नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत (Will) और पैतृक संपत्ति विवादों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर किसी Will यानी वसीयत को संदिग्ध या फर्जी नहीं माना जा सकता कि उसमें पत्नी, बच्चों या अन्य प्राकृतिक वारिसों को संपत्ति से बाहर रखा गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपनी इच्छा के अनुसार बांटने का पूरा कानूनी अधिकार है और केवल प्राकृतिक वारिसों को हिस्सा न देने से Will अपने आप अवैध नहीं हो जाती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Will का registered न होना भी उसकी वैधता खत्म नहीं करता, क्योंकि भारतीय कानून में वसीयत (Will) का registration अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि देश में अधिकांश Will बिना registration के ही बनाई जाती हैं।
जस्टिस Ujjal Bhuyan और जस्टिस Vijay Bishnoi की बेंच ने यह फैसला कर्नाटक की एक लंबी पारिवारिक संपत्ति लड़ाई में सुनाया।
पैतृक संपत्ति पर विवाद से जुड़ा मामला
पूरा विवाद कर्नाटक में स्थित कृषि और पैतृक संपत्तियों को लेकर था।
मामले के केंद्र में बी. शीना नैरथी नामक व्यक्ति थे, जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और मुंबई में रहते थे। उनकी 30 नवंबर 1983 को दिल्ली में कथित रूप से हार्ट अटैक से मौत हो गई थी।
मौत से कुछ महीने पहले, 15 मई 1983 को उन्होंने एक वसीयत (Will) बनाई थी। इस वसीयत में उन्होंने अपनी कृषि और पैतृक संपत्तियां अपनी बहन लक्ष्मी नैरथी के नाम कर दी थीं।
वसीयत में साफ लिखा गया था कि उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को जीवनकाल में “enough and more” यानी पर्याप्त से ज्यादा दे दिया है, इसलिए अब बाकी संपत्ति वह अपनी बहन को देना चाहते हैं।
वसीयत पर दो गवाहों के हस्ताक्षर थे। इनमें एक मृतक के भाई बी. जगन्नाथा नैरथी और दूसरे मोहम्मद साहेब थे। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार दोनों ने Will के execution की पुष्टि की थी।
पत्नी और बच्चों को बाहर रखने पर उठा विवाद
मौत के बाद मृतक की पत्नी ने तहसीलदार के सामने संपत्ति अपने नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की।
इसी दौरान बहन लक्ष्मी नैरथी ने वसीयत का खुलासा किया और संपत्ति पर अपना दावा पेश किया। इसके बावजूद 1984 में mutation entries पत्नी के पक्ष में दर्ज कर दी गईं।
यहीं से विवाद शुरू हुआ और मामला कई दशकों तक अदालतों में चलता रहा। मामले में मृतक की पत्नी और बच्चों की ओर से Will को चुनौती दी गई।
उनका मुख्य तर्क था कि Will registered नहीं थी, पत्नी और बच्चों को पूरी तरह संपत्ति से बाहर रखा गया था और पूरा मामला संदिग्ध परिस्थितियों से घिरा हुआ था।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी दावा किया कि Will के एक गवाह ने बाद में हलफनामा देकर कहा था कि ऐसी कोई Will उसके सामने execute नहीं हुई थी। इसी आधार पर यह दलील दी गई कि Will वास्तविक नहीं थी।
पत्नी और बच्चों की ओर से यह भी कहा गया कि सामान्य परिस्थितियों में कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों को पूरी तरह संपत्ति से बाहर नहीं रखता। इसलिए यह स्थिति अपने आप में suspicion यानी संदेह पैदा करती है।
वसीयत को चुनौती देने के मुख्य आधार क्या थे ?
अपीलकर्ताओं (पत्नी और अन्य पक्ष) ने वसीयत को कई आधारों पर चुनौती दी:
- वसीयत में पत्नी और बच्चों को बाहर रखा गया है।
- वसीयत रजिस्टर्ड (registered) नहीं है।
- वसीयत के आसपास संदिग्ध परिस्थितियां हैं।
- एक गवाह के हलफनामे में वसीयत से इनकार करने की बात कही गई।
इन तर्कों के आधार पर यह कहा गया कि वसीयत को वैध नहीं माना जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की ये दलीलें ?
सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य ही सामान्य उत्तराधिकार व्यवस्था को बदलना होता है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति सामान्य succession line से अलग तरीके से बांटना चाहता है, तो यह उसका कानूनी अधिकार है।
अदालत ने कहा:
“सिर्फ प्राकृतिक वारिसों को संपत्ति से बाहर रखने भर से किसी Will को संदिग्ध परिस्थिति नहीं माना जा सकता। जब तक Will की वास्तविकता या उसके सही तरीके से बनाए जाने पर कोई ठोस संदेह न हो, तब तक केवल exclusion के आधार पर उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।”
कोर्ट ने कहा कि यदि केवल पत्नी या बच्चों को हिस्सा न देने के आधार पर Will को संदिग्ध मान लिया जाए, तो फिर Will बनाने की पूरी अवधारणा ही खत्म हो जाएगी।
Will में पहले से लिखा था कारण
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि विवादित Will में खुद testator यानी वसीयत बनाने वाले व्यक्ति ने पत्नी और बच्चों को बाहर रखने का कारण स्पष्ट रूप से लिखा था।
Will में कहा गया था कि पत्नी और बच्चों को पहले ही पर्याप्त संपत्ति और सुविधाएं दी जा चुकी हैं, इसलिए बाकी संपत्ति बहन को दी जा रही है।
अदालत ने कहा कि जब Will में exclusion का स्पष्ट कारण मौजूद है, तो केवल प्राकृतिक वारिसों को बाहर रखने के आधार पर उसे संदिग्ध नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि Will की वैधता तय करते समय अदालतों को केवल succession pattern नहीं देखना चाहिए, बल्कि पूरी परिस्थितियों और testator की मंशा को समझना चाहिए।
क्या वसीयत का रजिस्ट्रेशन जरूरी है?- कोर्ट का जवाब
मामले में यह तर्क भी दिया गया कि Will registered नहीं थी, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर संदेह होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि भारतीय कानून में Will का registration अनिवार्य नहीं है और अधिकांश Will बिना registration के ही बनाई जाती हैं।
कोर्ट ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा:
“सिर्फ इस आधार पर कि Will registered नहीं है, उसकी वास्तविकता पर संदेह नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने कहा कि registration केवल एक supporting circumstance हो सकता है, लेकिन non-registration अपने आप में Will को अवैध नहीं बनाता।
गवाह के हलफनामे पर भी कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में Will के गवाहों और अन्य परिस्थितियों की भी विस्तार से जांच की। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि Will फर्जी थी या दबाव में बनवाई गई थी।
कोर्ट ने कहा कि गवाहों की मौजूदगी, Will की भाषा, testator की मंशा और आसपास की परिस्थितियां सभी यह दिखाती हैं कि Will वास्तविक थी।
अदालत ने यह भी माना कि mutation entries या बाद की प्रशासनिक कार्यवाहियां अपने आप में Will की वैधता खत्म नहीं करतीं।
अंतिम फैसला: बहन के पक्ष में वसीयत बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए बहन लक्ष्मी नैरथी के पक्ष में बनाई गई Will को वैध माना। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे Will को फर्जी या संदिग्ध माना जा सके।
कोर्ट ने साफ किया कि:
- व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपनी इच्छा के अनुसार बांटने का अधिकार है।
- प्राकृतिक वारिसों को बाहर रखना अपने आप में संदेह का आधार नहीं।
- non-registration से Will अमान्य नहीं होती।
- जब तक कोई ठोस संदेह या धोखाधड़ी साबित न हो, वसीयत को मान्यता दी जानी चाहिए।
यह फैसला आने वाले समय में Will, उत्तराधिकार और पारिवारिक संपत्ति विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मिसाल माना जा सकता है।
उत्तराधिकार विवादों पर फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक संपत्ति और Will विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देशभर की अदालतों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले लंबित हैं जहां पत्नी या बच्चों को संपत्ति से बाहर रखा गया, संपत्ति किसी एक रिश्तेदार को दे दी गई। या Will registered नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल प्राकृतिक वारिसों को हिस्सा न देने से Will अवैध नहीं होगी। registration अनिवार्य नहीं है। अदालतों को हर मामले में वास्तविक परिस्थितियों की जांच करनी होगी।
इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति को अपनी संपत्ति के वितरण का पूरा अधिकार है, अदालतें वसीयत को केवल तकनीकी आधार पर खारिज नहीं करेंगी और वसीयत की वैधता का निर्णय व्यापक परिस्थितियों के आधार पर होगा
व्यक्ति की इच्छा सर्वोपरि, अदालत ने दोहराया सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि किसी व्यक्ति की अंतिम इच्छा (last wish) का सम्मान किया जाना चाहिए, जब तक कि उसमें कोई स्पष्ट धोखाधड़ी या संदेह न हो।
यह निर्णय उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो अपनी संपत्ति को अपनी पसंद के अनुसार बांटना चाहते हैं, भले ही वह पारंपरिक उत्तराधिकार के ढांचे से अलग क्यों न हो।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि व्यक्ति की इच्छा का प्रतिबिंब है-और इसे हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता।