बस ड्राइवर की जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ”कंडक्टर के सिग्नल पर बस चलाना लापरवाही नहीं”, सिर्फ हादसा होने से बस ड्राइवर पर नहीं बनेगा लापरवाही का मामला
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बस संचालन और आपराधिक लापरवाही के दायरे को स्पष्ट करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बस चालक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हर बार पीछे मुड़कर देखे कि सभी यात्री बस से उतर चुके हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि चालक ने कंडक्टर के संकेत पर बस चलाई है, तो केवल दुर्घटना हो जाने भर से उसे आपराधिक लापरवाही का दोषी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के एक बस चालक को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष चालक की लापरवाही साबित करने में विफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“ड्राइवर से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह पीछे मुड़कर खुद देखे कि यात्री उतर चुके हैं या नहीं। कंडक्टर के सीटी या संकेत पर बस आगे बढ़ाना सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है।”
अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में चालक और परिचालक यानी कंडक्टर की जिम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं और चालक सामान्य रूप से कंडक्टर के संकेतों पर निर्भर करता है।
किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला ?
यह मामला 17 अप्रैल 2011 को कर्नाटक में हुई एक दुर्घटना से जुड़ा था। KSRTC की एक बस अथानी से मंगासुली जा रही थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार शोभा नाम की एक महिला यात्री मल्लैया मंदिर के पास बस से उतर रही थी। आरोप था कि इसी दौरान चालक ने लापरवाही और तेजी से बस आगे बढ़ा दी, जिससे महिला नीचे गिर गई और उसके सिर में गंभीर चोट आई। बाद में उसकी मौत हो गई।
इस मामले में बस चालक मोहम्मद हनीफ जैनुम खलीफा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304A के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके अलावा Motor Vehicles Act की धाराएं भी लगाई गईं।
ट्रायल कोर्ट ने चालक को दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। बाद में अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने चालक को धारा 304A के तहत छह महीने की सजा सुनाई थी।
इसके बाद चालक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
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कंडक्टर की भूमिका पर कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान बस कंडक्टर की गवाही को सबसे महत्वपूर्ण माना।
कंडक्टर ने अदालत में कहा था कि पहले उसने चालक को बस रोकने का संकेत दिया, यात्रियों के उतरने के बाद उसने दोबारा बस चलाने का संकेत दिया और उसके बाद ही चालक ने बस आगे बढ़ाई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक बसों के संचालन में चालक और कंडक्टर के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा होता है।
अदालत ने कहा कि चालक का मुख्य ध्यान सड़क और वाहन संचालन पर होता है, जबकि यात्रियों के चढ़ने-उतरने और बस आगे बढ़ाने का संकेत देने की जिम्मेदारी कंडक्टर की होती है।
कोर्ट ने कहा:
“बस चालक स्वाभाविक रूप से कंडक्टर के संकेत, सीटी और निर्देशों पर निर्भर करता है। यह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का सामान्य तरीका है।”
“सिर्फ हादसा होना लापरवाही साबित नहीं करता”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि केवल दुर्घटना हो जाने से किसी व्यक्ति को आपराधिक लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी होता है कि आरोपी ने वास्तव में लापरवाही या उतावलेपन से काम किया था।
अदालत ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि चालक ने जानबूझकर या लापरवाही से बस चलाई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चालक:
- कंडक्टर के निर्देशों का पालन कर रहा था।
- उसने बस रोकने और आगे बढ़ाने दोनों काम संकेत के अनुसार किए.
- रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे चालक की प्रत्यक्ष लापरवाही साबित हो।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में चालक को दोषी ठहराना “अतार्किक और अनुचित” होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस एन. वी. अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से बताया कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में चालक की भूमिका क्या होती है।
अदालत ने कहा कि यदि चालक हर बार पीछे मुड़कर यात्रियों को देखने लगे, तो इससे सड़क सुरक्षा पर असर पड़ सकता है क्योंकि उसका मुख्य ध्यान ड्राइविंग पर होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा:
“चालक का ध्यान वाहन चलाने और सड़क सुरक्षा पर रहना चाहिए। यात्रियों के उतरने और बस आगे बढ़ाने के संबंध में वह सामान्य रूप से कंडक्टर के संकेतों पर निर्भर करता है।”
अदालत ने यह भी कहा कि मामले के तथ्यों से यह नहीं दिखता कि चालक की किसी लापरवाही के कारण महिला बस से गिरी।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:
- कंडक्टर की गवाही अभियोजन के आरोपों को कमजोर करती है।
- चालक ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया।
- उसके खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला साबित नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की सजा
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए चालक को बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि चालक ने लापरवाही, उतावलेपन या असावधानी से बस चलाई थी।
कोर्ट ने कहा कि केवल एक दुर्घटना के आधार पर किसी चालक को आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसकी प्रत्यक्ष और स्पष्ट लापरवाही साबित न हो जाए।
सिर्फ हादसा नहीं, लापरवाही का ठोस सबूत भी जरूरी: SC
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सड़क दुर्घटनाओं और धारा 304A IPC से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
देशभर में सार्वजनिक परिवहन से जुड़े मामलों में अक्सर दुर्घटना के बाद सीधे चालक पर आपराधिक लापरवाही का आरोप लगा दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से स्पष्ट किया है कि हर दुर्घटना अपने आप में आपराधिक लापरवाही नहीं होती, चालक और कंडक्टर की भूमिकाओं को अलग-अलग समझना जरूरी है और अभियोजन पक्ष को ठोस सबूतों से लापरवाही साबित करनी होगी।
यह फैसला भविष्य में सार्वजनिक परिवहन, सड़क दुर्घटना और आपराधिक लापरवाही से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा सकता है।
