Reportable Judgments जयपुर, 17 अक्टूबर
Rajasthan Highcourt ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि 16 से 18 वर्ष के बीच आयु वाले बाल अपराधी (Juvenile in Conflict with Law) को गंभीर अपराध के मामले में भी धारा 12 के तहत जमानत का अधिकार है।
Justice Anoop Kumar Dhand की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए अपने फैसले में कहा कि अपराध की गंभीरता या किशोर की आयु जमानत से इनकार करने का कारण नहीं हो सकती।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट व देश के विभिन्न हाईकोर्टों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अधिनियम का उद्देश्य “दंड” नहीं बल्कि “पुनर्वास” है।
कोटा में रील बनाते समय गोली लगने से युवक की मौत के मामले में आरोपी किशोर को जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराध के मामले में भी किशोरों के लिए Observation Home अंतिम उपाय होना चाहिए.
हाईकोर्ट ने किशोर के मां कि निगरानी याचिका स्वीकार करते हुए किशोर न्याय बोर्ड, कोटा और विशेष बाल न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया हैं.
मां द्वारा 1 लाख के निजी मुचलके और 1 लाख की जमानत पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया हैं.
Observation Home अंतिम उपाय
इसलिए “न्याय के उद्देश्य की पराजय” की अवधारणा को किशोर के हित के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, न कि सामान्य दंडात्मक दृष्टि से।
अदालत ने कहा कि अधिनियम के अनुसार परिवार को बच्चे के सुधार के लिए सर्वोत्तम संस्था माना गया है और Observation Home अंतिम उपाय होना चाहिए।
अदालतें बने संवेदनशील
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किशोरों को जेल में रखने से उनकी सुधार प्रक्रिया बाधित होती है और समाज को दीर्घकालिक नुकसान होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों को ऐसे मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ताकि बालक का समाज में पुनः समावेश हो सके।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के “Juvenile in Conflict with Law vs. State of Rajasthan (2024 SCC OnLine SC 5297)” का हवाला देते हुए कहा कि बिना यह रिकॉर्ड किए कि धारा 12 की उपधारा (1) के प्रावधान लागू होते हैं, किसी किशोर की जमानत खारिज नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 का मूल उद्देश्य सुधार, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्संरचना है।
16 से 18 वर्ष के किशोर को, चाहे वह गंभीर अपराध के आरोप में ही क्यों न हो, जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके मामले में धारा 12 की अपवादात्मक परिस्थितियाँ न पाई जाएँ।
तीन परिस्थितियों में जमानत नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 12 बताती है कि केवल तीन परिस्थितियों में ही किशोरों को जमानत देने से रोका जा सकता है—
- यदि किशोर की रिहाई से वह किसी अपराधी के संपर्क में आ सकता है,
- यदि किशोर की रिहाई से उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरा हो,
- यदि उसकी रिहाई “न्याय के उद्देश्यों” को पराजित करती हो।
यह है मामला
मामला कोटा शहर का है, जब मई 2025 में सोशल मीडिया के लिए बंदूक के साथ रील बनाने के दौरान एक युवक की गोली लगने से मौत हो गई।
दरअसल, रील शूट करते समय गलती से बंदूक से गोली चल गई, जो एक युवक को लगी।
घटोत्कच सर्किल के पास स्थित महर्षि गौतम सामुदायिक भवन के पास हुई इस घटना में 20 वर्षीय यशवंत की मौत हो गई थी।
कोटा की किशोर अदालत ने धारा 15 के अंतर्गत उसकी मानसिक व परिपक्वता का मूल्यांकन कर उसे “वयस्क आरोपी” के रूप में अभियोजित करने का आदेश दिया।
आरोपी किशोर ने धारा 102 के तहत जमानत खारिज करने के अधीनस्थ अदालत के फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बचाव पक्ष की दलील
आरोपी किशोर की ओर से अधिवक्ता कपिल गुप्ता, धर्मेंद्र कुमार, अनिशा यादव और निधि शर्मा सहित अन्य ने पैरवी करते हुए कहा कि धारा 12 के तहत जमानत का अधिकार “नियम” है और खारिज करना “अपवाद”, तथा अपराध की गंभीरता को आधार बनाकर जमानत नहीं रोकी जा सकती।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि कथित अपराध के समय आरोपी की आयु 16 वर्ष और 2 माह थी।
अधिवक्ता ने आगे कहा कि धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment) किया गया था और उस रिपोर्ट के आधार पर उसका मामला धारा 18 के तहत बच्चों की विशेष अदालत (Children’s Court) को भेजा गया, ताकि उस पर “वयस्क अभियुक्त” के रूप में मुकदमा चलाया जा सके।
अधिवक्ता ने यह भी बताया कि सह-अभियुक्तों को नियमित अदालत द्वारा जमानत दी जा चुकी है।
सरकार ने किया विरोध
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता अजय सिंह और राज्य सरकार की ओर से अमित पुनिया ने जमानत याचिका का विरोध किया।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी ने जानलेवा गोली चलाई, इसलिए उसे जमानत नहीं दी जा सकती।