण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि स्थानांतरण (ट्रांसफर) सरकारी सेवा का अभिन्न हिस्सा है और कोई भी कर्मचारी किसी विशेष स्थान पर बने रहने का कानूनी अधिकार नहीं रखता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक स्थानांतरण आदेश दुर्भावनापूर्ण (मालाफाइड) या किसी वैधानिक नियम के उल्लंघन में जारी नहीं किया गया हो, तब तक अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस उमा शंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने छत्रपाल सिंह गौर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.
हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को सही ठहराते हुए कर्मचारी की रिट याचिका खारिज कर दी।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता छत्रपाल सिंह गौर रक्षा मंत्रालय के अधीन संचालित कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD) जयपुर में एलडीसी (स्टोर्स) के पद पर कार्यरत हैं।
उसकी नियुक्ति वर्ष 2018 में बठिंडा में हुई थी। मार्च 2023 में उन्हें जयपुर डिपो में स्थानांतरित किया गया था।
3 फरवरी 2025 को विभाग ने याचिकाकर्ता का तबादला जयपुर से मुंबई स्थित मुख्यालय (Head Office, Secretariat Branch) कर दिया।
इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने विभाग को प्रतिनिधित्व दिया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जयपुर का दरवाजा खटखटाया।
CAT ने पहले विभाग को याचिकाकर्ता की आपत्ति पर कारणयुक्त आदेश पारित करने का आदेश दिया।
विभाग ने विस्तृत आदेश जारी कर ट्रांसफर को प्रशासनिक आवश्यकता बताते हुए बरकरार रखा।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने पुनः CAT में चुनौती दी, लेकिन अधिकरण ने मई 2026 में उनकी याचिका खारिज कर दी।
CAT के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की।
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसकी नियुक्ति एलडीसी (स्टोर्स) के रूप में हुई थी, इसलिए उसे केवल स्टोर्स शाखा में ही कार्य करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है।
मुंबई मुख्यालय में स्थानांतरण उनकी नियुक्ति की शर्तों के विपरीत है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि विभाग की 2011 की ट्रांसफर नीति के अनुसार “लॉन्गेस्ट स्टेई और चॉइस स्टेशन” के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए था।
याचिका में कहा गया कि जयपुर में उससे अधिक समय से कार्यरत कई कर्मचारी मौजूद थे, फिर भी केवल उसे ही स्थानांतरित कर किया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उसके द्वारा बोनस भुगतान से संबंधित शिकायत रक्षा मंत्री को ई-मेल के माध्यम से भेजी थी तथा सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत जानकारी मांगी थी।
इसी कारण विभाग ने प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करते हुए उनका तबादला कर दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता के नाम पर मनमाने ढंग से किया गया है और विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि वास्तव में ऐसी कौन-सी आवश्यकता थी जिसके चलते उन्हें लगभग 1200 किलोमीटर दूर मुंबई भेजा गया।
विभाग का पक्ष
विभाग ने अपने आदेश में कहा कि मुंबई मुख्यालय के सचिवालय शाखा में कर्मचारियों की कमी थी और संगठनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुछ कर्मचारियों को वहां भेजना जरूरी था।
विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी CSD कर्मचारी अखिल भारतीय सेवा दायित्व (All India Service Liability) के अंतर्गत आते हैं और नियुक्ति के समय याचिकाकर्ता ने भी इस शर्त को स्वीकार किया था।
विभाग का कहना था कि ट्रांसफर नीति में प्रशासनिक आधार पर स्थानांतरण का स्पष्ट प्रावधान है और संगठनात्मक आवश्यकताएं किसी भी अन्य मानदंड से ऊपर हैं।
CAT ने क्यों खारिज की थी याचिका?
