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SI भर्ती-2016 में 50% आरक्षण सीमा के अनुसार पदों की होगी दोबारा गणना, 180 दिन में पूरी करनी होगी प्रक्रिया -राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court's Big Verdict on SI Recruitment 2016: Vacancies to Be Recalculated Under 50% Reservation Ceiling

जयपुर, 28 अक्टूबर। राजस्थान पुलिस उप निरीक्षक (SI) भर्ती-2016 को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) को भर्ती के पदों की श्रेणीवार पुनर्गणना करने के आदेश दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने भर्ती से जुड़ी दर्जनो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए विस्तृत फैसला दिया हैं.

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने श्याम सिंह व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर दिए इस अहम फैसले में कहा हैं कि आरक्षण लागू करते समय 50 प्रतिशत की सीमा और अनुसूचित जाति (SC) तथा अनुसूचित जनजाति (ST) की बैकलॉग रिक्तियों को आगे ले जाने के नियमों का पालन किया जाना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने माना कि भर्ती के विज्ञापनों में विभिन्न श्रेणियों के लिए पदों के निर्धारण का पर्याप्त आधार स्पष्ट नहीं किया गया था।

राज्य सरकार की ओर से बाद में दाखिल अतिरिक्त शपथपत्र के जरिए रिक्तियों के निर्धारण को उचित ठहराने का प्रयास भी हाईकोर्ट को उचित नही लगा.

हाईकोर्ट ने याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पदों की पुनर्गणना, संशोधित मेरिट के अनुसार पात्र अभ्यर्थियों की स्थिति के पुनर्निर्धारण तथा कैडर और वरिष्ठता तय करने के आदेश दिए।

विवाद की शुरूआत पद निर्धारण से

SI भर्ती-2016 के लिए राजस्थान लोक सेवा आयोग ने 5 अक्टूबर 2016 को विज्ञापन जारी किया था।

इसके बाद 5 दिसंबर 2018 और 23 अगस्त 2019 को शुद्धिपत्र जारी किए गए।

भर्ती में उप निरीक्षक और प्लाटून कमांडर के पदों की संख्या तथा विभिन्न श्रेणियों में उनके आवंटन से इस विवाद की शुरूआत हुई.

याचिकाकर्ताओं का प्रमुख आरोप था कि गैर-अनुसूचित क्षेत्र (Non-TSP) के कुल 456 पदों में सामान्य अथवा अनारक्षित श्रेणी के लिए केवल 142 पद रखे गए।

इस तरह पदों का निर्धारण करने से अनारक्षित श्रेणी के लिए उपलब्ध पदों का अनुपात 50 प्रतिशत से काफी कम रह गया, जबकि आरक्षित श्रेणियों के लिए कुल पदों का बड़ा हिस्सा निर्धारित किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने विज्ञापन, बाद में जारी शुद्धिपत्रों और 1 सितंबर 2020 को घोषित परिणाम को चुनौती देते हुए मांग की कि आरक्षण नीति का नियमानुसार अनुपालन किया जाए और श्रेणीवार पदों की दोबारा गणना कर योग्य अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर चयन का अवसर दिया जाए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर एन माथुर के साथ तनवीर अहमद, आकाश शर्मा, राम प्रताप सैनी, दिव्येश माहेश्वरी, सारा परवीन, प्रज्ञा सेठ, श्रेयांश धारीवाल सहित अधिवक्ताओं ने भर्ती में पदों के निर्धारण और आरक्षण नीति के अनुप्रयोग को चुनौती देते हुए विभिन्न कानूनी प्रावधानों तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया।

आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सीधी भर्ती में आरक्षण लागू करते समय आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित पदों की कुल संख्या 50 प्रतिशत की सामान्य सीमा से अधिक नहीं हो सकती।

उनके अनुसार, भर्ती के विज्ञापनों और शुद्धिपत्रों से स्पष्ट था कि आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित पदों का अनुपात 50 प्रतिशत से काफी अधिक था।

उन्होंने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ और आर.के. सबरवाल बनाम पंजाब राज्य के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण की व्यवस्था लागू करते समय संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित न्यायिक मानकों का पालन किया जाना चाहिए।

सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध पदों का अनुपात कम होना

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि गैर-अनुसूचित क्षेत्र के कुल 456 पदों में सामान्य श्रेणी के लिए केवल 142 पद निर्धारित किए गए थे।

इस निर्धारण को मनमाना और आरक्षण नीति के विपरीत बताते हुए संशोधित श्रेणीवार गणना की मांग की।

विज्ञापनों में बैकलॉग रिक्तियों का स्पष्ट उल्लेख नहीं

याचिकाकर्ताओं की एक प्रमुख दलील यह भी थी कि संबंधित विज्ञापनों में SC, ST और अन्य श्रेणियों की बैकलॉग रिक्तियों का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया था।

याचिका के अनुसार, बाद में कैरी-फॉरवर्ड का तर्क देकर आरक्षण के अनुपात को उचित नहीं ठहराया जा सकता, जबकि विज्ञापन के समय ही रिक्तियों के निर्धारण का आधार स्पष्ट होना चाहिए था।

OBC रिक्तियों को कैरी-फॉरवर्ड करने पर आपत्ति

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सीधी भर्ती में OBC श्रेणी की बैकलॉग रिक्तियों को अगले वर्षों में आगे ले जाने के लिए वैसा प्रावधान नहीं है, जैसा SC/ST की बैकलॉग रिक्तियों के संबंध में लागू है।

इसलिए OBC रिक्तियों को भी कैरी-फॉरवर्ड बताकर आरक्षण की सीमा से अधिक पद निर्धारित करना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

परिणाम के बाद भी चुनौती देने का अधिकार

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि भर्ती के विज्ञापनों में समय-समय पर संशोधन किए गए थे और आरक्षण नीति के अनुप्रयोग को लेकर पहले से भी विवाद सामने आया था।

उन्होंने तर्क दिया कि संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन से जुड़ी चुनौती को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया या परिणाम घोषित होने के बाद अदालत का रुख किया।

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में नियुक्ति और अन्य परिणामी लाभ देने की भी मांग की।

राज्य सरकार का जवाब

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद और आरपीएससी की ओर से एम एम बैग सहित अधिवक्ताओं ने इन याचिकाओं का विरोध किया।

सरकार ने भर्ती में रिक्तियों के निर्धारण को उचित ठहराने के लिए अपने जवाब, अतिरिक्त शपथपत्र और वर्षवार रिक्तियों से संबंधित विवरण का सहारा लिया।

वर्षवार रिक्तियों का निर्धारण

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि SI भर्ती-2016 के लिए पदों का निर्धारण करते समय विभिन्न वर्षों की रिक्तियों को ध्यान में रखा गया था।

सरकार के अनुसार, अतिरिक्त शपथपत्र में उपलब्ध कराए गए विवरण और गणना के आधार पर पदों का निर्धारण उचित था।

आरक्षण नीति के उल्लंघन से इनकार

राज्य सरकार ने दलील दी कि भर्ती में लागू नियमों और आरक्षण नीति का उल्लंघन नहीं हुआ है।

सरकार ने याचिकाकर्ताओं के मौलिक अधिकारों के हनन के आरोपों को भी स्वीकार नहीं किया।

प्रशासनिक निर्णय में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

महाधिवक्ता ने यह तर्क भी दिया कि राज्य सरकार द्वारा रिक्तियों के निर्धारण और भर्ती प्रक्रिया के संबंध में लिए गए प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है।

इस संदर्भ में कांता परिहार बनाम राजस्थान राज्य सहित पूर्व निर्णयों का हवाला दिया गया।

अतिरिक्त शपथपत्र से गणना को उचित ठहराने का प्रयास

राज्य सरकार ने बाद में दाखिल अतिरिक्त शपथपत्र के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि विभिन्न श्रेणियों के लिए रिक्तियों का निर्धारण किस आधार पर किया गया था।

सरकार का कहना था कि वर्षवार रिक्तियों और संबंधित गणना को ध्यान में रखने पर भर्ती में निर्धारित पदों का आवंटन उचित ठहराया जा सकता है।

निजी प्रतिवादियों ने भी याचिकाओं का विरोध किया

मामले में निजी प्रतिवादियों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने भी याचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध किया और राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता द्वारा रखे गए तर्कों को अपनाया।

निजी प्रतिवादियों की ओर से यह आपत्ति भी उठाई गई कि याचिकाकर्ताओं ने 15 दिसंबर 2020 को अंतरिम आदेश प्राप्त करते समय महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा नहीं किया था।

हाईकोर्ट का फैसला: आरक्षण की गणना पारदर्शी होनी चाहिए

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने सभी पक्षों की दलीले सुनने के बाद मामले में अहम फैसला देते हुए भर्ती प्रक्रिया, आरक्षण के संवैधानिक सिद्धांतों, बैकलॉग रिक्तियों और राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत स्पष्टीकरण का विस्तार से परीक्षण किया।

आरक्षित श्रेणियों के लिए 70 से 80 प्रतिशत तक पद, सामान्य श्रेणी के लिए 20 से 30 प्रतिशत

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संबंधित भर्ती में आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित रिक्तियों का अनुपात लगभग 70 से 80 प्रतिशत तक था, जबकि सामान्य अथवा अनारक्षित श्रेणी के लिए उपलब्ध पद लगभग 20 से 25 प्रतिशत और कुछ स्थितियों में अधिकतम 30 प्रतिशत तक थे।

हाईकोर्ट के अनुसार, उपलब्ध आंकड़ों से स्पष्ट था कि अनारक्षित श्रेणी के लिए निर्धारित पदों का अनुपात 50 प्रतिशत से काफी कम था। ऐसे में आरक्षण के अनुप्रयोग और पदों के निर्धारण के आधार की जांच आवश्यक थी।

विज्ञापन में रिक्तियों के निर्धारण का आधार स्पष्ट होना चाहिए

हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती के विज्ञापन अथवा संबंधित मूल दस्तावेजों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि विभिन्न श्रेणियों में पदों का निर्धारण किस आधार और किस नियम के तहत किया गया है।

हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित विज्ञापनों और शुद्धिपत्रों में श्रेणीवार रिक्तियों के निर्धारण का आधार स्पष्ट नहीं किया गया था।

बाद में दाखिल अतिरिक्त शपथपत्र के माध्यम से दिए गए स्पष्टीकरण को विज्ञापन में मूल रूप से दर्ज कारणों का विकल्प नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में स्थापित कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि किसी प्रशासनिक निर्णय को बाद में दिए गए स्पष्टीकरण के आधार पर इस तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता, जब निर्णय लेते समय उसके कारण और आधार स्पष्ट नहीं किए गए हों।

आरक्षण की सामान्य सीमा 50 प्रतिशत है

हाईकोर्ट ने इंद्रा साहनी सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलो का हवाला देते हुए कहा कि सीधी भर्ती और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के सामान्य नियम के तहत 50 प्रतिशत की सीमा महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्थान में सार्वजनिक रोजगार के मामलों में आरक्षण की व्यवस्था लागू करते समय संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए।

SC/ST की बैकलॉग रिक्तियां केवल अनुमत अवधि तक ही आगे बढ़ाई जा सकती हैं

हाईकोर्ट ने कहा कि सीधी भर्ती में SC/ST की बैकलॉग रिक्तियों को नियमानुसार आगे ले जाने की अनुमति है, लेकिन यह अनुमति निर्धारित अवधि और लागू नियमों के अधीन है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीधी भर्ती में OBC श्रेणी की रिक्तियों को अगले वर्षों में कैरी-फॉरवर्ड करने के लिए संबंधित नियमों में प्रावधान होना आवश्यक है। अदालत ने माना कि बैकलॉग रिक्तियों के नाम पर आरक्षण की सीमा से अधिक पद निर्धारित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और भर्ती आयोग की जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक रोजगार में भर्ती करते समय संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का पालन करें।

हाईकोर्ट के अनुसार,

भर्ती प्रक्रिया में विभिन्न श्रेणियों के लिए उपलब्ध पदों, रिक्तियों की गणना और लागू नियमों का स्पष्ट विवरण होना चाहिए, ताकि अभ्यर्थी यह समझ सकें कि चयन प्रक्रिया में उनके अधिकारों का उचित पालन किया गया है या नहीं।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो संवैधानिक न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संबंधित कार्रवाई की जांच की जा सकती है।

