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राजस्थान पंचायत-निकाय चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कैवियट दायर

Rajasthan Local Body Polls Row Reaches Supreme Court as Caveat Filed
राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनाव को लेकर कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने कैविएट दाखिल कर मांग की है कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर उनका पक्ष सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

नई दिल्ली: प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव से जुड़ा मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया हैं.

राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा राजस्थान सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव संपन्न कराने के आदेश दिए हैं. हाईकोर्ट ने चुनाव टालने के लिए दिए गए कई तर्कों को भी खारिज कर दिया था।

​हाईकोर्ट के इस फैसले को लेकर याचिकाकर्ता संयम लोढा ने सुप्रीम कोर्ट में कैवियट दायर की है.

याचिकाकर्ता संयम लोढा को सुप्रीम कोर्ट में कैवियट दायर कर यह अनुरोध किया है। कि यदि राजस्थान सरकार या राज्य चुनाव आयोग हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देता है, तो बिना उनका पक्ष सुने कोई आदेश पारित न किया जाए।

यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को सख्त निर्देश देते हुए पंचायत और शहरी निकाय चुनाव 31 जुलाई तक कराने का आदेश दिया था।

चुनाव विवाद अब तक

राजस्थान में पंचायत राज संस्थाओं और नगर निकायों का कार्यकाल काफी समय पहले समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद चुनाव समय पर नहीं कराए गए।

इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट में कुल 439 याचिकाएं दायर हुई थीं।

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को बड़ा आदेश देते हुए राज्य सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।

लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए। इसके बाद राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग ने हाईकोर्ट में अतिरिक्त समय मांगते हुए चुनाव दिसंबर 2026 तक टालने की मांग रखी।

सरकार का कहना था कि:

  • ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अभी लंबित है।
  • आरक्षण प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
  • परिसीमन से जुड़े मुद्दे हैं।
  • कुछ प्रशासनिक परिस्थितियों के कारण चुनाव कराना संभव नहीं है।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि सरकार जानबूझकर पिछले डेढ़ साल से चुनाव टाल रही है और इससे जमीनी लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो रही है।

हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार

राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित शामिल थे, ने सरकार की दलीलों पर कड़ी टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि पंचायत और निकाय चुनाव कराना राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग का संवैधानिक तथा वैधानिक दायित्व है। इसे अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ओबीसी आयोग के गठन को एक साल से अधिक समय हो चुका है फिर भी रिपोर्ट लंबित है और आयोग का “ढुलमुल रवैया” चुनाव प्रक्रिया में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता।

अदालत ने ओबीसी आयोग को 20 जून 2026 तक रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया हर हाल में 31 जुलाई तक पूरी होनी चाहिए।

क्या है कैविएट और क्यों है यह अहम?

कानूनी भाषा में कैविएट एक ऐसा अधिकार है, जिसके जरिए कोई पक्ष अदालत से यह अनुरोध करता है कि उसके खिलाफ कोई भी आदेश पारित करने से पहले उसकी बात जरूर सुनी जाए।

संयम लोढ़ा ने इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि अगर सरकार या चुनाव आयोग अपील करते हैं, तो उन्हें पहले सुना जाना जरूरी है।

यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर अपीलों में शुरुआती स्तर पर एकतरफा (ex-parte) आदेश पारित हो जाते हैं।
कैविएट इस संभावना को खत्म कर देता है।

यानी अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट बिना दोनों पक्षों को सुने कोई भी अंतरिम राहत नहीं देगा।

चुनाव आयोग ने भी सरकार पर डाली देरी की जिम्मेदारी

इस पूरे विवाद के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने भी हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण बयान दिया था। आयोग ने कहा कि वह चुनाव कराने के लिए तैयार था, लेकिन राज्य सरकार ने समय पर परिसीमन संबंधी आंकड़े, आरक्षण का डेटा और जरूरी प्रशासनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।

आयोग ने अदालत को बताया कि आवश्यक आंकड़ों और अधिसूचनाओं के अभाव में चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे चुनाव टलने की जिम्मेदारी सीधे राज्य सरकार पर जाती दिखाई दी।

बढ़ी सरकार की मुश्किलें

हाईकोर्ट ने 22 मई को सुनवाई करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए थे कि राज्य में पंचायत और निकाय चुनाव 31 जुलाई तक कराए जाएं।

सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने कोर्ट से दिसंबर तक का समय मांगा था। उन्होंने दलील दी थी कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है और कुछ प्रशासनिक चुनौतियां भी हैं।

लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने साफ कहा कि चुनाव कराना सरकार का संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है, जिसे टाला नहीं जा सकता।

पहले भी मिल चुकी थी डेडलाइन, फिर भी नहीं हुए चुनाव

यह पहला मौका नहीं है जब कोर्ट ने सरकार को चुनाव कराने के निर्देश दिए हों। इससे पहले 14 नवंबर 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट ने 439 याचिकाओं पर फैसला सुनाया था।

उस समय कोर्ट ने सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने के आदेश दिए थे। लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बावजूद चुनाव नहीं कराए गए।

इसके बाद सरकार ने हाईकोर्ट में एक नया आवेदन दायर कर चुनाव टालने की मांग की। सरकार ने कहा कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट लंबित है और कुछ अन्य परिस्थितियां भी हैं, जिनके चलते चुनाव कराना संभव नहीं है।

अब सुप्रीम कोर्ट में

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि राज्य सरकार या चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।

इसी संभावना को देखते हुए संयम लोढ़ा ने पहले ही कैविएट दायर कर दी है। यानी अब मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गरमाने वाला है।

अगर अपील दायर होती है, तो सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि हाईकोर्ट का आदेश सही है या उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप जरूरी है।

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