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने पाया कि याचिकाकर्ता जयपुर में तीन वर्ष से अधिक समय तक कार्य कर चुके थे, जबकि ट्रांसफर नीति में न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित है।
CAT ने यह भी माना कि ट्रांसफर नीति में “लॉन्गेस्ट स्टेई” का सिद्धांत पूर्णतः बाध्यकारी नहीं है। प्रशासनिक आवश्यकताओं की स्थिति में विभाग इस सिद्धांत से अलग निर्णय ले सकता है।
अधिकरण ने कहा कि कर्मचारियों की तैनाती और मानव संसाधन का प्रबंधन नियोक्ता का अधिकार है तथा अदालत या अधिकरण केवल सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकते हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि ट्रांसफर सेवा की सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है। कोई भी कर्मचारी यह दावा नहीं कर सकता कि उसे किसी विशेष स्थान पर स्थायी रूप से रखा जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवा में ट्रांसफर एक आवश्यक प्रशासनिक उपकरण है, जिसके माध्यम से विभाग अपने कार्यों का कुशल संचालन सुनिश्चित करता है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति ट्रांसफरेबल पोस्ट पर हुई है, तो वह देश के किसी भी हिस्से में ट्रांसफर के लिए उत्तरदायी होगा।
ट्रांसफर नीति पर हाईकोर्ट की राय
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर नीति केवल प्रशासनिक दिशा-निर्देश (Guidelines) है, न कि ऐसा वैधानिक नियम जिसे अदालत के माध्यम से लागू कराया जा सके।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसफर नीति कर्मचारियों को कोई कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार प्रदान नहीं करती।
फैसले में कहा गया कि विभाग सामान्य परिस्थितियों में नीति का पालन करता है, लेकिन प्रशासनिक आवश्यकता होने पर उससे अलग निर्णय लेने का अधिकार भी रखता है।
“लॉन्गेस्ट स्टेई” का तर्क नहीं माना
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि जयपुर में उनसे वरिष्ठ 25 कर्मचारी कार्यरत थे, जिन्हें पहले ट्रांसफर किया जाना चाहिए था।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि किसी विशेष पद के लिए किस कर्मचारी की आवश्यकता है, यह तय करना नियोक्ता का विशेषाधिकार है।
हाईकोर्ट कर्मचारी की उपयुक्तता या प्रशासनिक निर्णय का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती।
खंडपीठ ने माना कि संगठनात्मक आवश्यकताओं के आधार पर विभाग यह तय कर सकता है कि किस कर्मचारी को किस स्थान पर भेजा जाए।
दुर्भावना के आरोप भी खारिज
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के उस आरोप को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें यह दावा किया गया कि बोनस और RTI संबंधी शिकायतों के कारण उसका ट्रांसफर किया गया।
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि विभाग ने व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की हो।
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि जिस आदेश के तहत याचिकाकर्ता का स्थानांतरण हुआ, उसी आदेश में तीन अन्य कर्मचारियों का भी मुंबई मुख्यालय में स्थानांतरण किया गया था। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल याचिकाकर्ता को निशाना बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया जिनमें राजेंद्र राय बनाम भारत संघ, स्टेट ऑफ यूपी बनाम सिया राम, गोवर्धन लाल मामला, राजेंद्र सिंह मामला तथा एस.एल. अब्बास मामला प्रमुख हैं।
इन सभी फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ट्रांसफर आदेशों में न्यायिक हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है जब आदेश दुर्भावनापूर्ण हो, सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी न किया गया हो या किसी वैधानिक नियम का उल्लंघन करता हो।
याचिका खारिज
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे हैं कि उनका स्थानांतरण दुर्भावनापूर्ण, मनमाना या कानून के विपरीत था।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही जयपुर में तीन वर्ष से अधिक समय तक कार्य कर चुके हैं और उनका स्थानांतरण विभागीय आवश्यकता के आधार पर किया गया है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश को बरकरार रखते हुए रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
यह फैसला सरकारी और अर्धसरकारी संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के स्थानांतरण विवादों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने पुनः स्पष्ट किया है कि ट्रांसफर नीति दिशा-निर्देश है, अधिकार नहीं।