केवल भर्ती में भाग लेने से चुनौती देने का अधिकार समाप्त नहीं होता

हाईकोर्ट ने डॉ. (मेजर) मीता साहाई बनाम बिहार राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल चयन प्रक्रिया में भाग लेने से अभ्यर्थी का यह अधिकार समाप्त नहीं हो जाता कि वह प्रक्रिया की ऐसी अवैधता को चुनौती दे, जो मूल प्रक्रिया और संवैधानिक या वैधानिक मानकों के उल्लंघन से जुड़ी हो।

मेधावी अभ्यर्थियों के समानता के अधिकार की भी रक्षा जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण नीति के उद्देश्यों को लागू करते समय मेधावी अभ्यर्थियों के समानता के अधिकार की भी रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।

हाईकोर्ट ने माना कि भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण का क्रियान्वयन संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए और किसी भी श्रेणी के पात्र अभ्यर्थी के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अदालत ने सभी नियुक्तियां रद्द करने के बजाय बीच का रास्ता अपनाया

फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान कई अभ्यर्थियों की नियुक्तियां हो चुकी थीं और वे सेवा में कार्यरत थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक ओर आरक्षण नीति का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित करना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर पहले से नियुक्त अनेक अभ्यर्थियों की स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा।

इसलिए अदालत ने ऐसा रास्ता अपनाया, जिससे भर्ती में आवश्यक सुधार किए जा सकें और पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों को अनावश्यक रूप से प्रभावित न होना पड़े।

इसके तहत पदों की दोबारा गणना, संशोधित मेरिट के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों की स्थिति का पुनर्निर्धारण और कैडर तथा वरिष्ठता में आवश्यक बदलाव के निर्देश दिए गए।

बिंदूवार समझिए हाईकोर्ट के फैसले को

हाईकोर्ट ने याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश जारी किए:

श्रेणीवार पदों की पुनर्गणना: राज्य सरकार के संबंधित विभागों और RPSC को 5 अक्टूबर 2016 के विज्ञापन तथा 5 दिसंबर 2018 और 23 अगस्त 2019 के शुद्धिपत्रों के तहत विज्ञापित पदों की दोबारा गणना करनी होगी।

इसमें आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा तथा SC/ST की बैकलॉग रिक्तियों को केवल अनुमत अवधि तक आगे ले जाने के नियम का पालन करना होगा।

90 दिन में पुनर्गणना: पदों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया 90 दिनों के भीतर पूरी कर इसका विवरण कार्मिक विभाग (DOP) और RPSC की वेबसाइट पर प्रकाशित करना होगा।

संशोधित मेरिट के अनुसार स्थिति तय होगी: 1 सितंबर 2020 के परिणाम के आधार पर चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों में से जो संशोधित मेरिट सूची में स्थान प्राप्त करेंगे, उनकी स्थिति मेरिट के अनुसार पुनर्निर्धारित की जाएगी।

पुनर्निर्धारण के बाद यह प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर पूरी की जानी है।

कैडर और वरिष्ठता का पुनर्निर्धारण: संशोधित मेरिट और लागू रोस्टर के अनुसार संबंधित अभ्यर्थियों को कैडर आवंटित किया जाएगा तथा वरिष्ठता निर्धारित की जाएगी।

अनारक्षित पद मेरिट से भरे जाएंगे: अनारक्षित श्रेणी के शेष पदों को मेरिट सूची के अनुसार भरा जाएगा।

अतिरिक्त पद सृजित करने की छूट: राज्य सरकार को सामान्य अथवा अनारक्षित श्रेणी के मेधावी अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए पर्याप्त संख्या में अतिरिक्त पद सृजित करने की स्वतंत्रता दी गई है, ताकि मेधावी अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।

पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों को सेवा से नहीं हटाया जाएगा: पुनर्गणना और संशोधित मेरिट के आधार पर आवश्यक बदलाव किए जाएंगे, लेकिन 1 सितंबर 2020 के परिणाम के आधार पर नियुक्त किसी भी अभ्यर्थी को इस प्रक्रिया के कारण सेवा से नहीं हटाया जाएगा।

पूरी प्रक्रिया 180 दिनों में पूरी करनी होगी: हाईकोर्ट ने पुनर्गणना, संशोधित मेरिट, कैडर आवंटन और वरिष्ठता के पुनर्निर्धारण सहित पूरी प्रक्रिया के लिए 180 दिनों की समयसीमा निर्धारित की है।

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