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‘चंबल में अवैध खनन रोकना है तो स्थानीय लोगों को रोजगार दो’: सुप्रीम कोर्ट का राजस्थान सरकार को बड़ा संदेश

“Stop Illegal Mining With Jobs, Not Just Raids”: Supreme Court’s Big Message To Rajasthan
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सिर्फ पुलिस कार्रवाई से नहीं रुकेगा अवैध खनन, लोगों को वैकल्पिक रोजगार देना भी जरूरी

जयपुर: सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य क्षेत्र में जारी अवैध रेत खनन को लेकर राजस्थान सरकार को सख्त संदेश दिया है।

अदालत ने कहा है कि केवल पुलिस कार्रवाई, छापेमारी और वाहन जब्ती से अवैध खनन पूरी तरह नहीं रुकेगा। इसके लिए स्थानीय युवाओं और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को रोजगार और वैकल्पिक आजीविका से जोड़ना भी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों को निर्देश दिया कि वे चंबल क्षेत्र के युवाओं के लिए रोजगार योजनाएं, कौशल विकास कार्यक्रम और आजीविका बढ़ाने वाले कदम शुरू करें।

अदालत ने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों को संरक्षण, वनरोपण, इको-टूरिज्म और निगरानी गतिविधियों से जोड़ा जाए।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह आदेश ‘नेशनल चंबल सेंचुरी’ क्षेत्र में जारी अवैध खनन को लेकर स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान दिए

राजस्थान के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चंबल क्षेत्र में अवैध खनन अब केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थानीय रोजगार का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।

रोजगार ही असली समाधान: सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कई लोग मजबूरी में अवैध खनन जैसे कामों में शामिल हो जाते हैं। ऐसे में अगर उन्हें रोजगार के वैकल्पिक साधन मिलें, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों राज्यों को निर्देश दिया कि वे स्थानीय युवाओं और गरीब वर्गों के लिए रोजगार के अवसर प्राथमिकता से उपलब्ध कराएं।

इसके साथ ही उन्हें संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि लोगों को वनीकरण, इको-टूरिज्म, नदी संरक्षण और निगरानी जैसे कार्यों में शामिल किया जा सकता है। इससे दोहरा फायदा होगा-एक तरफ रोजगार मिलेगा और दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण मजबूत होगा।

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धौलपुर-करौली इलाके पर सबसे ज्यादा फोकस

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में राजस्थान का चंबल क्षेत्र खास तौर पर चर्चा में रहा। धौलपुर, करौली और आसपास के इलाके लंबे समय से अवैध रेत खनन के संवेदनशील क्षेत्र माने जाते हैं।

यहां कई बार रात के समय ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और भारी वाहनों से रेत निकासी की शिकायतें सामने आती रही हैं। वन विभाग और स्थानीय प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई भी करता रहा है, लेकिन इसके बावजूद अवैध खनन पूरी तरह नहीं रुक पाया।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग आर्थिक मजबूरी के कारण अवैध खनन से जुड़े रहते हैं। इसी वजह से अदालत ने पहली बार केवल कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के बजाय रोजगार आधारित समाधान पर भी जोर दिया।

कोर्ट ने कहा कि यदि स्थानीय युवाओं को स्थायी और वैध रोजगार मिलेगा, तो उनकी अवैध खनन पर निर्भरता कम हो सकती है।

संरक्षण में जनता की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चंबल अभयारण्य की सुरक्षा केवल सरकारी विभागों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।

कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण, इको-टूरिज्म, पर्यावरण संरक्षण, वनरोपण और निगरानी गतिविधियों से जोड़ा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब स्थानीय लोग खुद संरक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे, तब अवैध खनन रोकना ज्यादा आसान होगा।

राजस्थान के संदर्भ में यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चंबल क्षेत्र घड़ियाल संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशील माना जाता है। अवैध खनन के कारण नदी के प्राकृतिक प्रवाह और वन्यजीवों के आवास पर असर पड़ने की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं।

स्टाफ की कमी पर कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन पर रोक के लिए कानून व्यवस्था मजबूत करने के साथ फील्ड स्तर पर स्टाफ की कमी को गंभीर मुद्दा माना।
कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि फॉरेस्ट विभाग में गार्ड और अन्य फ्रंटलाइन कर्मियों के खाली पदों की पहचान कर उन्हें जल्द भरा जाए।

अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया को तेज किया जाए और यथासंभव एक साल के भीतर पूरी किया जाए।
इसके लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया गया है कि वे रिक्त पदों और भर्ती प्रक्रिया की जानकारी शपथ पत्र के रूप में पेश करें।

इसके साथ ही कोर्ट ने प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के लिए सीसीटीवी, कंट्रोल सेंटर और अन्य तकनीकी व्यवस्था विकसित करने के निर्देश भी दिए हैं।

नेशनल हाईवे-44 पर मोरेना-धौलपुर सीमा के पास हाई-रिजॉल्यूशन नाइट विजन कैमरे लगाने का आदेश भी इसी दिशा में दिया गया है।

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अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

यह मामला पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चर्चा में रहा है।

पिछली सुनवाई में अदालत ने राजस्थान समेत तीन राज्यों के अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा था कि प्रशासन “आंखें बंद करके झूठ बोल रहा है”, जबकि जमीन पर बड़े स्तर पर खनन जारी है।

इस बार सुनवाई के दौरान कोर्ट के एमिकस क्यूरी निखिल गोयल ने एक मीडिया रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों के बावजूद चंबल क्षेत्र में अवैध खनन जारी रहने की बात कही गई थी।

इस पर अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि रिपोर्ट सही है, तो संबंधित अधिकारियों द्वारा अदालत में दाखिल हलफनामे गलत साबित हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिए कि अब वह केवल कागजी रिपोर्टों पर भरोसा नहीं करेगी, बल्कि जमीन पर कार्रवाई का वास्तविक असर देखना चाहती है।

अब राज्यों की परीक्षा, हर 2 महीने में देनी होगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया कि वे हर दो महीने में अदालत के निर्देशों के पालन की समीक्षा करें और स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें।

कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में:

  • सर्विलांस व्यवस्था
  • एनफोर्समेंट कार्रवाई
  • रिक्रूटमेंट मेजर्स

की प्रगति की जानकारी दी जाए।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर शुरू किया था। पहले भी कोर्ट ने राज्यों की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई थी और कहा था कि अधिकारी “आंख बंद करके” बैठे हैं।

हालिया सुनवाई में एक मीडिया रिपोर्ट का जिक्र आया, जिसमें बताया गया कि कोर्ट के आदेशों के बावजूद अवैध खनन जारी है।
इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर यह सही है, तो अधिकारियों ने गलत जानकारी दी है।

कोर्ट ने अब राज्यों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया है कि वे हर दो महीने में प्रगति की समीक्षा करें और रिपोर्ट पेश करें।

मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी।

सख्ती के साथ समाधान का संदेश

चंबल में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल सख्त कार्रवाई तक सीमित नहीं है। इसमें एक व्यापक सोच दिखाई देती है, जहां कानून के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक समाधान पर भी बराबर जोर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने चंबल क्षेत्र से जुड़े राजस्थान के इलाकों में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि प्रभावित समुदायों, खासकर युवाओं को वैकल्पिक आजीविका से जोड़ा जाए ताकि उनकी निर्भरता अवैध खनन पर कम हो सके।

कोर्ट का संदेश साफ है-अगर लोगों को रोजगार मिलेगा और वे संरक्षण से जुड़ेंगे, तो अवैध खनन अपने आप कम हो जाएगा। रोजगार आधारित उपाय इस समस्या के समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

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