नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते सड़क हादसों पर चिंता जताते हुए एक्सप्रेसवे और नेशनल हाईवे पर भारी वाहनों की अवैध पार्किंग पर रोक लगा दी है।
अदालत ने साफ कहा है कि अब कोई भी कमर्शियल या भारी वाहन मनमाने तरीके से हाईवे पर खड़ा नहीं किया जा सकेगा और केवल निर्धारित स्थानों पर ही पार्किंग की अनुमति होगी।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चांदुरकर की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे प्रशासनिक लापरवाही की वजह से “मौत के गलियारे” नहीं बनने दिए जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
अदालत ने यह मामला स्वत: संज्ञान लेते हुए उठाया। दरअसल, 2 और 3 नवंबर 2025 को राजस्थान के फलोदी और तेलांगाना के रंगारेड्डी जिला में हुए भीषण सड़क हादसों में कुल 34 लोगों की मौत हो गई थी।
शुरुआती जांच में सामने आया कि इन दुर्घटनाओं के पीछे अवैध पार्किंग, हाईवे प्रबंधन में लापरवाही और सुरक्षा मानकों की कमी जैसे कारक जिम्मेदार थे।
इन घटनाओं ने हाईवे सेफ्टी की गंभीर स्थिति को उजागर किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे व्यापक जनहित का मामला मानते हुए देशभर में सड़क सुरक्षा के हालात की समीक्षा करने का निर्णय लिया।
हाईवे पर मनमानी पार्किंग पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 11 पन्नों के आदेश में सबसे अहम निर्देश देते हुए कहा कि:
- नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे पर अनधिकृत पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित होगी।
- भारी और व्यावसायिक वाहन केवल ले-बाय, पार्किंग बे या वे-साइड सुविधाओं पर ही रुक सकेंगे।
- नियमों का उल्लंघन करने वालों पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट ने माना कि सड़क किनारे खड़े भारी वाहन अक्सर घातक दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है।
चौंकाने वाले आंकड़ों पर कोर्ट की चिंता
अदालत ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने रखा। भारत के कुल सड़क नेटवर्क में नेशनल हाईवे की हिस्सेदारी महज करीब 2 प्रतिशत है, लेकिन देश में होने वाली कुल सड़क मौतों में इनका हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है।
कोर्ट ने कहा कि यह असंतुलन दिखाता है कि हाईवे सेफ्टी को लेकर तत्काल और सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
केंद्र, NHAI और राज्यों को सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI), सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे अवैध पार्किंग पर तुरंत रोक लगाएं।
साथ ही हाईवे के “ब्लैकस्पॉट” की पहचान कर सुधार करें और सड़क सुरक्षा के लिए ठोस और समयबद्ध कदम उठाएं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी समस्याएं रोकी जा सकती हैं, फिर भी इनके कारण जानें जा रही हैं जो प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है।
ATMS और टेक्नोलॉजी से होगी निगरानी
कोर्ट ने आदेश दिया कि नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एडवांस्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ATMS) का इस्तेमाल किया जाए। इसके तहत:
- रियल-टाइम अलर्ट राज्य पुलिस को भेजे जाएंगे।
- जीपीएस आधारित फोटो सबूत जुटाए जाएंगे।
- ई-चालान सिस्टम के जरिए तुरंत कार्रवाई होगी।
इससे निगरानी और प्रवर्तन (enforcement) दोनों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा।
अनुच्छेद 21 का हवाला-सुरक्षित यात्रा भी अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि “जीवन का अधिकार” केवल जीवन छीनने से बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सुरक्षित यात्रा करना भी नागरिकों के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।
अनुच्छेद 142 के तहत जारी किए निर्देश
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ये अंतरिम निर्देश जारी किए हैं, ताकि सड़क हादसों के मूल कारणों पर सीधे प्रहार किया जा सके।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी तरह की आर्थिक या प्रशासनिक बाधा को मानव जीवन से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए साफ संकेत दिया कि अब इस मुद्दे पर किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में सड़क हादसों के आंकड़े लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। अदालत का यह कदम न सिर्फ नीतिगत स्तर पर बदलाव लाएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर भी हाईवे सेफ्टी को लेकर जवाबदेही तय करेगा।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह आदेश देशभर के ड्राइवरों, ट्रांसपोर्ट कंपनियों और प्रशासन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है कि हाईवे पर लापरवाही अब जानलेवा साबित हो सकती है और कानून इसे सख्ती से रोकेगा।
आने वाले समय में यह फैसला भारत में सड़क सुरक्षा व्यवस्था को अधिक सख्त, तकनीक आधारित और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
