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सुप्रीम कोर्ट से एड-हॉक कर्मियों को राहत, कहा- छोटा ब्रेक नियमितीकरण रोकने का आधार नहीं

Supreme Court Dismisses Contempt Plea Against Rajasthan Chief Secretary Over Consumer Commission Tenure Issue
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने सुनाया अहम फैसला, पंजाब सरकार को 4 हफ्ते में सेवाएं नियमित करने का निर्देश दिया।

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने एड-हॉक कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि सेवा में दिए गए “कृत्रिम ब्रेक” के आधार पर कर्मचारियों को नियमितीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय करोल (Justice Sanjay Karol) और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह (Justice Augustine George Masih) की डिवीजन बेंच ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं की सेवाओं को 4 हफ्तों के भीतर नियमित किया जाए।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला पंजाब सरकार के वित्त विभाग में 1995-96 के दौरान एड-हॉक आधार पर नियुक्त किए गए क्लर्क और चपरासी कर्मचारियों से जुड़ा है। इन कर्मचारियों ने लंबे समय तक सेवा देने के बाद नियमितीकरण की मांग की, लेकिन सरकार ने उनकी सेवाएं यह कहते हुए समाप्त कर दीं कि वे नीति के तहत पात्र नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने भी इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी कि कर्मचारियों की नियुक्ति नियमित प्रक्रिया से नहीं हुई थी और वे “बैकडोर एंट्री” के जरिए आए थे।

किसने क्या दलील दी

अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्होंने 10 से 11 साल तक सेवा दी है और उनकी स्थिति में काम करने वाले कई अन्य कर्मचारियों को पहले ही नियमित किया जा चुका है, इसलिए उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए।

वहीं, राज्य सरकार ने कहा कि कर्मचारियों की सेवा में 5 से 187 दिनों तक के ब्रेक थे, इसलिए उनकी सेवा निरंतर नहीं मानी जा सकती और वे नीति के तहत पात्र नहीं हैं।

कोर्ट ने क्या कहा

डिवीजन बेंच के जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने कहा कि, “कर्मचारियों की सेवा में दिखाए गए ब्रेक कृत्रिम हैं और यह किसी वास्तविक सेवा समाप्ति को नहीं दर्शाते। ऐसे ब्रेक के आधार पर लंबे समय की सेवा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि, “राज्य सरकार समान स्थिति वाले कर्मचारियों को लाभ देकर अपीलकर्ताओं को उससे वंचित नहीं कर सकती, यह समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।”

लैंडमार्क जजमेंट का हवाला

मामले में Secretary, State of Karnataka vs Umadevi (2006) के फैसले का संदर्भ सामने आया, जिसके बाद राज्य ने नियमितीकरण की नीतियां बनाई थीं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीतियों का समान और निष्पक्ष अनुप्रयोग जरूरी है।

क्या दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिया कि, अपीलकर्ताओं को निरंतर सेवा में माना जाएगा। उनकी सेवाएं 26 मई 2003 की नीति के तहत नियमित की जाएं।

इसके साथ ही निर्देश दिया कि राज्य सरकार 4 हफ्तों के भीतर नियमितीकरण का आदेश जारी करे। साथ ही, कर्मचारियों को सभी सर्विस बेनिफिट्स (इंक्रीमेंट आदि) दिए जाएंगे, हालांकि पिछली अवधि का वास्तविक वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा।

क्यों अहम है फैसला

यह फैसला स्पष्ट करता है कि सरकारें तकनीकी आधार या “कृत्रिम ब्रेक” दिखाकर लंबे समय तक काम कर चुके कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकतीं। यह निर्णय समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत को मजबूत करता है और भविष्य के ऐसे मामलों में अहम मिसाल बनेगा।

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